
दीपावली के महापर्व की शृंखला में कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी तिथि, जिसे सामान्य बोलचाल में ‘नरक चतुर्दशी’ या ‘छोटी दिवाली’ कहा जाता है, अत्यंत पावन मानी जाती है। उत्तर भारत की कई प्राचीन परंपराओं और वाल्मीकि रामायण से जुड़े संदर्भों के अनुसार, इसी कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी की मध्यरात्रि में रुद्रावतार पवनपुत्र हनुमान जी का प्राकट्य हुआ था। चैत्र पूर्णिमा के अलावा इस दिन को भी ‘हनुमान जन्मोत्सव’ के रूप में बड़े उल्लास और भक्तिभाव से मनाया जाता है। धार्मिक मान्यता है कि इस पावन तिथि की संध्या और निशाकाल (रात्रि) में बजरंगबली की उपासना करने से जीवन के सभी भय, मानसिक संताप, ग्रह बाधाएं और नकारात्मक शक्तियां क्षणभर में दूर हो जाती हैं।
आज शाम को इस सरल विधि से करें बजरंगबली का पूजन
हनुमान जी को कलयुग का जाग्रत देवता माना जाता है, जो अपने भक्तों के सच्चे भाव और सादगीपूर्ण समर्पण से अति शीघ्र प्रसन्न होते हैं। आज शाम को पूजा करते समय इस क्रम का पालन करना विशेष फलदायी माना जाता है:
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पवित्रता और शुद्धि: संध्याकाल में स्नान के उपरांत लाल या नारंगी रंग के स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर के उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) या पूर्व दिशा में एक लकड़ी की चौकी स्थापित करें और उस पर लाल कपड़ा बिछाएं।
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मूर्ति या चित्र की स्थापना: चौकी पर श्री हनुमान जी की ऐसी प्रतिमा या चित्र रखें जिसमें वे प्रभु श्रीराम के चरणों में सेवाभाव से बैठे हों अथवा आशीर्वाद मुद्रा में हों। पास ही में श्री राम दरबार की तस्वीर रखना भी अत्यंत शुभ माना जाता है।
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दीपक प्रज्वलन: पूजा के आरंभ में चमेली के तेल अथवा गाय के शुद्ध देसी घी का दीपक प्रज्वलित करें। हनुमान जी को चमेली का तेल और सुगंध अत्यधिक प्रिय है। साथ ही अगरबत्ती या धूप जलाकर वातावरण को सुगंधित करें।
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सिंदूर और चोला अर्पण: यदि धातु या पत्थर की मूर्ति हो, तो जल से आचमन कराने के बाद चमेली के तेल में नारंगी सिंदूर घोलकर अर्पित करें। यदि चित्र हो, तो अनामिका उंगली से तिलक लगाएं।
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पुष्प और नैवेद्य: लाल गुलाब, गेंदे के फूल या आक के फूलों की माला चढ़ाएं। भोग के रूप में बूंदी, बेसन के लड्डू, भुने चने व गुड़, या पके केले अर्पित करें। ध्यान रखें कि हर भोग सामग्री पर धुला हुआ तुलसी दल अवश्य रखें, क्योंकि तुलसी दल के बिना पवनपुत्र भोग स्वीकार नहीं करते।
चमेली का तेल और चौमुखा दीपक: शाम के समय नकारात्मकता दूर करने का उपाय
चतुर्दशी की शाम को यमराज के निमित्त चौमुखा दीपक जलाने के साथ-साथ हनुमान जी के आगे सरसों के तेल या तिल के तेल का एक बड़ा चौमुखा दीपक प्रज्वलित करना अत्यंत कल्याणकारी कहा गया है। इसमें दो लौंग के जोड़े डालकर जलाने से घर में व्याप्त किसी भी प्रकार की नकारात्मक ऊर्जा और नजर दोष का नाश होता है। दीपक जलाकर हाथ में थोड़ा जल लेकर अपनी मनोकामना का स्मरण करें और संकल्प लें। इसके उपरांत आसन पर बैठकर एकाग्र मन से स्तुति पाठ की ओर अग्रसर हों।
हनुमान चालीसा के पाठ का सही नियम और ध्यान रखने योग्य बातें
गोस्वामी तुलसीदास द्वारा रचित चालीस चौपाइयों वाली यह स्तुति संकटमोचन की आराधना का सबसे सुगम और सिद्ध माध्यम है। आज के दिन पाठ करते समय कुछ आवश्यक नियमों का ध्यान रखना चाहिए:
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मानसिक संकल्प और श्री राम का स्मरण: पाठ आरंभ करने से पहले दो मिनट आंखें बंद करके प्रभु श्री राम और माता सीता का ध्यान करें। राम नाम के स्मरण के बिना हनुमान जी की पूजा अधूरी मानी जाती है।
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शुद्ध उच्चारण और लय: पाठ बहुत जल्दबाजी में न करें। प्रत्येक शब्द का उच्चारण स्पष्ट और शांत भाव से होना चाहिए।
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संख्या का महत्व: आज के विशेष अवसर पर 1, 3, 7 या 11 बार पाठ करना अत्यंत लाभकारी माना जाता है। यदि समय की कमी हो, तो कम से कम एक बार पूर्ण एकाग्रता से पाठ अवश्य संपन्न करें।
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आरती और क्षमा प्रार्थना: पाठ पूरा होने के बाद खड़े होकर कर्पूर जलाएं और ‘आरती कीजै हनुमान लला की’ गाते हुए विधिवत आरती करें। अंत में अज्ञानतावश हुई किसी भी भूल के लिए क्षमा प्रार्थना करते हुए प्रसाद सभी में वितरित करें।
आज के दिन इन कार्यों से बचें
हनुमान जी की उपासना में शुचिता और संयम का सबसे बड़ा महत्व है। आज के दिन तामसिक भोजन (प्याज, लहसुन, मांस-मदिरा) का सेवन पूरी तरह वर्जित रखें। परिवार के भीतर किसी भी प्रकार के वाद-विवाद, क्रोध या कटु शब्दों के प्रयोग से बचें। शुद्ध मन और परोपकार की भावना से की गई यह संध्या उपासना घर में आरोग्य, समृद्धि और असीम शांति का संचार करती है।
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