मेरठ का चर्चित सौरभ हत्याकांड: फांसी की सजा के बाद क्या बच सकते हैं मुस्कान और साहिल?

उत्तर प्रदेश के मेरठ में तीन साल पहले घटे दिल दहला देने वाले सौरभ राजपूत हत्याकांड में न्याय की पहली और सबसे बड़ी दहलीज पार हो गई है। मेरठ की जिला एवं सत्र अदालत ने पत्नी मुस्कान रस्तोगी और उसके प्रेमी साहिल शुक्ला को जघन्य हत्याकांड का दोषी मानते हुए फांसी (सजा-ए-मौत) की सजा सुनाई है। जिस तरह से एक विवाहिता ने अपने आशिक के साथ मिलकर अपने ही सुहाग की बेरहमी से हत्या की और लाश को ठिकाने लगाने के लिए ‘नीला ड्रम’ में बंद करने की साजिश रची, उसने न केवल मेरठ बल्कि पूरे देश के रोंगटे खड़े कर दिए थे। बुधवार को विशेष अदालत के न्यायाधीश अरविंद कुमार मिश्रा ने इस नृशंस कांड को ‘रेयर ऑफ द रेयरेस्ट’ यानी दुर्लभ से दुर्लभतम श्रेणी में रखते हुए दोनों मुजरिमों को फांसी के फंदे तक पहुंचाने का हुक्म जारी किया। अदालत का फैसला आते ही अदालत परिसर से लेकर कचहरी तक वकीलों ने तालियां बजाकर न्याय की जीत का जश्न मनाया और मिठाइयां बांटीं, वहीं मृतक सौरभ की मां अपनी भावनाओं पर काबू नहीं रख सकीं और न्याय की खातिर लड़ी गई तीन साल की लंबी लड़ाई को याद कर भावुक हो उठीं।

सजा सुनते ही कोर्ट में हाथ जोड़कर रो पड़ी मुस्कान, नम हुईं साहिल की आंखें

सजा के ऐलान के वक्त सुरक्षा कारणों के मद्देनजर मुस्कान और साहिल को जेल से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए कोर्ट में पेश किया गया था। अदालत कक्ष में जब जज ने दोनों दोषियों से उनकी अंतिम बात पूछी तो दोनों निशब्द रह गए और उन्होंने कुछ भी कहने से इनकार कर दिया। लेकिन जैसे ही जज साहब ने फांसी की सजा का फैसला पढ़कर सुनाया, मुस्कान अदालत के सामने हाथ जोड़कर जमीन पर बैठ गई और फफक-फफक कर रोने लगी। आंसुओं से भीगी मुस्कान ने अदालत से अपनी दोनों मासूम बच्चियों की परवरिश और उनके भविष्य की दुहाई दी। वहीं दूसरी ओर, उसका प्रेमी साहिल भी अदालत के इस सख्त फैसले के बाद सन्न रह गया और उसकी आंखें भी नम हो गईं। बचाव पक्ष के वकीलों ने दोनों मासूम बेटियों के भविष्य का हवाला देकर अदालत से रहम की गुहार लगाई थी, लेकिन सरकारी वकील और अभियोजन पक्ष ने अपराध की क्रूरता, योजनाबद्ध साजिश और मानवीय संवेदनाओं के कत्ल की दलील देते हुए मृत्युदंड की जोरदार पैरवी की, जिसे अदालत ने स्वीकार कर लिया।

सगे मां-बाप ने भी छोड़ा साथ: बेटी के लिए मांगी फांसी, दामाद को बताया देवता

इस पूरे मुकदमे का सबसे चौंकाने वाला और मार्मिक पहलू उस वक्त सामने आया जब खुद मुस्कान के सगे माता-पिता ने अपनी बेटी के गुनाहों से पूरी तरह पल्ला झाड़ लिया। आमतौर पर खून के रिश्ते औलाद के गंभीर गुनाहों में भी उसके बचाव में खड़े दिखाई देते हैं, लेकिन मुस्कान के माता-पिता ने अदालत के सामने लिखित हलफनामा देकर यह स्पष्ट कर दिया कि यदि उनकी बेटी को फांसी पर भी लटका दिया जाता है तो उन्हें रत्ती भर भी कोई ऐतराज नहीं होगा। मुस्कान के पिता ने अदालत में बयान दिया कि उनका दामाद सौरभ बेहद नेक और सीधा लड़का था, जिसके साथ उनकी बेटी ने अक्षम्य अपराध किया है। इस अप्रत्याशित और सख्त कदम ने अदालत में मौजूद हर शख्स को हतप्रभ कर दिया और यह साबित कर दिया कि मुस्कान की दरिंदगी ने समाज के साथ-साथ उसके अपने परिवार की रूह को भी झकझोर कर रख दिया था।

