
दीपावली के पंचमहोत्सव का दूसरा दिन यानी कार्तिक कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को ‘छोटी दिवाली’, ‘नरक चतुर्दशी’ और ‘रूप चौदस’ के रूप में श्रद्धाभाव से मनाया जाता है। इस दिन मृत्यु के देवता यमराज के निमित्त दीपदान करने और अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति पाने के लिए चौमुखा दीपक जलाने का विधान है। हालांकि, इस पावन अवसर पर पंचांगीय गणनाओं के अनुसार भद्रा का साया रहने से श्रद्धालुओं के बीच पूजा और दीपदान के समय को लेकर असमंजस की स्थिति बन गई है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार चतुर्दशी तिथि के दौरान भद्रा का प्रभाव देर रात 11 बजकर 06 मिनट तक बना रहेगा। शास्त्रों में भद्रा काल को मांगलिक और शुभ कार्यों के लिए वर्जित माना गया है, विशेष रूप से होलिका दहन और रक्षाबंधन जैसे पर्वों में भद्रा का सख्त परिहार किया जाता है। परंतु जब बात यम दीपदान, पितरों के तर्पण या संकट निवारण के लिए किए जाने वाले अनुष्ठानों की आती है, तो इसके नियम सामान्य शुभ कार्यों से भिन्न होते हैं। विद्वानों का मत है कि यमराज के निमित्त दीप प्रज्वलन किसी लौकिक मांगलिक कार्य की श्रेणी में न आकर शांति और सुरक्षा का अनुष्ठान है, इसलिए प्रदोष वेला में निर्धारित नियमों का पालन करते हुए दीपदान संपन्न किया जा सकता है।
भद्रा का वास और उसका वास्तविक प्रभाव: पृथ्वी पर कब रहता है संकट?
वैदिक ज्योतिष के अनुसार भद्रा के फल का विचार उसके ‘वास’ (स्थान) के आधार पर किया जाता है। जब चंद्रमा मेष, वृषभ, मिथुन या वृश्चिक राशि में होता है, तब भद्रा का वास स्वर्गलोक में माना जाता है। जब चंद्रमा कन्या, तुला, धनु या मकर राशि में हो, तो भद्रा पाताल लोक में वास करती है। केवल कर्क, सिंह, कुंभ और मीन राशि के चंद्रमा के समय ही भद्रा का वास मृत्युलोक यानी पृथ्वी पर माना जाता है। शास्त्रों का स्पष्ट कथन है कि जब भद्रा स्वर्ग या पाताल में स्थित होती है, तो उसका कुप्रभाव पृथ्वी के निवासियों पर नहीं पड़ता, बल्कि वह शुभ फलदायी मानी जाती है। छोटी दिवाली के दिन बनने वाली खगोलीय स्थिति में भद्रा का वास पृथ्वी पर न होकर अन्य लोकों में होने से जनसामान्य को अत्यधिक भयभीत होने की आवश्यकता नहीं है। फिर भी, शास्त्रों की मर्यादा और परंपरा को ध्यान में रखते हुए संध्याकाल में प्रदोष वेला के दौरान शुभ चौघड़िया मुहूर्त में दीपदान करना ही सर्वमान्य और कल्याणकारी माना गया है।
यम दीपदान का सबसे शुभ मुहूर्त: प्रदोष काल में ऐसे करें दीप प्रज्वलन
नरक चतुर्दशी के दिन दीपदान सदैव सूर्यास्त के बाद यानी प्रदोष काल में किया जाता है। इस दिन प्रदोष काल का समय शाम 5 बजकर 32 मिनट से आरंभ होकर रात 8 बजकर 12 मिनट तक रहेगा। यदि चौघड़िया मुहूर्त की बात करें, तो शाम 5 बजकर 35 मिनट से शाम 7 बजकर 15 मिनट तक ‘लाभ’ और ‘अमृत’ का चौघड़िया विद्यमान रहेगा, जो यमराज के निमित्त चौमुखा दीपक निकालने के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। इस समय अवधि में दीपदान करने से घर के सभी वास्तु दोष, नकारात्मक ऊर्जा और अनहोनी का भय समाप्त होता है। जो श्रद्धालु भद्रा की समाप्ति के पश्चात दीपदान करना चाहते हैं, वे रात 11 बजकर 06 मिनट के बाद निशीथ काल में भी मुख्य द्वार पर दीपक स्थापित कर सकते हैं, क्योंकि चतुर्दशी की अर्धरात्रि का समय तांत्रिक और शांति अनुष्ठानों के लिए भी विशेष फलदायी कहा गया है।
यम के निमित्त दीपदान की सही विधि और दिशा का नियम
यम दीपदान सामान्य पूजा के दीपकों से पूरी तरह भिन्न होता है। इसे करते समय शास्त्रों में बताए गए नियमों का कड़ाई से पालन करना अनिवार्य है:
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दीपक का स्वरूप: यम दीपदान के लिए मिट्टी या गूंथे हुए आटे का एक बड़ा चौमुखा दीपक बनाया जाता है। इसमें चार बत्तियां (चारों दिशाओं की ओर मुख किए हुए) लगाई जाती हैं।
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तेल का चयन: इस दीपक में शुद्ध सरसों का तेल या तिल का तेल भरा जाता है। इसमें काले तिल, एक सिक्का और थोड़ी सी कौड़ी या लौंग डालना अत्यंत शुभ माना जाता है।
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दिशा और स्थान: यमराज दक्षिण दिशा के अधिपति हैं, इसलिए इस दीपक को घर के मुख्य द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर मुख करके रखा जाता है। ध्यान रखें कि इस दीपक को घर के भीतर नहीं जलाया जाता, बल्कि पूजा स्थल पर प्रज्वलित करने के बाद इसे आदरपूर्वक बाहर ले जाकर स्थापित किया जाता है।
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अंतिम सदस्य का नियम: परिवार के सभी सदस्यों के हाथ-पैर धोने और विश्राम की तैयारी के समय, प्रायः घर का सबसे वरिष्ठ सदस्य इस दीपक को बाहर रखता है। दीपक रखते समय ‘मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन श्यामया सह। त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम॥’ मंत्र का उच्चारण करते हुए अकाल मृत्यु से रक्षा की प्रार्थना की जाती है। दीप रखने के बाद पीछे मुड़कर नहीं देखा जाता।
रूप चौदस और अभ्यंग स्नान का धार्मिक महत्व
छोटी दिवाली को ‘रूप चौदस’ भी कहा जाता है। इस दिन सूर्योदय से पूर्व उबटन लगाकर स्नान (अभ्यंग स्नान) करने की प्राचीन परंपरा है। मान्यता है कि इस दिन तिल के तेल और औषधीय उबटन से स्नान करने पर शरीर को नवऊर्जा और सौंदर्य की प्राप्ति होती है तथा नरक की यातनाओं से मुक्ति मिलती है। शाम के समय घर की नालियों, चौखटों, कूड़ेदान के समीप और तुलसी के पौधे के पास छोटे-छोटे दीये जलाकर पूरे घर को प्रकाशित किया जाता है, जिससे दिवाली की महालक्ष्मी पूजा के लिए घर का वातावरण पूर्णतः शुद्ध और नकारात्मकता से मुक्त हो सके।
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