
अमेरिका में संपन्न हुए मध्यावधि चुनावों (Midterm Elections) में सत्तारूढ़ रिपब्लिकन पार्टी और पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रभाव को बड़ा झटका लगा है। चुनावों में विपक्षी डेमोक्रेटिक पार्टी ने अमेरिकी संसद के दोनों सदनों—प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) और सीनेट (Senate)—में मजबूत बढ़त बनाकर बहुमत की दिशा में कदम बढ़ा दिया है। इस अप्रत्याशित चुनावी परिणाम के बाद दुनिया भर के भू-राजनीतिक विश्लेषक इसके वैश्विक प्रभावों का आकलन कर रहे हैं। भारत में भी इस बात की खूब चर्चा हो रही है कि क्या इस नतीजे से भारत-अमेरिका संबंधों, व्यापारिक नीतियों, टैरिफ विवाद और सामरिक साझेदारियों पर कोई सकारात्मक या नकारात्मक बदलाव देखने को मिलेगा। इसी संदर्भ में भारत के पूर्व केंद्रीय विदेश राज्य मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ सांसद शशि थरूर ने अपनी स्पष्ट राय रखी है।
‘भारत को ज्यादा खुश होने की जरूरत नहीं’: भारत-अमेरिका नीति पर शशि थरूर का बेबाक विश्लेषण
अमेरिकी चुनाव नतीजों पर प्रतिक्रिया देते हुए शशि थरूर ने साफ शब्दों में कहा कि जो लोग यह उम्मीद लगाए बैठे हैं कि ट्रंप की पार्टी की हार से भारत के लिए हालात रातों-रात बदल जाएंगे, उन्हें ज्यादा खुश होने की आवश्यकता नहीं है। थरूर के अनुसार, इस चुनाव परिणाम का भारत-अमेरिका संबंधों और अमेरिका की प्रमुख विदेश नीतियों पर बेहद सीमित असर पड़ेगा। उन्होंने रेखांकित किया कि चाहे रूस से कच्चे तेल की खरीद का मसला हो, भारतीय उत्पादों पर अमेरिकी टैरिफ का मुद्दा हो या फिर अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों की बात हो—अमेरिका का बुनियादी रुख इन विषयों पर बदलने वाला नहीं है। थरूर ने स्पष्ट किया कि भारत के प्रति अमेरिका की द्विदलीय (Bipartisan) सहमति दशकों से मजबूत रही है, इसलिए राष्ट्रपति की पार्टी चुनाव हारे या जीते, कूटनीतिक धरातल पर भारत को अपनी निरंतर वार्ताओं और रणनीतिक हितों पर खुद ही अडिग रहना होगा।
घरेलू मामलों में ‘लेम डक’ होंगे ट्रंप, लेकिन विदेश नीति और युद्ध के फैसलों पर रहेगा पूरा नियंत्रण
शशि थरूर ने अमेरिकी संविधान और सत्ता संरचना की बारीकियों को समझाते हुए बताया कि मध्यावधि चुनावों में दोनों सदनों का नियंत्रण खोने के बाद राष्ट्रपति घरेलू मामलों में ‘लेम डक’ (कमजोर स्थिति) बन जाते हैं। अमेरिकी संसद यानी कांग्रेस के पास वित्तीय और बजट आवंटन से जुड़ी निर्णायक शक्तियां होती हैं, जिससे वे राष्ट्रपति की घरेलू योजनाओं, टैक्स सुधारों और बजटीय प्रस्तावों को रोक सकते हैं। हालांकि, जब बात अंतरराष्ट्रीय मामलों, विदेश नीति, रक्षा समझौतों या किसी देश के खिलाफ सैन्य कार्रवाई और प्रतिबंधों की आती है, तो अमेरिकी राष्ट्रपति के पास व्यापक कार्यकारी विशेषाधिकार होते हैं। थरूर ने कहा कि विदेश नीति के मोर्चे पर डोनाल्ड ट्रंप को रोकने वाला कोई नहीं है और वे अंतरराष्ट्रीय पटल पर अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार ही फैसले लेते रहेंगे। इसलिए यह मान लेना भूल होगी कि संसद में अल्पमत में आने से अमेरिकी प्रशासन की वैश्विक और व्यापारिक नीतियां पूरी तरह बदल जाएंगी।
भारत के लिए क्या हैं सीख और आगे का कूटनीतिक रास्ता
शशि थरूर ने सुझाव दिया कि भारत को इस राजनीतिक बदलाव को बहुत ही व्यावहारिक नजरिए से देखना चाहिए। नई दिल्ली को व्यापार, टैरिफ, रक्षा सौदों और ऊर्जा सुरक्षा (विशेषकर रूस से तेल खरीद) को लेकर अमेरिकी प्रशासन के साथ अपनी कूटनीतिक बातचीत निरंतर और आक्रामक रूप से जारी रखनी चाहिए। उन्होंने यह भी उम्मीद जताई कि संसद में नए समीकरण बनने से भारतीय प्रवासियों के प्रति बनने वाले नकारात्मक माहौल में कमी आ सकती है और अमेरिकी कांग्रेस में भारत के समर्थक सांसदों की मौजूदगी कूटनीतिक संतुलन साधने में मददगार साबित होगी। अंततः थरूर ने दोहराया कि मध्यावधि चुनाव अमेरिकी लोकतंत्र में एक स्वाभाविक कोर्स करेक्शन (सुधार) का माध्यम होते हैं, लेकिन भारत को अपनी सामरिक स्वायत्तता और आर्थिक हितों की रक्षा के लिए अपनी नीतियों पर ही भरोसा करना होगा।
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