कंगाली के बीच मुनीर के बड़े अरमान! ट्रंप से बातचीत के बाद तेहरान पहुंचे पाक आर्मी चीफ; रावलपिंडी में 6 महीने के लिए सेना तैनात, जानिए मुल्क में क्यों बढ़ा भारी तनाव

गंभीर आर्थिक संकट, रिकॉर्ड तोड़ महंगाई, बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में लगातार होते आतंकी हमलों से जूझ रहा पाकिस्तान इस समय अपने इतिहास के सबसे नाजुक दौर से गुजर रहा है। मुल्क के भीतर आम जनता के लिए दो वक्त की रोटी जुटाना मुश्किल हो चुका है, लेकिन पाकिस्तानी सेना के मुखिया फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के वैश्विक कद बढ़ाने के अरमान थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। देश की बदहाल अर्थव्यवस्था और चरमराती आंतरिक सुरक्षा के बीच आसिम मुनीर अचानक वैश्विक कूटनीति के केंद्र में आने की कोशिश कर रहे हैं। एक तरफ जहां घर के भीतर सेना के खिलाफ जनआक्रोश चरम पर है, वहीं दूसरी तरफ मुनीर अंतरराष्ट्रीय मंच पर अमेरिका और ईरान के बीच मध्यस्थ बनकर खुद को एक अपरिहार्य नेता के तौर पर स्थापित करने की जुगत में लगे हुए हैं।

डोनाल्ड ट्रंप का संदेश और तेहरान दौरा: क्या है मुनीर का अंतरराष्ट्रीय दांव?

राजनयिक गलियारों से छनकर आ रही खबरों के मुताबिक, तेहरान के आधिकारिक दौरे पर जाने से ठीक पहले आसिम मुनीर ने अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के साथ टेलीफोन पर अहम बातचीत की थी। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते युद्ध के तनाव के बीच मुनीर ने वाशिंगटन के संदेशवाहक के रूप में तेहरान की यात्रा की। सवाल यह उठ रहा है कि जो मुल्क खुद अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF) और मित्र देशों के कर्ज के सहारे अपनी सांसें गिन रहा है, उसके सेना प्रमुख को अचानक वैश्विक शांति दूत बनने की जरूरत क्यों महसूस हुई?

कूटनीतिक जानकारों का मानना है कि आसिम मुनीर इस अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के जरिए पश्चिमी देशों, खासकर अमेरिका की नई हुकूमत में अपनी स्वीकार्यता और वैधता हासिल करना चाहते हैं। ट्रंप प्रशासन से सीधे संबंध बनाकर मुनीर न केवल पाकिस्तान के लिए वित्तीय पैकेज और सैन्य मदद का रास्ता सुगम करना चाहते हैं, बल्कि पाकिस्तान की घरेलू राजनीति में सेना के असीमित दखल पर अंतरराष्ट्रीय आलोचनाओं को भी दबाने का प्रयास कर रहे हैं।

रावलपिंडी में सेना की तैनाती और अनुच्छेद 245: खौफ में हुकूमत और जीएचक्यू

एक तरफ मुनीर विदेश में कूटनीति की बिसात बिछा रहे हैं, तो वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान के सबसे संवेदनशील सैन्य शहर रावलपिंडी में सुरक्षा के नाम पर भारी सेना उतार दी गई है। शहबाज शरीफ सरकार ने पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 245 को लागू करते हुए रावलपिंडी में सेना की तीन कंपनियों को अगले छह महीने के लिए तैनात करने का फरमान जारी कर दिया है। आधिकारिक तौर पर इसे ‘संवेदनशील सुरक्षा ड्यूटी’ करार दिया गया है, लेकिन रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यह कदम सेना मुख्यालय (GHQ) और सैन्य प्रतिष्ठानों को जनता के संभावित आक्रोश से बचाने की हताश कोशिश है।

