
हिमालय की शांत और हरी-भरी वादियों में बसा नेपाल इस समय सदी की सबसे भयानक प्राकृतिक आपदाओं में से एक का सामना कर रहा है। नेपाल-तिब्बत सीमा से सटे इलाकों में अचानक आई भीषण फ्लैश फ्लड (आकस्मिक बाढ़) और भारी भूस्खलन ने पलक झपकते ही सब कुछ तबाह कर दिया। जिस जगह पर कुछ घंटे पहले पर्यटकों की चहल-पहल और कैलाश मानसरोवर जाने वाले तीर्थयात्रियों की रौनक हुआ करती थी, वहां अब केवल चारों तरफ फैला कीचड़, मलबा और चीख-पुकार बची है। इस खौफनाक जलप्रलय में अब तक 160 से अधिक लोगों की मौत की पुष्टि हो चुकी है, जबकि सैकड़ों लोग अब भी लापता हैं। जलस्तर इतनी तेजी से बढ़ा कि लोगों को सुरक्षित स्थानों पर भागने तक का मौका नहीं मिला।
बाढ़ से पहले स्वर्ग जैसी वादी, अब मलबे का बंजर मैदान
आपदा से पहले रसुवा, नुवाकोट, धादिंग और तिमुरे जैसे इलाके अपनी प्राकृतिक सुंदरता, शांत बहती भोटेकोशी और त्रिशूली नदियों और सदियों पुराने व्यापारिक रास्तों के लिए जाने जाते थे। चारों ओर ऊंचे-ऊंचे हरे पहाड़, आधुनिक बुनियादी ढांचा, पनबिजली परियोजनाएं और कतार में खड़े होटल-दुकानें यहां की पहचान थीं। लेकिन जब तिब्बत सीमा पर हिमनद टूटने (ग्लेशियल कोलैप्स) और चट्टान खिसकने की घटना हुई, तो कुछ ही मिनटों में पानी का स्तर करीब 30 फीट तक ऊपर उठ गया।
तबाही के बाद की जो तस्वीरें और ड्रोन फुटेज सामने आई हैं, वे रूह कंपा देने वाली हैं। चार-चार मंजिला कंक्रीट की इमारतें ताश के पत्तों की तरह ढहकर उफनती नदी में समा गईं। दर्जनों ट्रक, गाड़ियां और बसें कई टन मलबे और गाद के नीचे दब चुकी हैं। नदी किनारे बसे पूरे के पूरे बाजार, स्कूल और सुरक्षा बलों की चौकियां नक्शे से पूरी तरह मिट चुकी हैं। जो पुल घाटियों को जोड़ते थे, वे पूरी तरह टूटकर बह गए हैं।
ग्लेशियर टूटने से मची जलप्रलय और 30 फीट ऊंची लहरों का तांडव
वैज्ञानिकों और भूवैज्ञानिक एजेंसियों के शुरुआती विश्लेषण के अनुसार, यह तबाही सामान्य मानसूनी बारिश से नहीं बल्कि तिब्बत सीमा के पास एक बड़े ग्लेशियर के ढहने और हिम-चट्टान हिमस्खलन के कारण आई। इस अचानक हुए हिमस्खलन ने नदी के प्रवाह को अवरुद्ध किया और फिर जब वह प्राकृतिक बांध टूटा, तो पानी का ऐसा सैलाब उतरा जिसने रास्ते में आने वाली हर चीज को लील लिया।
त्रिशूली और भोटेकोशी नदियों के संगम के पास जलस्तर मात्र आधे घंटे के भीतर नौ मीटर तक ऊपर चढ़ गया। प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि सुबह के समय जब लोग अपने दफ्तरों, दुकानों और यात्रा की तैयारी में लगे थे, तभी पहाड़ों से गरजने जैसी भयानक आवाज आई। देखते ही देखते पानी की विशाल लहरों ने पूरे ढुंगे बाजार और तिमुरे चेकपोस्ट को अपनी चपेट में ले लिया। लोगों को संभलने तक का अवसर नहीं मिला और कई बस्तियां जलमग्न हो गईं।
कैलाश मानसरोवर तीर्थयात्री और सैकड़ों विदेशी नागरिक लापता
