
देशभर के पेट्रोल पंपों पर बिकने वाले ईंधन में एथेनॉल के प्रतिशत की सार्वजनिक जानकारी देने की मांग को लेकर दायर की गई जनहित याचिका पर देश की सर्वोच्च अदालत ने बेहद सख्त और स्पष्ट रुख अपनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर लंबी सुनवाई करने के बजाय पहली ही नजर में इसे खारिज कर दिया। याचिकाकर्ता की मुख्य मांग यह थी कि जब कोई उपभोक्ता अपनी जेब से पूरा पैसा देकर पेट्रोल खरीदता है, तो उसे यह जानने का बुनियादी अधिकार होना चाहिए कि उसकी गाड़ी के टैंक में जा रहे पेट्रोल में कितने प्रतिशत एथेनॉल मिलाया गया है। अदालत ने इस मामले को कार्यपालिका और सरकार की नीतिगत नीतियों का हिस्सा मानते हुए इसमें न्यायिक हस्तक्षेप करने से पूरी तरह इनकार कर दिया।
यह फैसला ऐसे समय में आया है जब देश के अलग-अलग हिस्सों—दिल्ली-एनसीआर, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक समेत तमाम राज्यों के वाहन चालक एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (E20 Fuel) के माइलेज और इंजन की उम्र पर पड़ने वाले असर को लेकर लगातार चर्चाएं कर रहे हैं। सर्वोच्च अदालत के इस रुख ने साफ कर दिया है कि राष्ट्रीय स्तर पर लागू की जा रही ऊर्जा नीतियों को अदालती मुकदमों के जरिए रोकना या संशोधित करना संभव नहीं होगा।
याचिकाकर्ता की मुख्य दलील: उपभोक्ता अधिकार बनाम पारदर्शिता का सवाल
सुप्रीम कोर्ट में दायर इस याचिका में उपभोक्ता संरक्षण कानून और पारदर्शिता के सिद्धांतों का हवाला दिया गया था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि जिस तरह किसी खाद्य पदार्थ या डिब्बाबंद सामान पर उसकी सामग्री (Ingredients) की पूरी जानकारी लिखना अनिवार्य होता है, ठीक उसी तरह पेट्रोल पंप की मशीनों पर भी यह साफ-साफ दर्ज होना चाहिए कि ग्राहक को जो ईंधन दिया जा रहा है, उसमें 10%, 15% या 20% में से कितना एथेनॉल मौजूद है।
दलील में यह भी कहा गया था कि भारत की सड़कों पर दौड़ने वाले लाखों वाहन पुराने मानकों (BS-III और BS-IV) के हैं, जिनके इंजन 20% तक एथेनॉल वाले ईंधन को पूरी तरह सहन करने के लिए डिजाइन नहीं किए गए थे। ऐसे में यदि किसी उपभोक्ता को यह नहीं पता होगा कि उसे कौन सा फ्यूल मिल रहा है, तो उसके वाहन के फ्यूल इंजेक्शन सिस्टम, रबर पाइप और कार्बोरेटर को नुकसान पहुंच सकता है। याचिकाकर्ता का कहना था कि यह केवल वाहन का सवाल नहीं है, बल्कि उपभोक्ता के सूचना पाने के मौलिक अधिकार से जुड़ा गंभीर मसला है।
सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख: नीतिगत फैसलों में अदालती दखल की सीमा
प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने इस याचिका को सुनते ही स्पष्ट किया कि देश की ऊर्जा नीति, ईंधन के मानक और पर्यावरण संबंधी नियम तय करना केंद्र सरकार और संबंधित तकनीकी विशेषज्ञों का विशेषाधिकार है। अदालतें हर उस प्रशासनिक व्यवस्था में दखल नहीं दे सकतीं जो विशेषज्ञों की गहन रिसर्च और राष्ट्रीय नीतियों के आधार पर बनाई जाती हैं।
पीठ ने टिप्पणी की कि सरकार ने एथेनॉल ब्लेंडिंग प्रोग्राम (EBP) को एक व्यापक आर्थिक, पर्यावरणीय और कृषि सुधार के रूप में लागू किया है। इसके लिए मानक संचालन प्रक्रियाएं और तकनीकी दिशा-निर्देश पहले से मौजूद हैं। पेट्रोल की रासायनिक संरचना या उसके वितरण तंत्र को पंप स्तर पर प्रतिदिन प्रदर्शित करने का आदेश देना न केवल अव्यावहारिक है, बल्कि यह न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर कार्यपालिका के रोजमर्रा के कामकाज में हस्तक्षेप करने जैसा होगा। इन तर्कों के साथ अदालत ने याचिका को योग्यताहीन पाते हुए खारिज कर दिया।
