मिर्गी के लंबे दौरों में क्लोबाजाम भी असरदार: एम्स की ताजा स्टडी में बड़ा खुलासा, मरीजों को मिलेगी बड़ी राहत

देश के शीर्ष चिकित्सा संस्थान अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स), नई दिल्ली के न्यूरोलॉजी विभाग के शोधकर्ताओं ने मिर्गी (Epilepsy) के गंभीर मरीजों के इलाज को लेकर एक महत्वपूर्ण अध्ययन किया है। इस क्लिनिकल शोध में पाया गया है कि मिर्गी के लंबे और अनियंत्रित दौरों (Status Epilepticus) को तत्काल थामने में ‘क्लोबाजाम’ (Clobazam) दवा भी उतनी ही प्रभावी साबित हो सकती है, जितनी कि पारंपरिक तौर पर दी जाने वाली अन्य फर्स्ट-लाइन आपातकालीन दवाएं।

न्यूरोलॉजिकल इमरजेंसी में लंबे समय तक चलने वाले दौरे मस्तिष्क की तंत्रिका कोशिकाओं को गंभीर क्षति पहुंचा सकते हैं और समय रहते इन्हें न रोका जाए तो यह जानलेवा भी हो सकते हैं। एम्स की इस शोध रिपोर्ट के निष्कर्ष न केवल भारत जैसे विकासशील देशों के लिए आपातकालीन चिकित्सा प्रोटोकॉल को आसान और किफायती बनाने में मदद करेंगे, बल्कि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) और छोटे अस्पतालों में भी समय पर जीवनरक्षक उपचार उपलब्ध कराने की राह प्रशस्त करेंगे।

स्टेटस एपिलेप्टिकस का खतरा और आपातकालीन इलाज की चुनौतियां

मिर्गी एक जटिल न्यूरोलॉजिकल विकार है जिसमें मस्तिष्क की विद्युत गतिविधियों (इलेक्ट्रिकल सिग्नलिंग) में अचानक असामान्य रुकावट आ जाती है। जब किसी मरीज को मिर्गी का दौरा पांच मिनट से अधिक समय तक लगातार आता है, या बिना होश में आए एक के बाद एक कई दौरे आते हैं, तो इस आपात स्थिति को चिकित्सा विज्ञान में ‘स्टेटस एपिलेप्टिकस’ कहा जाता है।

इस स्थिति में मस्तिष्क में ऑक्सीजन की आपूर्ति बाधित हो सकती है और न्यूरॉन्स तेजी से नष्ट होने लगते हैं। आमतौर पर आपातकालीन वार्ड में ऐसे मामलों में इंट्रावेनस (नसों के माध्यम से) लोराजेपाम, डायाजेपाम या मिडोजोलम जैसी दवाएं तुरंत दी जाती हैं। हालांकि, कई बार गंभीर मामलों में ये पारंपरिक दवाएं पर्याप्त असर नहीं दिखा पातीं या दूरदराज के क्षेत्रों में इनके रखरखाव और इंजेक्शन लगाने के लिए प्रशिक्षित स्टाफ की उपलब्धता एक बड़ी चुनौती बन जाती है। ऐसे में एक प्रभावी और सुरक्षित वैकल्पिक दवा की आवश्यकता लंबे समय से महसूस की जा रही थी।

एम्स के डॉक्टरों का क्लिनिकल ट्रायल: क्लोबाजाम की प्रभावकारिता के आंकड़े

एम्स के विशेषज्ञों द्वारा किए गए इस क्लिनिकल अध्ययन में ऐसे मरीजों के समूह पर शोध किया गया जिन्हें लगातार मिर्गी के दौरे आ रहे थे। शोधकर्ताओं ने पाया कि जब मरीजों को निर्धारित चिकित्सकीय प्रोटोकॉल के तहत क्लोबाजाम की खुराक दी गई, तो अधिकांश मामलों में मस्तिष्क की अनियंत्रित विद्युत तरंगों में त्वरित ठहराव देखा गया।

अध्ययन के प्रमुख बिंदुओं के अनुसार:

  • क्लोबाजाम ने मिर्गी के सक्रिय दौरों को नियंत्रित करने में उच्च सफलता दर दर्ज की।

  • मरीजों में सांस रुकने (रेस्पिरेटरी डिप्रेशन) जैसी गंभीर जटिलताओं की दर अन्य कुछ पारंपरिक शामक दवाओं की तुलना में अपेक्षाकृत कम या स्थिर देखी गई।

  • इस दवा के उपयोग के बाद मरीजों को गहन चिकित्सा इकाई (ICU) या वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखने की आवश्यकता में भी उल्लेखनीय कमी दर्ज की गई।

चिकित्सा विशेषज्ञों का कहना है कि क्लोबाजाम तंत्रिका तंत्र में ‘गाबा’ (GABA) रिसेप्टर्स की गतिविधि को बढ़ाकर न्यूरॉन्स की अति-सक्रियता को शांत करने का काम करता है, जिससे मस्तिष्क को बहुत जल्द सामान्य अवस्था में लाने में मदद मिलती है।

भारत जैसे विकासशील देशों के लिए क्यों क्रांतिकारी है यह खोज

भारत में मिर्गी के लाखों मरीज हैं, जिनमें से एक बड़ा हिस्सा ग्रामीण और अर्ध-शहरी इलाकों में निवास करता है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों या जिला स्तर के अस्पतालों में अक्सर उच्च स्तरीय आपातकालीन सुविधाएं और संवेदनशील इंट्रावेनस दवाएं उपलब्ध नहीं हो पातीं।

क्लोबाजाम का असरदार साबित होना इन वजहों से गेम-चेंजर माना जा रहा है:

  • किफायती और सुलभ: अन्य महंगी एंटी-एपिलेप्टिक दवाओं की तुलना में यह दवा भारतीय बाजार में आसानी से और काफी कम कीमत पर उपलब्ध है।

  • भंडारण में आसानी: इसे सामान्य तापमान पर सुरक्षित रखा जा सकता है, जिसके लिए बहुत जटिल कोल्ड-चेन व्यवस्था की जरूरत नहीं होती।

  • समय पर इलाज: गंभीर दौरों में ‘गोल्डन ऑवर’ के भीतर मरीज को प्राथमिक स्तर पर ही संभाल लेना मस्तिष्क क्षति और मृत्यु दर को कई गुना कम कर देता है।

विशेषज्ञों की सख्त चेतावनी: बिना डॉक्टर की सलाह के न लें दवा

एम्स के न्यूरोलॉजिस्ट्स ने इस अध्ययन के निष्कर्षों के साथ एक कड़ा दिशा-निर्देश भी जारी किया है। क्लोबाजाम एक प्रिस्क्रिप्शन-ओनली ‘शेड्यूल H’ श्रेणी की दवा है, जिसका अनियंत्रित उपयोग अत्यधिक खतरनाक साबित हो सकता है।

मरीजों या तीमारदारों को कभी भी बिना प्रशिक्षित न्यूरोलॉजिस्ट या फिजिशियन की निगरानी के खुद से खुराक निर्धारित नहीं करनी चाहिए। इस दवा का गलत इस्तेमाल अत्यधिक उनींदापन, निर्भरता या तंत्रिका तंत्र पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है। यह दवा केवल अस्पताल की आपातकालीन व्यवस्था या डॉक्टर द्वारा सुझाई गई विशिष्ट परिस्थितियों में ही दी जानी चाहिए।

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