इस भीषण त्रासदी का सबसे दर्दनाक पहलू यह है कि बाढ़ की चपेट में बड़ी संख्या में श्रद्धालु और पर्यटक आ गए। यह समय कैलाश मानसरोवर यात्रा और पवित्र गोसाईंकुंड ट्रेक का मुख्य सीजन था। बाढ़ के समय सीमावर्ती इलाके में सैकड़ों श्रद्धालु मौजूद थे। अधिकारियों के अनुसार लापता लोगों में 133 से अधिक भारतीय नागरिक और प्रवासी भारतीय (NRI) शामिल हैं, जो पवित्र यात्रा पर निकले थे।
इसके अलावा अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा, मलेशिया और दक्षिण कोरिया जैसे देशों के दर्जनों नागरिक भी लापता बताए जा रहे हैं। स्थानीय जलविद्युत परियोजनाओं में काम करने वाले कई इंजीनियर और श्रमिक भी सैलाब में बह गए। मृतकों के शव घटनास्थल से 150 किलोमीटर दूर चितवन तक बरामद किए जा रहे हैं, जिससे इस जलप्रवाह की भयानकता का स्पष्ट अंदाजा लगाया जा सकता है।
सड़कें तबाह, 19 पुल बहे और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान
बाढ़ ने नेपाल के बुनियादी ढांचे की रीढ़ तोड़कर रख दी है। बेत्रावती से रसुवागढ़ी सीमा को जोड़ने वाला 42 किलोमीटर लंबा रणनीतिक राजमार्ग पूरी तरह बह गया है। सरकार के शुरुआती आकलन के मुताबिक, कम से कम 19 प्रमुख मोटर योग्य पुल नष्ट हो चुके हैं, जिससे दर्जनों दूरदराज के इलाकों का संपर्क राजधानी काठमांडू और बाकी दुनिया से पूरी तरह कट गया है।
ऊर्जा क्षेत्र पर भी इसका भारी आघात लगा है। देश की कुल पनबिजली क्षमता का लगभग 12 प्रतिशत से अधिक हिस्सा इस बाढ़ से प्रभावित हुआ है। रसुवागढ़ी और संजेन खोला सहित कई बड़ी जलविद्युत परियोजनाएं गाद और पानी भरने से ठप हो गई हैं, जिससे कई क्षेत्रों में बिजली और संचार व्यवस्था पूरी तरह चरमरा गई है।
युद्धस्तर पर राहत और बचाव कार्य: भारत ने बढ़ाया मदद का हाथ
नेपाल सरकार ने सबसे ज्यादा प्रभावित इलाकों को तीन महीने के लिए आपदाग्रस्त क्षेत्र घोषित कर दिया है। नेपाल सेना, सशस्त्र पुलिस बल और आपदा प्रबंधन टीमों को हेलीकॉप्टरों के साथ दुर्गम इलाकों में उतारा गया है। सैनिकों द्वारा रस्सियों और नौकाओं की मदद से फंसे हुए लोगों को सुरक्षित निकालने का काम जारी है।
इस मानवीय संकट की घड़ी में भारत ने अपने पड़ोसी देश के साथ मजबूती से खड़े होने का संकल्प दोहराया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेपाल के नेतृत्व से बात कर गहरी संवेदना व्यक्त की और हर संभव मानवीय व राहत सामग्री तुरंत उपलब्ध कराने का भरोसा दिया। भारतीय दूतावास ने प्रभावित परिवारों की मदद के लिए 24 घंटे काम करने वाले इमरजेंसी हेल्पलाइन नंबर जारी किए हैं ताकि लापता श्रद्धालुओं और पर्यटकों की सटीक जानकारी जुटाई जा सके।
नेपाल में आई यह आपदा एक बार फिर जलवायु परिवर्तन और हिमालयी क्षेत्र में बढ़ते पर्यावरणीय असंतुलन की ओर इशारा करती है। प्रकृति के इस रौद्र रूप ने जहां सैकड़ों परिवारों को उजाड़ दिया है, वहीं नेपाल को इस गहरे जख्म से उबरने और पुनर्निर्माण करने में लंबा समय लगेगा।
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