भारत का एथेनॉल ब्लेंडिंग मिशन: 20% मिश्रण का लक्ष्य और अर्थव्यवस्था
भारत सरकार ने कच्चे तेल के भारी-भरकम आयात बिल को कम करने और विदेशी मुद्रा बचाने के उद्देश्य से एथेनॉल मिश्रित पेट्रोल (EBP) कार्यक्रम को बड़े पैमाने पर लागू किया है। भारत दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा तेल आयातक देश है, जो अपनी जरूरतों का 85 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल विदेशों से खरीदता है। एथेनॉल को गन्ने के रस, शीरे (मलेसेस), मक्के और टूटे हुए चावल जैसे कृषि उत्पादों से तैयार किया जाता है।
सरकार का लक्ष्य पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण (E20) को देशभर में अनिवार्य रूप से लागू करना है। इससे न केवल विदेशी तेल पर देश की निर्भरता घटी है, बल्कि उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और बिहार जैसे गन्ना उत्पादक राज्यों के लाखों किसानों को सीधे तौर पर हजारों करोड़ रुपये का भुगतान मिल रहा है। इसके साथ ही, एथेनॉल एक बायोफ्यूल होने के कारण कार्बन उत्सर्जन को कम करने और जलवायु परिवर्तन के लक्ष्यों को हासिल करने में भी भारत की बड़ी मदद कर रहा है।
वाहन चालकों की जमीनी चिंताएं: माइलेज, इंजन लाइफ और पुराने वाहन
अदालत का रुख भले ही नीतिगत फैसलों के पक्ष में रहा हो, लेकिन जमीन पर आम वाहन चालकों के बीच एथेनॉल को लेकर कई चिंताएं बनी हुई हैं। ऑटोमोबाइल विशेषज्ञों का मानना है कि एथेनॉल की ऊर्जा घनत्व (Energy Density) सामान्य पेट्रोल की तुलना में लगभग 30 प्रतिशत कम होती है। इसका सीधा मतलब यह है कि जब पेट्रोल में 20% एथेनॉल मिलाया जाता है, तो गाड़ियों के माइलेज में औसतन 3 से 6 प्रतिशत तक की कमी देखी जा सकती है।
इसके अलावा, एथेनॉल की प्रवृत्ति वातावरण से नमी या पानी को सोखने की होती है। यदि कोई गाड़ी लंबे समय तक खड़ी रहे या बरसात के मौसम में उसमें नमी जमा हो जाए, तो ईंधन टैंक और इंजन के पुर्जों में जंग (Corrosion) लगने का खतरा बढ़ जाता है। नए दौर के BS-VI फेज-2 वाहन तो E20 ईंधन के पूरी तरह अनुकूल हैं, लेकिन पुराने वाहनों के मालिकों को यह डर सताता रहता है कि उनके वाहनों के मेंटेनेंस का खर्च बढ़ सकता है। यही कारण था कि लोग पेट्रोल पंपों पर अलग से डिस्प्ले बोर्ड लगाने की मांग कर रहे थे।
राष्ट्रीय विमर्श और उपभोक्ता जागरूकता का नया दौर
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के बाद अब यह पूरी तरह साफ हो गया है कि एथेनॉल ब्लेंडिंग की प्रक्रिया बिना किसी अदालती रुकावट के अपनी निर्धारित गति से आगे बढ़ेगी। पेट्रोलियम मंत्रालय और तेल विपणन कंपनियों (IOCL, BPCL, HPCL) के पास अब इस नीति को देशभर के हर कोने में पूरी तरह स्थापित करने का रास्ता साफ है।
विशेषज्ञों का कहना है कि अब यह जिम्मेदारी वाहन निर्माता कंपनियों और पेट्रोलियम मंत्रालय पर आती है कि वे आम जनता के बीच इस तकनीक को लेकर फैली भ्रांतियों को दूर करने के लिए बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान चलाएं। लोगों को यह समझाना जरूरी है कि देश की आत्मनिर्भरता, पर्यावरण संरक्षण और किसानों की समृद्धि के लिए यह कदम कितना महत्वपूर्ण है, ताकि अदालत से बाहर भी जनता के मन में मौजूद तकनीकी आशंकाओं का तार्किक समाधान हो सके।
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