कौन है बलूचिस्तान का वो खूंखार कमांडर, जिसे BLA ने दिखाया बाहर का रास्ता; जिसने बड़े हमलों से हिला दी थी पाकिस्तानी सेना की नींव

पाकिस्तान के सबसे अशांत और रणनीतिक रूप से संवेदनशील प्रांत बलूचिस्तान में आजादी की जंग लड़ रहे सबसे खूंखार विद्रोही संगठन बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) के भीतर से एक बेहद अप्रत्याशित और चौंकाने वाली खबर सामने आई है। वर्षों से पाकिस्तानी सेना, खुफिया एजेंसी आईएसआई और फ्रंटियर कोर (FC) के नाक में दम करने वाले संगठन ने अपने एक बेहद असरदार और पुराने लड़ाके यानी शीर्ष कमांडर को औपचारिक रूप से बाहर का रास्ता दिखा दिया है। इस फैसले की पुष्टि बीएलए के आधिकारिक प्रवक्ता जीयंद बलोच द्वारा जारी एक विस्तृत बयान के जरिए हुई है, जिसमें बताया गया कि आंतरिक जांच, संगठन के तयशुदा संविधान और अनुशासन के गंभीर उल्लंघन के चलते यह सख्त कदम उठाया गया है। यह वही विद्रोही चेहरा है जिसने बलूचिस्तान के पहाड़ों से लेकर कराची, ग्वादर और क्वेटा की सड़कों तक पाकिस्तानी सुरक्षा बलों के खिलाफ कई खूनी ऑपरेशनों की रूपरेखा तैयार की थी। ऐसे में अपने ही सबसे असरदार सिपहसालार को निष्कासित किए जाने के इस फैसले ने न केवल बलोच विद्रोही गुटों में बल्कि रावलपिंडी के सैन्य मुख्यालय (जीएचक्यू) में भी हलचल मचा दी है।

कौन है यह चर्चित कमांडर और बलूचिस्तान के विद्रोह में क्या रही है उसकी खौफनाक भूमिका

बलूचिस्तान में जब भी आधुनिक गुरिल्ला युद्ध और आधुनिक हथियारों से लैस हमलों की बात होती है, तो इस कमांडर का नाम अग्रिम पंक्ति में लिया जाता रहा है। बीएलए के शुरुआती दिनों से लेकर इसके पुनर्गठन और आधुनिक आत्मघाती विंग यानी मजीद ब्रिगेड के विस्तार तक इस शख्स ने पर्दे के पीछे रहकर एक प्रमुख रणनीतिकार की भूमिका निभाई थी। स्थानीय बलोच युवाओं को गुरिल्ला ट्रेनिंग देना, बोलन, मस्तुंग, केच और पंजगुर के दुर्गम पहाड़ों में सुरक्षित ठिकाने बनाना और पाकिस्तानी सेना के काफिलों पर आईईडी (IED) और स्नाइपर हमलों का समन्वय करना इसकी मुख्य जिम्मेदारियों में शामिल था। वर्षों तक पाकिस्तान के सुरक्षा तंत्र के लिए सिरदर्द बने रहने की वजह से पाकिस्तानी खुफिया एजेंसियां इसे ‘मोस्ट वांटेड’ की सूची में रखकर तलाश कर रही थीं। इसके नेतृत्व में किए गए हमलों ने न केवल पाकिस्तानी फौज के कई वरिष्ठ अफसरों और जवानों को हताहत किया, बल्कि इस्लामाबाद को यह मानने पर मजबूर कर दिया था कि बलूचिस्तान में हालात उसके काबू से बाहर होते जा रहे हैं।

बीएलए ने आखिर क्यों लिया निष्कासन का कड़ा फैसला, आंतरिक अनुशासन या सत्ता की रार

बीएलए की सर्वोच्च कमान द्वारा जारी किए गए वक्तव्य में कहा गया है कि संगठन के भीतर किसी भी व्यक्ति का कद उसकी विचारधारा, नैतिक आचरण और संगठनात्मक अनुशासन से बड़ा नहीं हो सकता। संगठन के सूत्रों और रक्षा विश्लेषकों के अनुसार, निष्कासित कमांडर पर पिछले कुछ समय से संगठन के संसाधनों के दुरुपयोग, स्वतंत्र रूप से बिना अनुमति फैसले लेने, जमीनी लड़ाकों के बीच गुटबाजी को बढ़ावा देने और नेतृत्व के आदेशों की अवहेलना करने के आरोप लग रहे थे। बीएलए की केंद्रीय समिति ने एक आंतरिक जांच दल का गठन किया था, जिसकी विस्तृत रिपोर्ट आने के बाद कमांडर को अपनी स्थिति स्पष्ट करने का अवसर दिया गया। जब वह आरोपों पर संतोषजनक जवाब देने में नाकाम रहा, तो संगठन ने अपनी प्रतिष्ठा और आंतरिक एकजुटता को बनाए रखने के लिए उसे निष्कासित करने का अंतिम निर्णय ले लिया। साथ ही संगठन ने अपने सभी लड़ाकों और समर्थकों को चेतावनी दी है कि वे भविष्य में उक्त व्यक्ति से किसी भी प्रकार का सांगठनिक या वित्तीय संपर्क न रखें।

