कॉकरोच जनता पार्टी चुनाव लड़े तो वोट देंगे? मूड ऑफ द नेशन सर्वे के नतीजों से अभिजीत दीपके को लगा बड़ा झटका; जानिए जेन-जी और जनता का असली मूड

नीट परीक्षा में कथित गड़बड़ी के खिलाफ जंतर-मंतर पर विशाल छात्र आंदोलन खड़ा करने और सोशल मीडिया पर करोड़ों फॉलोअर्स जुटाने वाली ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) पिछले कुछ महीनों से भारतीय राजनीति के केंद्र में बनी हुई है। अमेरिका से लौटकर भारत के युवाओं और छात्रों की आवाज उठाने का दावा करने वाले सीजेपी संस्थापक अभिजीत दीपके जहां एक तरफ ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान चलाकर सरकारी व्यवस्था की खामियों को उजागर कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ उनकी राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं और चुनावी भविष्य को लेकर देश की जनता का मूड भी सामने आ गया है। इंडिया टुडे और सी-वोटर द्वारा किए गए ‘मूड ऑफ द नेशन’ (MOTN) के ताजा सर्वे में जब जनता और खासकर जेन-जी (Gen-Z) से सीजेपी को लेकर सीधे सवाल पूछे गए, तो जो नतीजे आए, वे अभिजीत दीपके और उनकी कोर टीम के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं हैं।

मूड ऑफ द नेशन सर्वे के आंकड़े: चुनाव लड़ने पर 43% जनता ने दिखाया ‘लाल झंडा’

सी-वोटर के इस राष्ट्रव्यापी सर्वे में जब लोगों से यह सीधा सवाल पूछा गया कि “अगर कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) चुनाव लड़ती है, तो क्या आप उसे अपना वोट देंगे?” इसके जवाब में जो आंकड़े सामने आए, उन्होंने साफ कर दिया कि सोशल मीडिया पर किसी आंदोलन का वायरल हो जाना और पोलिंग बूथ पर मतदाताओं का बटन दबाना दो बिल्कुल अलग बातें हैं।

सर्वे के अनुसार, केवल 33 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे सीजेपी को वोट देने के लिए तैयार हैं। वहीं, 43 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने दो टूक शब्दों में ‘नहीं’ कहा और सीजेपी को वोट देने से पूरी तरह इनकार कर दिया। शेष मतदाताओं ने इस पर कोई स्पष्ट राय नहीं दी। यह आंकड़ा इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण है क्योंकि इंस्टाग्राम और एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर सीजेपी के फॉलोअर्स की संख्या ने कुछ ही हफ्तों में कई स्थापित राजनीतिक दलों को पीछे छोड़ दिया था। चुनावी विश्लेषकों का मानना है कि डिजिटल समर्थन का जमीन पर वोट बैंक में न बदल पाना किसी भी नए युवा आंदोलन की सबसे बड़ी शुरुआती चुनौती होती है।

राजनीतिक दल या प्रेशर ग्रुप? 39% लोगों ने दी सिर्फ दबाव समूह बने रहने की सलाह

अभिजीत दीपके कई साक्षात्कारों में यह कह चुके हैं कि उनका संगठन वर्तमान में सीधे तौर पर किसी चुनावी दंगल में उतरने के बजाय एक ‘प्रेशर ग्रुप’ (दबाव समूह) के रूप में काम करना चाहता है, जो सरकार और व्यवस्था की जवाबदेही तय करे। सर्वे में जब इसी बिंदु पर जनता से सवाल पूछा गया, तो 39 प्रतिशत लोगों ने सीजेपी के इस मौजूदा रुख का समर्थन किया। इन लोगों का मानना था कि सीजेपी को चुनावी राजनीति में नहीं कूदना चाहिए, बल्कि उसे युवाओं, छात्रों और शिक्षा सुधारों के लिए एक स्वतंत्र प्रेशर ग्रुप के रूप में ही काम करते रहना चाहिए।

इसके विपरीत, केवल 26 प्रतिशत लोगों ने राय दी कि सीजेपी को एक औपचारिक राजनीतिक दल के रूप में पंजीकृत होकर सीधे चुनावी मैदान में अपनी किस्मत आजमानी चाहिए। जनता की इस प्रतिक्रिया से साफ है कि लोग सीजेपी को एक आंदोलन और निगरानी तंत्र (वॉचडॉग) के रूप में तो पसंद कर रहे हैं, लेकिन सरकार चलाने या विधायी राजनीति के विकल्प के रूप में अभी पूरी तरह स्वीकार करने से कतरा रहे हैं।

भारत के जेन-जी (Gen-Z) का असली दर्द: 53% युवाओं के लिए बेरोजगारी सबसे बड़ा मुद्दा

सर्वे में जब देश के युवाओं और जेन-जी मतदाताओं से उनके जीवन के सबसे अहम मुद्दों के बारे में पूछा गया, तो देश की जमीनी हकीकत खुलकर सामने आ गई।

  • रोजगार का संकट: 53 प्रतिशत युवाओं ने ‘रोजगार और नौकरियों की कमी’ को देश का सबसे ज्वलंत और पहला मुद्दा बताया।

  • शिक्षा व्यवस्था का हाल: 22 प्रतिशत उत्तरदाताओं के लिए शिक्षा की गुणवत्ता, पेपर लीक और स्कूलों-कॉलेजों की बदहाली सबसे बड़ी चिंता का विषय रही।

