…तो नक्शे से मिट जाता इजरायल और मिडिल ईस्ट’, अमेरिकी मिडटर्म चुनाव में करारी हार के बाद डोनाल्ड ट्रंप का सनसनीखेज दावा

अमेरिका में हाल ही में संपन्न हुए मध्यावधि (मिडटर्म) चुनावों में रिपब्लिकन पार्टी को लगे बड़े राजनीतिक झटके और कांग्रेस के दोनों सदनों में डेमोक्रेट्स के बढ़ते दबदबे के बाद डोनाल्ड ट्रंप ने अपनी सैन्य रणनीतियों और फैसलों का खुलकर बचाव किया है। चुनावों में पार्टी के निराशाजनक प्रदर्शन पर आत्ममंथन करने के बजाय ट्रंप ने एक बार फिर अपने चिरपरिचित आक्रामक अंदाज में बड़ा भू-राजनीतिक दावा ठोक दिया है। उन्होंने साफ कहा कि अगर उन्होंने राष्ट्रपति रहते हुए ईरान के खिलाफ कड़े कदम न उठाए होते और तेहरान के परमाणु कार्यक्रमों पर नकेल न कसी होती, तो आज इजरायल का नामोनिशान मिट चुका होता और पूरा मध्य पूर्व (मिडिल ईस्ट) जलकर खाक हो गया होता। ट्रंप ने माना कि मिडटर्म चुनाव में उनकी पार्टी को मिली हार के पीछे ईरान युद्ध और पश्चिम एशिया में जारी सैन्य तनाव एक बड़ा कारक रहा, क्योंकि जनता महंगाई और युद्ध की बढ़ती लागत से नाराज थी।

‘मेरा फैसला चुनावी नतीजों से कहीं ज्यादा बड़ा था’: अपनी नीतियों पर अड़े रहे ट्रंप

चुनावी नतीजों पर प्रतिक्रिया देते हुए ट्रंप ने मीडिया साक्षात्कारों में स्पष्ट किया कि वे अपने फैसलों को लेकर तनिक भी पछतावे में नहीं हैं। उन्होंने कहा, “मुझे पता है कि इस हार की एक बड़ी वजह ईरान के खिलाफ छेड़ी गई जंग रही, लेकिन चुनाव जीतने से कहीं ज्यादा अहम दुनिया को एक बड़े परमाणु संकट से बचाना था। आप आतंकवाद को पालने-पोसने वाले किसी देश को परमाणु हथियार हासिल करने की खुली छूट नहीं दे सकते।” ट्रंप के मुताबिक, उनके उठाए गए सख्त कदमों के कारण ही इजरायल आज सुरक्षित खड़ा है। उन्होंने जोर देकर कहा कि अगर अमेरिका ने सैन्य हस्तक्षेप न किया होता, तो परमाणु हथियारों से लैस ईरान पूरे क्षेत्र को अपनी आग में झोंक चुका होता, और ऐसी स्थिति में न तो इजरायल बचता और न ही खाड़ी के दूसरे मुल्क।

वाइस प्रेसिडेंट जेडी वेंस का विश्लेषण और अमेरिकी जनता का ‘नो टू वॉर’ संदेश

दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप प्रशासन के भीतर भी इस सैन्य रणनीति की राजनीतिक कीमत को लेकर असंतोष खुलकर सामने आया है। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी चुनाव परिणामों का विश्लेषण करते हुए यह सार्वजनिक रूप से स्वीकार किया कि विदेश में लड़े जा रहे अंतहीन युद्धों और इजरायल को दी जाने वाली अरबों डॉलर की सैन्य सहायता ने अमेरिकी मतदाताओं, विशेष रूप से रिपब्लिकन बेस को गहराई से निराश किया है। ट्रंप ने वेंस के इस आकलन को ‘काफी हद तक सच’ करार दिया, लेकिन साथ ही यह तर्क दोहराया कि राष्ट्रीय सुरक्षा के कुछ फैसले राजनीतिक लाभ-हानि से ऊपर होते हैं। वहीं दूसरी ओर, वाशिंगटन में हुए इस सत्ता परिवर्तन पर तेहरान ने भी तीखा तंज कसा है। ईरानी संसद के स्पीकर मोहम्मद बाघेर गालीबाफ ने नतीजों पर कहा कि अमेरिकी अवाम ने स्पष्ट रूप से युद्ध को ‘ना’ कह दिया है और ट्रंप की आक्रामक नीतियों को सिरे से नकार दिया है।

इजरायल को सैन्य मदद बंद करने की अटकलें और भविष्य की अमेरिकी नीति

चुनावी जख्मों के बाद वॉशिंगटन के गलियारों में अब इजरायल और अमेरिका के रिश्तों को लेकर भी नई बहस छिड़ गई है। चुनाव से ठीक पहले और नतीजों के तुरंत बाद ट्रंप द्वारा इजरायल को दी जाने वाली करीब 4 अरब डॉलर की वार्षिक सैन्य सहायता की समीक्षा करने या उसमें कटौती करने के संकेतों ने तेल अवीव की चिंताएं बढ़ा दी हैं। अमेरिकी रक्षा तंत्र और विश्लेषकों का मानना है कि दोनों सदनों में विपक्ष का पलड़ा भारी होने के बाद व्हाइट हाउस के लिए पश्चिम एशिया में नई सैन्य कार्रवाई करना लगभग असंभव हो जाएगा। इसके बावजूद, ट्रंप द्वारा चुनावी झटके के तुरंत बाद इजरायल के अस्तित्व को अपने साहसिक फैसलों से जोड़कर पेश करना यह साबित करता है कि वे आने वाले दिनों में अपनी विदेश नीति को सही ठहराने के लिए ‘मिडिल ईस्ट रक्षक’ के नैरेटिव को और धार देने की तैयारी में हैं।

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