क्या सीधे फंदे पर लटका दिए जाएंगे दोनों मुजरिम? समझिए कानूनी प्रक्रिया का सच

जिला अदालत से फांसी की सजा सुनाए जाने के बाद अब आम जनता और कानून के जानकारों के मन में सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या मुस्कान और साहिल को सीधे फांसी दे दी जाएगी या फिर उनके पास बचने का कोई कानूनी उपाय शेष है। मेरठ जेल के वरिष्ठ जेल अधीक्षक वीरेश राज शर्मा ने इस संबंध में स्पष्ट किया कि भारतीय आपराधिक न्याय व्यवस्था में जिला अदालत के फैसले के तुरंत बाद किसी भी दोषी को फांसी नहीं दी जाती है। कानून की किताब के तहत सत्र न्यायालय द्वारा दिए गए मृत्युदंड के फैसले को अमल में लाने के लिए अनिवार्य कानूनी प्रक्रियाओं से गुजरना पड़ता है। भारतीय कानून की प्रक्रिया के अनुसार जिला जज का फैसला सिर्फ पहला पड़ाव होता है। जब तक देश की उच्च और सर्वोच्च अदालतें इस फैसले की पड़ताल नहीं कर लेतीं और संवैधानिक प्रावधानों का निस्तारण नहीं हो जाता, तब तक किसी भी दोषी को फांसी के तख्ते पर नहीं भेजा जा सकता।

हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक: किन-किन दरवाजों पर दस्तक दे सकते हैं दोषी

भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता) के नियमों के मुताबिक किसी भी सत्र अदालत द्वारा सुनाई गई फांसी की सजा तब तक अंतिम नहीं मानी जाती जब तक कि संबंधित उच्च न्यायालय (इस मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट) उसकी पुष्टि यानी कंफर्मेशन न कर दे। जिला अदालत स्वतः ही इस पूरी फाइल को इलाहाबाद हाईकोर्ट को भेजेगी, जहां खंडपीठ दोबारा सभी सबूतों और बयानों की समीक्षा करेगी। इसके अलावा मुस्कान और साहिल के पास इलाहाबाद हाईकोर्ट में अपनी सजा के खिलाफ क्रिमिनल अपील दाखिल करने का वैधानिक अधिकार है। यदि हाईकोर्ट भी फांसी की सजा को बरकरार रखता है, तो दोनों के पास संविधान के अनुच्छेद 136 के तहत देश की शीर्ष अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) दायर करने का विकल्प खुला रहेगा। सुप्रीम कोर्ट से भी यदि अपील खारिज हो जाती है, तो वे उसी बेंच के समक्ष पुनर्विचार याचिका (Review Petition) लगा सकते हैं, जिसकी सुनवाई खुली अदालत में होती है। इतना ही नहीं, रिव्यू पिटीशन खारिज होने के बाद भी सुप्रीम कोर्ट में क्यूरेटिव पिटीशन यानी सुधारात्मक याचिका का अंतिम न्यायिक दरवाजा खुला रहता है।

अदालतों के बाद क्या है तीसरा रास्ता? राज्यपाल और राष्ट्रपति के सामने दया याचिका

न्यायपालिका के सभी दरवाजे बंद हो जाने के बाद भी भारतीय संविधान दोषियों को एक अंतिम मानवीय राहत का अवसर प्रदान करता है, जिसे दया याचिका (Mercy Petition) कहा जाता है। सुप्रीम कोर्ट से सभी कानूनी रास्ते खत्म होने के बाद मुस्कान और साहिल संविधान के अनुच्छेद 161 के तहत उत्तर प्रदेश के राज्यपाल के समक्ष और उसके बाद संविधान के अनुच्छेद 72 के तहत देश की महामहिम राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका प्रस्तुत कर सकते हैं। राज्यपाल और राष्ट्रपति केंद्रीय या राज्य गृह मंत्रालय की सलाह पर इस याचिका पर विचार करते हैं। वे चाहें तो फांसी की सजा को उम्रकैद में तब्दील कर सकते हैं या फिर उसे पूरी तरह खारिज कर सकते हैं। जब तक राष्ट्रपति भवन से दया याचिका पर अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक स्थानीय अदालत किसी भी सूरत में ‘डेथ वारंट’ यानी ब्लैक वारंट जारी नहीं कर सकती।

सलाखों के पीछे 10 महीने की दुधमुंही बच्ची: मां को सजा तो मासूम का क्या होगा?

इस जघन्य हत्याकांड के कानूनी पहलुओं के बीच एक मासूम बच्ची की बेबसी भी चर्चा का केंद्र बनी हुई है। मुस्कान के साथ मेरठ जेल में इस वक्त उसकी 10 महीने की मासूम बच्ची भी रह रही है। जेल अधीक्षक वीरेश राज शर्मा के अनुसार जेल नियमावली के तहत कोई भी बच्चा 6 साल की उम्र तक अपनी मां के साथ जेल के भीतर रह सकता है। 10 महीने की इस बच्ची के भरण-पोषण और देखभाल की जिम्मेदारी फिलहाल जेल प्रशासन के नियमों के तहत ही पूरी की जा रही है। जब तक फांसी की अंतिम तारीख मुकर्रर नहीं होती, तब तक बच्ची अपनी मां के साथ ही रहेगी। इसके साथ ही मुस्कान की एक सात साल की बड़ी बेटी भी है, जिससे मिलने के लिए वह जेल प्रशासन से लगातार फरियाद कर रही है, लेकिन नियमों के चलते उसे जेल में रखने की अनुमति नहीं है। कानूनी जंग में उलझे इस मामले में अदालत का फैसला न्याय की नजीर तो बन गया है, लेकिन रिश्तों के कत्ल की इस दास्तान में मासूम बच्चों का मुस्तकबिल भी एक दर्दनाक हकीकत बनकर सामने खड़ा है।

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