बिना किसी स्पष्ट बाहरी खतरे के देश के प्रमुख सैन्य शहर में लंबे समय के लिए सेना की यह तैनाती साफ संकेत देती है कि मुनीर और शहबाज सरकार को अपने ही नागरिकों और विपक्षी समर्थकों से जबर्दस्त खतरा महसूस हो रहा है। 9 मई 2023 को सैन्य मुख्यालय पर हुए ऐतिहासिक हमलों की पुनरावृत्ति के डर ने शीर्ष जनरलों को इस कदर आशंकित कर दिया है कि उन्हें अपनी ही जमीन पर बख्तरबंद गाड़ियों और बंदूकों का पहरा बैठाना पड़ रहा है।

सेना के शीर्ष स्तर पर फेरबदल और अंदरूनी सत्ता संघर्ष की सुगबुगाहट

रावलपिंडी में सैनिकों की तैनाती के साथ-साथ पाकिस्तानी सेना के शीर्ष नेतृत्व में हुए हालिया बदलावों ने भी आंतरिक खींचतान की चर्चाओं को हवा दे दी है। जनरल सैयद आमिर रजा को फोर-स्टार जनरल के पद पर प्रमोट कर नेशनल स्ट्रैटेजिक कमांड की जिम्मेदारी सौंपी गई है, जो पाकिस्तान के रणनीतिक व परमाणु हथियारों की निगरानी से जुड़ी व्यवस्था का अहम हिस्सा है। हालांकि, इस पद के तहत सीधे तौर पर सैनिकों की कमान नहीं आती, जिससे सैन्य विश्लेषक इसे कोर कमांडरों के बीच संतुलन साधने और संभावित बगावत को रोकने की मुनीर की चाल मान रहे हैं।

पाकिस्तान का इतिहास गवाह रहा है कि जब भी किसी सेना प्रमुख ने देश के आंतरिक मुद्दों को नजरअंदाज कर अपनी व्यक्तिगत सत्ता को मजबूत करने की कोशिश की है, तो सेना के भीतर गुटबाजी और तख्तापलट के हालात पैदा हुए हैं। सैन्य अधिकारियों के एक वर्ग में इस बात को लेकर गहरा असंतोष है कि सेना की संस्थागत साख आम जनता की नजरों में सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुकी है।

इमरान खान का दबाव और जनता के प्रतिरोध से घिरी सेना

पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) के संस्थापक और पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की जेल में मौजूदगी के बावजूद उनकी लोकप्रियता पाकिस्तानी हुकूमत और सैन्य प्रतिष्ठान के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। सोशल मीडिया पर सेना प्रमुख की नीतियों की खुलेआम आलोचना हो रही है और जनता अब सेना के राजनीतिक हस्तक्षेप को खुलकर चुनौती दे रही है। दूसरी ओर, बलूचिस्तान में बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) और खैबर पख्तूनख्वा में तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) के बढ़ते हमलों ने पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के पसीने छुड़ा दिए हैं। सीमावर्ती इलाकों में सुरक्षा बल अपनी रक्षा करने में नाकाम साबित हो रहे हैं, जबकि राजधानी और रावलपिंडी में नागरिकों को डराने के लिए सेना का इस्तेमाल किया जा रहा है।

क्या अंतरराष्ट्रीय पैंतरेबाजी से सुधरेगा पाकिस्तान का मुकद्दर?

आसिम मुनीर का ट्रंप से बातचीत करना और तेहरान में मध्यस्थता का नाटक रचना पाकिस्तान के जमीनी संकट का समाधान नहीं कर सकता। जब तक पाकिस्तान अपनी चरमराती अर्थव्यवस्था, बेलगाम महंगाई, राजनीतिक अस्थिरता और नागरिकों के लोकतांत्रिक अधिकारों पर ध्यान नहीं देता, तब तक ऐसी कूटनीतिक पैंतरेबाजी केवल सत्ता पर टिके रहने का जरिया ही साबित होगी। रावलपिंडी की सड़कों पर तैनात सेना और मुनीर की विदेश यात्राएं इस कड़वे सच को नहीं छिपा सकतीं कि पाकिस्तान अंदर से खोखला हो चुका है और अंदरूनी असंतोष का यह लावा कभी भी बड़े राजनीतिक विस्फोट का रूप ले सकता है।

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