  • महंगाई का दबाव: 12 प्रतिशत युवाओं ने बढ़ती महंगाई को अपने भविष्य की सबसे बड़ी बाधा माना।

  • मानसिक स्वास्थ्य: 4 प्रतिशत युवाओं ने मानसिक तनाव और करियर अनिश्चितता (मेंटल हेल्थ) को सबसे अहम मुद्दा माना।

जब सर्वे में यह पूछा गया कि युवाओं को रोजगार योग्य बनाने और नौकरियां देने के लिए मुख्य रूप से कौन जिम्मेदार है, तो 63 प्रतिशत जनता ने केंद्र और राज्य सरकारों की नीतियों को इसके लिए जिम्मेदार ठहराया। वहीं, 14 प्रतिशत लोगों ने स्कूल-कॉलेजों की खराब पढ़ाई, 9 प्रतिशत ने निजी नियोक्ताओं और 5 प्रतिशत ने पारिवारिक परिस्थितियों को इसका कारण माना।

प्लेस्टेशन से शुरू हुई थी कहानी: कैसे जन्मी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’?

सीजेपी के उभार की कहानी भारतीय राजनीति में किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है। महाराष्ट्र के औरंगाबाद से ताल्लुक रखने वाले और बोस्टन यूनिवर्सिटी से पब्लिक रिलेशंस में पोस्ट ग्रेजुएट अभिजीत दीपके ने बताया था कि इस पार्टी का विचार किसी राजनीतिक मंथन से नहीं, बल्कि अमेरिका में प्लेस्टेशन (PS5) पर फीफा वीडियो गेम खेलते हुए आया था।

मई 2026 में सुप्रीम कोर्ट की एक सुनवाई के दौरान ‘कॉकरोच’ और ‘परजीवी’ शब्द की आई विवादास्पद टिप्पणियों के बाद बेरोजगार युवाओं में जो आक्रोश फैला, दीपके ने उसी पर व्यंग्य करते हुए सोशल मीडिया पर ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ के नाम से एक व्यंग्यात्मक मंच शुरू किया। देखते ही देखते इस डिजिटल मंच ने एक वास्तविक जन-आंदोलन का रूप ले लिया। जंतर-मंतर पर छात्रों के भारी जमावड़े और देशव्यापी विरोध प्रदर्शनों के बाद केंद्र सरकार को बैकफुट पर आना पड़ा था और तत्कालीन शिक्षा मंत्री को अपने पद से इस्तीफा देना पड़ा था।

राजस्थान में हमले से लेकर ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान तक: जमीनी टकराव तेज

हाल के दिनों में सीजेपी ने अपना पूरा ध्यान सरकारी स्कूलों की बदहाली को उजागर करने पर केंद्रित किया है। ‘स्कूल ठीक करो’ अभियान के तहत सीजेपी के कार्यकर्ता विभिन्न राज्यों के ग्रामीण इलाकों में जाकर जर्जर भवनों, शिक्षकों की कमी और बुनियादी सुविधाओं के अभाव को लाइव दिखा रहे हैं।

हालांकि, यह अभियान राजनीतिक विवादों से भी घिर चुका है। हाल ही में राजस्थान के सरकारी स्कूल के दौरे के दौरान सीजेपी के सह-संयोजक आशुतोष रांका और उनकी टीम पर कथित तौर पर पथराव और मारपीट की घटना सामने आई थी। सीजेपी ने इसे सत्ताधारी पार्टी की हताशा बताया, जबकि स्थानीय स्तर पर संगठन की गतिविधियों और कार्यशैली को लेकर भी सवाल खड़े किए गए। इसके अलावा, पार्टी के आधिकारिक एक्स हैंडल को भी सुरक्षा कारणों और कानूनी मांगों के चलते अस्थायी रूप से विदहेल्ड किया गया था।

सोशल मीडिया की आंधी बनाम चुनावी हकीकत: क्या है आगे की राह?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भारत का चुनावी इतिहास इस बात का गवाह रहा है कि सड़कों का गुस्सा और सोशल मीडिया का ट्रेंड हमेशा वोटों में तब्दील नहीं होता। आम आदमी पार्टी (AAP) ने 2011 के अन्ना आंदोलन के बाद जब पार्टी बनाई थी, तो उनके पास लंबा सांगठनिक ढांचा और दिल्ली जैसे शहरी मतदाता थे। इसके विपरीत, सीजेपी का आधार मुख्य रूप से सोशल मीडिया पर सक्रिय जेन-जी और छात्र हैं, जो चुनावी मतदान के दिन हमेशा संगठित मतदाता के रूप में बाहर नहीं निकलते।

सी-वोटर का यह सर्वे अभिजीत दीपके और उनके साथियों के लिए एक स्पष्ट संदेश है कि यदि वे आने वाले वर्षों में किसी भी प्रकार की चुनावी राजनीति का हिस्सा बनना चाहते हैं, तो उन्हें केवल वायरल कंटेंट और तात्कालिक प्रदर्शनों से आगे बढ़कर ठोस नीतिगत विकल्प, बूथ-स्तरीय संगठन और व्यापक जनसमर्थन तैयार करना होगा। फिलहाल, सीजेपी ने 5 सितंबर को दिल्ली में एक और बड़े शांतिपूर्ण मार्च की घोषणा की है, जिससे यह साफ है कि चुनावी सर्वे के झटके के बावजूद दीपके की ‘कॉकरोच सेना’ पीछे हटने के मूड में नहीं है।

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