ऑपरेशन हेरोफ से लेकर सीपीईसी प्रोजेक्ट्स तक, जब इस कमांडर के प्लान ने उड़ाए थे पाकिस्तान के होश

यह निष्कासन इसलिए भी सबसे बड़ा चर्चा का विषय बना हुआ है क्योंकि यह वही कमांडर था जिसके नेटवर्क ने हाल के वर्षों में पाकिस्तान के बहुचर्चित ‘ऑपरेशन हेरोफ’ और चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) से जुड़े ठिकानों पर सबसे घातक प्रहार किए थे। ग्वादर बंदरगाह पर चीनी इंजीनियरों के काफिले पर हमला हो, कराची में रणनीतिक इमारतों को निशाना बनाना हो या फिर मस्तुंग और माछ में एक ही रात दर्जनों सुरक्षा चौकियों पर एक साथ धावा बोलना—इन सभी रणनीतियों में इस विद्रोही कमांडर के नेटवर्क की सक्रिय भूमिका रही थी। बीएलए की मजीद ब्रिगेड के अत्याधुनिक आत्मघाती दस्तों को लॉजिस्टिक सपोर्ट और सुरक्षित ठिकाने मुहैया कराने में भी इसका अहम दखल माना जाता था। इसके हमलों का असर इतना व्यापक था कि चीनी कंपनियों ने बलूचिस्तान में अपने प्रोजेक्ट्स की सुरक्षा को लेकर पाकिस्तान सरकार पर कड़ा दबाव बनाना शुरू कर दिया था और पाकिस्तानी सेना को बलूचिस्तान में अपने अतिरिक्त डिवीजन तैनात करने पड़े थे।

क्या कमजोर होगा बलोच विद्रोह या बीएलए के भीतर पैदा होगा नया सशस्त्र गुट

सैन्य और रणनीतिक मामलों के जानकारों का मानना है कि बीएलए जैसे कैडर-आधारित संगठन से किसी दिग्गज कमांडर का बाहर होना एक दोधारी तलवार की तरह है। एक तरफ बीएलए ने यह संदेश दिया है कि उसका अनुशासन किसी भी व्यक्ति से ऊपर है, लेकिन दूसरी तरफ जमीनी हकीकत यह भी है कि ऐसे निष्कासनों से अक्सर असंतुष्ट धड़े अलग होकर नया गुट बना लेते हैं। अतीत में भी जब बलोच विद्रोही संगठनों में आंतरिक मतभेद उभरे, तो बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट (BLF), बलोच रिपब्लिकन आर्मी (BRA) और बलूचिस्तान नेशनलिस्ट आर्मी (BNA) जैसे नए संगठनों का जन्म हुआ। यदि निष्कासित कमांडर अपने वफादार लड़ाकों के साथ मिलकर कोई स्वतंत्र विद्रोही गुट खड़ा करता है, तो इससे बलूचिस्तान के संघर्ष में एक नया और जटिल मोड़ आ सकता है। वहीं यह भी देखना होगा कि क्या यह स्थिति पाकिस्तानी सुरक्षा बलों को विद्रोही कमान में सेंध लगाने का कोई मौका देती है या फिर यह धुरंधर अपने बलबूते पर इस्लामाबाद के खिलाफ एक नया मोर्चा खोलता है।

पाकिस्तानी सेना और खुफिया तंत्र की पैनी नजर, आने वाले दिनों में बदल सकते हैं बलूचिस्तान के समीकरण

इस निष्कासन के बाद पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आईएसआई और सेना की नजरें पूरे घटनाक्रम पर टिक गई हैं। पाकिस्तान हमेशा से बलोच विद्रोही गुटों में फूट डालने और नाराज कमांडरों को आत्मसमर्पण कराने या अपने पक्ष में करने की रणनीति पर काम करता रहा है, जैसा कि पूर्व में सरफराज बंगुलजई और गुलजार इमाम शम्बे के मामलों में देखा गया था। हालांकि, निष्कासित कमांडर की गहरी बलोच राष्ट्रवादी पृष्ठभूमि और पाकिस्तान विरोधी तेवर को देखते हुए विश्लेषकों का मानना है कि उसका रुख अभी भी पाकिस्तान की सत्ता के खिलाफ ही रहेगा। आने वाले हफ्तों में यह साफ हो जाएगा कि इस संगठनात्मक बदलाव का असर बलूचिस्तान की जमीनी जंग, विद्रोही हमलों की तीव्रता और पाकिस्तानी सुरक्षा तंत्र के अभियानों पर किस रूप में पड़ता है। एक बात पूरी तरह तय है कि बीएलए की इस बड़ी आंतरिक सर्जरी ने बलूचिस्तान के जटिल भू-राजनीतिक संघर्ष को एक बेहद नाजुक और अप्रत्याशित मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है।

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