भारतीय थाली में बढ़ रहा Protein का दबदबा: अब हरी व पीली मटर से बनेगा ‘Protein Isolate’, प्लांट-बेस्ड न्यूट्रिशन में बड़ा बदलाव

भारतीय खानपान को लंबे समय से स्वाद और मसालों के लिए सराहा जाता रहा है, लेकिन पोषक तत्वों के मामले में अधिकांश भारतीय थाली में कार्बोहाइड्रेट और वसा की अधिकता और प्रोटीन की भारी कमी (Protein Deficiency) एक बड़ी चुनौती रही है। स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता, फिटनेस ट्रेंड्स और जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों से बचाव के चलते अब आम नागरिकों की थाली में प्रोटीन का महत्व तेजी से बढ़ा है। इसी बदलाव के बीच भारत के न्यूट्रास्युटिकल और फूड प्रोसेसिंग सेक्टर में एक क्रांतिकारी ट्रेंड ने रफ्तार पकड़ी है—मटर से प्रोटीन आइसोलेट (Pea Protein Isolate) का निर्माण। डेयरी आधारित व्हे (Whey) प्रोटीन और एलर्जी पैदा करने वाले सोया (Soy) प्रोटीन के विकल्प के तौर पर मटर से बनने वाला यह प्लांट प्रोटीन भारतीय बाजार में नई क्रांति ला रहा है।

क्या है पी प्रोटीन आइसोलेट (Pea Protein Isolate)?

पी प्रोटीन आइसोलेट को मुख्य रूप से पीली और हरी मटर (Yellow & Green Split Peas) से तैयार किया जाता है:

  • एक्सट्रैक्शन प्रक्रिया: मटर के दानों से छिलका, स्टार्च और फाइबर को अलग करने के बाद वैज्ञानिक विधि (आइसोलेशन प्रोसेस) से शुद्ध प्रोटीन निकाला जाता है।

  • प्रोटीन की उच्च सांद्रता: इस प्रक्रिया के बाद जो पाउडर तैयार होता है, उसमें 80% से 85% तक शुद्ध प्रोटीन मौजूद होता है।

  • पूर्ण अमीनो एसिड प्रोफाइल: मटर प्रोटीन में मांसपेशियों के विकास और रिकवरी के लिए जरूरी सभी 9 आवश्यक अमीनो एसिड्स (Essential Amino Acids) पाए जाते हैं। विशेष रूप से यह ब्रांच्ड-चेन अमीनो एसिड्स (BCAAs)—लूसिन, आइसोलूसिन और वेलिन का बेहतरीन प्राकृतिक स्रोत है।

व्हे (Whey) और सोया के मुकाबले मटर प्रोटीन क्यों है बेहतर?

पारंपरिक प्रोटीन सप्लीमेंट्स की तुलना में मटर प्रोटीन कई मायनों में भारतीय पाचन तंत्र के ज्यादा अनुकूल बैठता है:

  1. लैक्टोज-मुक्त और सुपाच्य: भारत में 60% से अधिक आबादी किसी न किसी स्तर पर लैक्टोज इनटोलरेंस (दूध या डेयरी प्रोडक्ट्स न पचने की समस्या) से जूझती है। व्हे प्रोटीन लेने पर अक्सर ब्लोटिंग, गैस और अपच की शिकायत होती है। मटर प्रोटीन 100% डेयरी-फ्री और लैक्टोज-फ्री होने के कारण पेट पर बेहद हल्का रहता है।

  2. एलर्जेन-फ्री और ग्लूटेन-फ्री: सोया प्रोटीन से कई लोगों को एलर्जी होती है और यह थायरॉयड फंक्शन पर असर डालने को लेकर अक्सर विवादों में रहता है। इसके विपरीत, पी प्रोटीन हाइपोएलर्जेनिक (Hypoallergenic) है और ग्लूटेन-फ्री भी है।

  3. हार्ट-हेल्दी और कोलेस्ट्रॉल-मुक्त: पौधों से मिलने के कारण इसमें सैचुरेटेड फैट और कोलेस्ट्रॉल की मात्रा न के बराबर होती है, जो हृदय स्वास्थ्य और ब्लड प्रेशर नियंत्रण में मददगार है।

भारतीय थाली में कैसे घुल रहा है मटर प्रोटीन?

फूड टेक कंपनियां अब इसे केवल जिम जाने वालों के शेक तक सीमित नहीं रख रही हैं, बल्कि इसे रोजमर्रा के भारतीय व्यंजनों में शामिल किया जा रहा है:

  • प्रोटीन-एनरिच्ड आटा: सामान्य गेहूं के आटे में 10% से 15% पी प्रोटीन आइसोलेट मिलाकर हाई-प्रोटीन रोटियां बनाई जा रही हैं, जिससे शाकाहारी परिवारों को बिना डाइट बदले अतिरिक्त प्रोटीन मिल रहा है।

  • प्लांट-बेस्ड डेयरी और बेकरी: मटर प्रोटीन का उपयोग वीगन मिल्क, योगर्ट, एनर्जी बार्स, बिस्कुट और नाश्ते के सीरियल्स में बाइंडिंग एजेंट और न्यूट्रिशन बूस्टर के रूप में धड़ल्ले से हो रहा है।

  • प्लांट-बेस्ड मीट: कटहल और मटर प्रोटीन के मिश्रण से मॉक-मीट (Mock Meat) और कबाब तैयार किए जा रहे हैं, जो स्वाद और बनावट में नॉन-वेज जैसे लेकिन 100% शाकाहारी होते हैं।

किसानों और स्थानीय विनिर्माण के लिए सुनहरा मौका

भारत दुनिया में दालों और मटर के सबसे बड़े उत्पादकों और उपभोक्ताओं में से एक है। अब तक देश हाई-ग्रेड प्रोटीन आइसोलेट्स के लिए पश्चिमी देशों और चीन के आयात पर निर्भर रहता था।

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और पंजाब जैसे प्रमुख दलहन उत्पादक राज्यों में घरेलू फूड-प्रोसेसिंग यूनिट्स स्थापित होने से न केवल किसानों को अपनी मटर की उपज का बेहतर और स्थिर मूल्य मिल रहा है, बल्कि ‘मेक इन इंडिया’ के तहत देश प्रोटीन आत्मनिर्भरता की ओर भी बढ़ रहा है। पोषण विशेषज्ञों का मानना है कि सस्ती लागत, पर्यावरण-अनुकूल खेती (कम पानी की खपत) और बेहतरीन पाचन क्षमता के चलते मटर प्रोटीन आने वाले वर्षों में भारतीय स्वास्थ्य क्रांति का सबसे बड़ा आधार बनेगा।

Check Also

ब्लड शुगर कम करने के लिए कितनी देर टहलना है जरूरी? मेडिकल रिसर्च में हुआ चौंकाने वाला खुलासा

डायबिटीज और प्रीडायबिटीज के मरीजों के लिए भोजन के बाद अचानक बढ़ने वाला ब्लड शुगर …