‘बीजेपी के अखाड़े’ में धीरेंद्र शास्त्री से कुश्ती कर रहे अखिलेश यादव

उत्तर प्रदेश की राजनीति में बयानों के तीर, धार्मिक प्रतीकों की सियासत और राजनीतिक अखाड़े की खींचतान हमेशा से गर्माई रहती है। इस बीच समाजवादी पार्टी (सपा) के राष्ट्रीय अध्यक्ष और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव तथा बागेश्वर धाम के प्रमुख पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री के बीच शुरू हुआ वैचारिक और राजनीतिक द्वंद्व सूबे की सियासत का सबसे बड़ा केंद्र बन गया है। राजनीतिक गलियारों में इस बात की चर्चा जोरों पर है कि क्या अखिलेश यादव द्वारा ‘बीजेपी के अखाड़े’ में कूदकर धीरेंद्र शास्त्री के बयानों और उनकी कार्यशैली पर निशाना साधना समाजवादी पार्टी के लिए कोई बड़ा राजनीतिक फायदा दिलाएगा या फिर यह दांव पार्टी पर ही उल्टा पड़ सकता है? उत्तर प्रदेश के आगामी राजनीतिक समीकरणों, जातीय संतुलन और हिंदू मतदाताओं के बीच इस पूरे घटनाक्रम के दूरगामी परिणामों को लेकर राजनीतिक विश्लेषक दो अलग-अलग धड़ों में बंट गए हैं।

#1 उत्तर प्रदेश की सियासत में क्यों गर्माया है अखिलेश यादव और धीरेंद्र शास्त्री का यह प्रकरण?

पूरा मामला तब तूल पकड़ा जब विभिन्न मंचों और बयानों के जरिए धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री की धार्मिक कथाओं, बयानों और सनातन संस्कृति से जुड़े आयोजनों पर राजनीतिक प्रतिक्रियाओं का दौर शुरू हुआ। विपक्षी दलों, विशेषकर समाजवादी पार्टी के खेमे से लगातार यह सवाल उठाए जाने लगे कि धर्म की आड़ में किस तरह की वैचारिक और सामाजिक धारा को बढ़ावा दिया जा रहा है। दूसरी ओर, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने इस पूरे विवाद पर आक्रामक रुख अपनाते हुए सपा पर सीधे तौर पर हिंदू आस्था और संतों का अपमान करने का संगीन आरोप मढ़ दिया है। राजनीतिक जानकारों का मानना है कि भाजपा हमेशा से ऐसे मुद्दों को अपनी पिच पर खेलने में माहिर रही है, जहां धार्मिक भावनाओं और राष्ट्रवाद के धागों को जोड़कर बहुसंख्यक मतदाताओं को एकजुट किया जा सके। ऐसे में अखिलेश यादव का इस पिच पर उतरना भाजपा के बनाए गए राजनीतिक जाल में उलझने जैसा भी साबित हो सकता है।

#1 पीडीए (PDA) बनाम हिंदुत्व की लड़ाई: क्या अखिलेश यादव का यह दांव देगा नुकसान?

समाजवादी पार्टी वर्तमान में उत्तर प्रदेश में अपने ‘PDA’ (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) फॉर्मूले के तहत चुनावी और सामाजिक ताने-बाने को मजबूत करने में जुटी हुई है। पार्टी का मुख्य फोकस लगातार बेरोजगारी, महंगाई, कानून व्यवस्था और पिछड़ों के अधिकारों जैसे बुनियादी मुद्दों पर सरकार को घेरने का रहा है। लेकिन जब ऐसे मामलों में बयानों का रुख धार्मिक हस्तियों और कथावाचकों की तरफ मुड़ जाता है, तो मुख्यधारा के विकास के मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और बहस पूरी तरह से ध्रुवीकरण (Polarization) के दायरे में आ जाती है। विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश के एक बड़े वर्ग में धार्मिक कथाकारों और संतों के प्रति गहरी आस्था जुड़ी हुई है। यदि विपक्ष की तरफ से कोई भी तीखी या आक्रामक टिप्पणी की जाती है, तो सत्ताधारी पार्टी इसे तुरंत ‘सनातन धर्म के अपमान’ के रूप में प्रचारित कर देती है, जिससे बहुसंख्यक मतदाताओं का एक बड़ा हिस्सा भावनात्मक रूप से भाजपा के पक्ष में लामबंद हो सकता है।

#1 भाजपा की रणनीति: विपक्ष को धार्मिक बहसों में उलझाकर रखना

राजनीतिक रणनीतिकार मानते हैं कि भाजपा कभी नहीं चाहती कि उत्तर प्रदेश की राजनीति केवल और केवल रोजगार, शिक्षा या स्थानीय विकास के मुद्दों पर सिमट जाए। भाजपा हमेशा से चाहती है कि चुनाव और राजनीतिक बहसें ऐसे वैचारिक और सांस्कृतिक बिंदुओं पर केंद्रित रहें, जो उनकी वैचारिक जमीन को और अधिक उर्वर बनाएं। धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री जैसे लोकप्रिय कथावाचकों के साथ वैचारिक टकराव मोल लेकर समाजवादी पार्टी अनजाने में ही भाजपा को वह पिच मुहैया करा रही है, जिस पर खेलना भगवा खेमे के लिए हमेशा से सहज और अनुकूल रहा है। यही कारण है कि राजनीतिक पंडित अखिलेश यादव को आगाह कर रहे हैं कि संतों और धार्मिक मंचों के साथ सीधी राजनीतिक कुश्ती करने से कहीं उनका ‘पीडीए’ एजेंडा कमजोर न पड़ जाए और इसका राजनीतिक लाभ सीधे तौर पर सत्ता पक्ष को मिल जाए।

#1 जनता की नब्ज और भविष्य के चुनावी समीकरणों पर पड़ने वाला असर

उत्तर प्रदेश का मतदाता अब बहुत जागरूक हो चुका है और वह अच्छी तरह समझता है कि किस नेता का बयान किस राजनीतिक मंशा के तहत दिया जा रहा है। जहां एक ओर सपा समर्थकों का मानना है कि वैचारिक विरोध जताना और समाज में वैज्ञानिक सोच व संविधान की बात करना विपक्ष का कर्तव्य है, वहीं दूसरी ओर विरोधी खेमा इसे तुष्टिकरण और हिंदू विरोधी मानसिकता करार देने में कोई कसर नहीं छोड़ रहा है। आने वाले दिनों में यह देखना बेहद दिलचस्प होगा कि क्या अखिलेश यादव इस धार्मिक और राजनीतिक घेराबंदी से बचकर फिर से अपने मूल विकासवादी और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर फोकस करते हैं, या फिर इस हाई-वोल्टेज सियासी अखाड़े में और अधिक गहराई तक उतरते हैं। फिलहाल, यह साफ है कि यह बयानबाजी और राजनीतिक दांव-पेंच उत्तर प्रदेश की राजनीति को लंबे समय तक गरमाए रखेंगे।

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