
भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ सांसद निशिकांत दुबे ने देश के विभाजन और सीमांकन को लेकर एक बड़ा और चौंकाने वाला बयान देकर राष्ट्रीय राजनीति में नई बहस छेड़ दी है। समाचार एजेंसी से बातचीत के दौरान गोड्डा से भाजपा सांसद ने कहा कि अब भारत को केवल पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) को वापस लेने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि विभाजन के दौरान कांग्रेस नेतृत्व द्वारा तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान (वर्तमान बांग्लादेश) को सौंपे गए तीन प्रमुख क्षेत्रों—चटगांव बंदरगाह (Chittagong Port), सिलहट (Sylhet) और नोआखली (Noakhali)—को भी भारत में पुनः शामिल करने का समय आ गया है। उन्होंने कहा कि पूर्व प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के समय लिए गए त्रुटिपूर्ण निर्णयों और जल्दबाजी के कारण देश के कई अभिन्न अंग भारत से अलग हो गए, जिन्हें अब दुरुस्त करने की आवश्यकता है।
प्राचीन ‘टिपरा’ साम्राज्य का हिस्सा थे ये तीनों क्षेत्र: ऐतिहासिक दावों का हवाला
भाजपा सांसद ने अपने तर्क के समर्थन में पूर्वोत्तर के इतिहास और प्राचीन त्रिपुरा राज्य का उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि त्रिपुरा को ऐतिहासिक रूप से ‘टिपरा’ साम्राज्य के नाम से जाना जाता था, और नोआखली, सिलहट व चटगांव बंदरगाह इसी रियासत के भू-भाग का अभिन्न अंग हुआ करते थे।
निशिकांत दुबे ने दावा किया:
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महाराजा बीर बिक्रम सिंह का विरोध: विभाजन के समय त्रिपुरा के तत्कालीन राजा बीर बिक्रम किशोर माणिक्य बहादुर ने पंडित नेहरू की बातचीत और नीतियों पर सवाल खड़े किए थे। राजा का कहना था कि नोआखली को पाकिस्तान को कैसे दिया जा सकता है और सिलहट व चटगांव पर उनकी अनुमति के बिना जनमत संग्रह का फैसला कैसे हो सकता है?
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महारानी को अंधेरे में रखने का आरोप: उन्होंने ‘टिपरा मोथा पार्टी’ के प्रमुख प्रद्योत बिक्रम माणिक्य देबबर्मा के हालिया बयानों का समर्थन करते हुए कहा कि मई 1947 में महाराजा के देहांत के बाद महारानी कंचन प्रभा देवी को अंधेरे में रखकर इन भू-भागों को पूर्वी पाकिस्तान का हिस्सा बना दिया गया। बाद में सरदार वल्लभभाई पटेल की पहल और सेना की तैनाती के बाद अक्टूबर 1948 में जाकर त्रिपुरा का औपचारिक विलय भारत में संभव हो सका था।
चटगांव बंदरगाह छिनने से रुका पूर्वोत्तर का विकास: दुबे का आर्थिक तर्क
निशिकांत दुबे ने इस पूरे विषय को केवल क्षेत्रीय दावों तक सीमित न रखते हुए पूर्वोत्तर भारत के आर्थिक पिछड़ेपन से भी सीधे जोड़ा। उन्होंने कहा कि चटगांव बंदरगाह भारत के हाथ से निकल जाने के कारण ही पूरा पूर्वोत्तर क्षेत्र दशकों तक मुख्य भूमि से कटा हुआ महसूस करता रहा।
सांसद ने स्पष्ट किया:
“अगर आज पूर्वोत्तर का क्षेत्र कई चुनौतियों से जूझता है और वहां के प्रचुर प्राकृतिक गैस, कोयले और खनिज संसाधनों का पूर्ण दोहन नहीं हो पा रहा है, तो इसकी सबसे बड़ी वजह यही है कि हमारे पास चटगांव जैसा रणनीतिक और प्राकृतिक बंदरगाह नहीं रहा। यदि यह बंदरगाह भारत के पास रहता, तो ‘चिकन नेक’ (सिलीगुड़ी कॉरिडोर) पर भारत की निर्भरता कम होती और पूर्वोत्तर का समुद्री व्यापार दुनिया भर के बाजारों से सीधे जुड़ जाता। इसलिए समग्र विकास के लिए इतिहास की इस भूल को सुधारना जरूरी है।’
नोआखली नरसंहार और तत्कालीन अंतरिम सरकार पर गंभीर आरोप
अपने बयान में भाजपा सांसद ने 1946 के नोआखली दंगों का भी विस्तार से जिक्र किया। उन्होंने आरोप लगाया कि 15 अगस्त 1947 की आजादी से पहले ही 2 सितंबर 1946 को पंडित नेहरू अंतरिम सरकार के प्रमुख बन चुके थे। उसी दौरान मुस्लिम लीग ने ‘डायरेक्ट एक्शन’ का रास्ता चुना और 15 अक्टूबर 1946 को नोआखली में हिंदू समुदाय के खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसा और कत्लेआम हुआ। दुबे ने आरोप लगाया कि उस गंभीर संकट के समय अंतरिम सरकार की प्राथमिकता मुस्लिम लीग को सत्ता में साझीदार बनाए रखने की थी, जिसके चलते जमीनी हकीकत और सीमांकन से जुड़े हितों की अनदेखी की गई।
पड़ोसी देशों की राजनीतिक अस्थिरता के बीच बयान के सियासी मायने
निशिकांत दुबे का यह बयान ऐसे समय में सामने आया है जब बांग्लादेश में तख्तापलट के बाद अंतरिम सरकार के दौर में राजनीतिक उथल-पुथल बनी हुई है और पूर्वोत्तर में सीमाई सुरक्षा व अवैध घुसपैठ को लेकर केंद्र सरकार बेहद सतर्क है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा सांसद का यह बयान केवल एक व्यक्तिगत टिप्पणी नहीं है, बल्कि यह विभाजन के अनसुलझे सीमाई विवादों, पूर्वोत्तर की सुरक्षा चिंताओं और कांग्रेस के ऐतिहासिक फैसलों पर लगातार आक्रामक रहने की भाजपा की व्यापक वैचारिक रणनीति का हिस्सा है। इस बयान के बाद संसद के आगामी सत्रों और राष्ट्रीय बहस में पूर्वोत्तर की सीमाओं और विभाजन के ऐतिहासिक दस्तावेजों को लेकर एक नया विवाद खड़ा होना तय माना जा रहा है।
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