
सनातन धर्म में कार्तिक मास को भगवान श्रीहरि विष्णु और माता लक्ष्मी का सबसे प्रिय महीना माना गया है। शास्त्रों में वर्णन मिलता है कि कार्तिक के पूरे महीने में देवी तुलसी में मां लक्ष्मी और भगवान शालिग्राम का साक्षात वास रहता है। पद्म पुराण के अनुसार, जो साधक कार्तिक मास में प्रतिदिन नियमपूर्वक तुलसी के पौधे की पूजा-अर्चना करता है और शाम के समय दीपदान करता है, उसके पूर्वजन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं और घर में कभी दरिद्रता पैर नहीं पसारती।
कार्तिक के पावन दिनों में तुलसी सेवा को अश्वमेध यज्ञ और गंगा स्नान के समान फलदायी माना गया है। यदि आप भी इस माह तुलसी पूजन और दीपदान का पूर्ण पुण्य फल प्राप्त करना चाहते हैं, तो शास्त्रों में वर्णित सही और प्रामाणिक विधि का पालन करना अत्यंत आवश्यक है।
सुबह की तुलसी पूजा की संपूर्ण एवं शास्त्रीय विधि
कार्तिक मास में प्रातःकाल सूर्योदय से पूर्व तुलसी पूजन का विशेष विधान है। इस पूजा को संपन्न करने के लिए इन चरणों का पालन करें:
-
स्नान और शुद्ध वस्त्र: ब्रह्म मुहूर्त में उठकर गंगाजल मिले जल से स्नान करें और स्वच्छ, धुले हुए पीले या लाल वस्त्र धारण करें।
-
जल अर्पण: तांबे या पीतल के लोटे में शुद्ध जल, थोड़ा सा कच्चा दूध, अक्षत और पुष्प मिलाएं। इसके बाद तुलसी जी की जड़ में धीरे-धीरे जल अर्पित करें। जल चढ़ाते समय ध्यान रखें कि गमले में अत्यधिक जल न भरे, जिससे पौधे को नुकसान न पहुंचे।
-
श्रृंगार और तिलक: तुलसी के पौधे पर रोली, कुमकुम, हल्दी और चंदन का तिलक लगाएं। मां तुलसी को लाल चुनरी ओढ़ाएं और सिंदूर अर्पित करें।
-
भोग और तुलसी स्तुति: तुलसी माता को बताशे, मिश्री, मौसमी फल या सफेद मिष्ठान का भोग लगाएं। इसके बाद ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का जप करते हुए तुलसी के पौधे की तीन, सात या ग्यारह बार परिक्रमा करें।
संध्याकालीन तुलसी दीपदान: सही तरीका और जरूरी नियम
कार्तिक मास में तुलसी दीपदान का महत्व सुबह की पूजा से भी अधिक बताया गया है। शास्त्रों के अनुसार, सूर्यास्त के तुरंत बाद गोधूलि वेला में दीपदान करना सर्वोत्तम होता है:
-
दीपक का चुनाव: दीपदान के लिए मिट्टी का नया दीपक या गाय के शुद्ध घी से गूंथे हुए आटे का चौमुखा दीपक सबसे उत्तम माना जाता है।
-
बाती और तेल: दीपक में लाल कलावा (मौली) की बाती या शुद्ध रुई की लंबी बाती का प्रयोग करें। दीपक में गाय का शुद्ध देसी घी अथवा तिल का तेल ही भरें।
-
दीपक रखने का स्थान: दीपक को कभी भी सीधे जमीन पर न रखें। दीपक स्थापित करने से पहले जमीन पर थोड़े से अक्षत (चावल), दूर्वा या फूल का आसन बनाएं, उसके ऊपर ही प्रज्वलित दीपक रखें।
-
आंचल से रक्षा: शाम को तेज हवा के कारण दीया बुझने न पाए, इसके लिए दीपक के चारों ओर रक्षा आवरण या मिट्टी की ओट बना दें।
तुलसी दीपदान के समय इस महामंत्र का अवश्य करें जप
तुलसी के समीप दीप प्रज्वलित करते समय और हाथ जोड़कर प्रणाम करते हुए इस पवित्र मंत्र का उच्चारण करने से मां लक्ष्मी अति प्रसन्न होती हैं:
“महाप्रसाद जननी सर्व सौभाग्यवर्धिनी, आधि व्याधि हरा नित्यं तुलसी त्वं नमोऽस्तुते।।”
यदि यह श्लोक स्मरण न हो, तो ‘ॐ तुलस्यै नमः’ या ‘श्रीं ह्रीं क्लीं ऐं वृंदावन्यै स्वाहा’ मंत्र का 11 या 21 बार जप करें।
कार्तिक मास में तुलसी सेवा के दौरान इन गलतियों से बचें
तुलसी पूजा करते समय कुछ शास्त्रीय नियमों की अनदेखी करने से पूजा का शुभ फल नहीं मिलता, इसलिए इन सावधानियों का विशेष ध्यान रखें:
-
रविवार और एकादशी पर जल न चढ़ाएं: शास्त्रों के अनुसार, रविवार, एकादशी और सूर्य व चंद्र ग्रहण के दिन तुलसी जी को जल अर्पित नहीं किया जाता और न ही उनके पत्ते तोड़े जाते हैं, क्योंकि मान्यता है कि इन दिनों मां तुलसी भगवान श्रीहरि के निमित्त निर्जला व्रत में लीन रहती हैं।
-
अनावश्यक पत्ते न तोड़ें: सूर्यास्त के बाद कभी भी तुलसी दल नहीं तोड़ना चाहिए। यदि पूजा या भोग के लिए पत्ते चाहिए, तो दोपहर से पहले ही दोनों हाथ जोड़कर प्रार्थना करने के बाद हल्के हाथ से तोड़ें।
-
स्वच्छता का ध्यान: तुलसी के गमले के आसपास जूते-चप्पल, कूड़ादान, गंदे बर्तन या झाड़ू बिल्कुल न रखें। गमले के पास का वातावरण पूर्ण रूप से पवित्र और सुगंधित होना चाहिए।
-
अशुद्ध अवस्था में स्पर्श न करें: सूतक, पातक या मासिक धर्म के दिनों में तुलसी के पौधे का स्पर्श पूरी तरह वर्जित माना गया है।
Shashwat Lokwarta – State News,Up News देश-दुनिया