
भारतीय राजनीति और छात्र आंदोलनों के इतिहास में आमतौर पर नए राजनीतिक या सामाजिक संगठनों का जन्म गहन मंथन, बंद कमरों की गंभीर बैठकों, विचार गोष्ठियों या बड़े राजनेताओं के रणनीतिक सम्मेलनों के बाद होता है। लेकिन देश में युवाओं और छात्रों की नई आवाज बनकर उभरी ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) के बनने की कहानी किसी हॉलीवुड फिल्म की पटकथा से भी ज्यादा रोमांचक और अनूठी है। हाल ही में एक प्रमुख पॉडकास्ट और टीवी साक्षात्कार के दौरान CJP के राष्ट्रीय संयोजक और छात्र नेता अभिजीत दीपके ने अपनी पार्टी के अस्तित्व में आने का ऐसा सच उजागर किया है, जिसे सुनकर हर कोई दंग रह गया। दीपके ने हंसते हुए खुलासा किया कि इस पार्टी को बनाने का उनका कोई पूर्व-नियोजित प्लान नहीं था, बल्कि वे तो अमेरिका में अपने कमरे में आराम से प्लेस्टेशन 5 (PS5) पर फीफा (FIFA) वीडियो गेम खेल रहे थे, जब एक छोटी सी सोशल मीडिया पोस्ट ने भारत में एक नए छात्र आंदोलन की नींव रख दी।
‘मैं तो PS5 पर FIFA खेल रहा था’: जब 6 शब्दों की पोस्ट ने हिला दिया इंटरनेट
अभिजीत दीपके ने उस ऐतिहासिक दिन को याद करते हुए बताया कि मई के महीने में जब भारत में नीट (NEET) और यूजीसी-नेट समेत कई राष्ट्रीय प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित पेपर लीक और धांधली को लेकर लाखों छात्र सड़कों पर रो रहे थे, उस वक्त वे अमेरिका के बोस्टन में थे। दीपके ने कहा, “ईमानदारी से कहूं तो उस दिन मेरा राजनीति या कोई पार्टी बनाने का दूर-दूर तक कोई इरादा नहीं था। मैं अपने कमरे में आराम से बैठा हुआ था और मेरे हाथ में प्लेस्टेशन कंट्रोलर था। मैं अपने दोस्तों के साथ PS5 पर फीफा (FIFA) का एक इंटेंस मैच खेल रहा था।”
दीपके ने आगे बताया, “गेम के हाफ-टाइम ब्रेक के दौरान मैंने यूं ही अपना फोन उठाया और सोशल मीडिया स्क्रॉल करने लगा। स्क्रीन पर देखा कि देश की सर्वोच्च अदालत में किसी मुद्दे पर बहस के दौरान एक मौखिक टिप्पणी का जिक्र था जिसमें आम लोगों या प्रदर्शनकारियों की तुलना की जा रही थी। उसी समय मुझे भारत में परेशान और लाचार महसूस कर रहे लाखों युवाओं और छात्रों का ख्याल आया। गेम के उसी दो मिनट के ब्रेक में मैंने कंट्रोलर एक हाथ में पकड़े-पकड़े बिना ज्यादा सोचे ‘एक्स’ (पूर्व में ट्विटर) पर केवल छह शब्दों की एक व्यंग्यात्मक लाइन टाइप कर दी—’व्हाट इफ ऑल कॉकरोचेज कम टुगेदर?’ (What if all cockroaches come together? – क्या होगा अगर सभी कॉकरोच एक साथ आ जाएं?) और फिर मैं वापस अपना फीफा गेम खेलने में मस्त हो गया।”
‘कॉकरोच’ ही नाम क्यों चुना? उपहास से उपजी अटूट ताकत का प्रतीक
इंटरव्यू के दौरान जब एंकर ने पूछा कि किसी पार्टी या आंदोलन के लिए ‘कॉकरोच’ जैसा अजीब और अप्रत्याशित नाम क्यों चुना गया, तो अभिजीत दीपके ने इसके पीछे का गहरा सामाजिक और दार्शनिक अर्थ समझाया। दीपके ने बताया कि भारतीय व्यवस्था में आम नागरिक, बेरोजगार युवा और गरीब छात्र उस कॉकरोच की तरह समझे जाते हैं, जिनकी आवाज कोई नहीं सुनता और जिन्हें कोई भी ताकतवर व्यक्ति आसानी से अपने पैरों तले कुचलकर आगे बढ़ जाता है।
दीपके ने कहा, “जीव विज्ञान में कॉकरोच को दुनिया का सबसे जिद्दी और लचीला जीव माना जाता है। वैज्ञानिक कहते हैं कि अगर दुनिया पर परमाणु बम भी गिर जाए, तो इंसान भले ही खत्म हो जाएं लेकिन कॉकरोच जिंदा बच जाते हैं। वह किसी भी गंदे से गंदे और विषम हालात में सरवाइव कर सकता है। ठीक उसी तरह हमारे देश का छात्र, युवा और मिडिल क्लास नागरिक है—सिस्टम उस पर पेपर लीक का बोझ डाले, बेरोजगारी का थप्पड़ मारे, पुलिस की लाठियां बरसाए, फिर भी वह मरता नहीं है बल्कि हर बार उठ खड़ा होता है। उस पोस्ट में ‘कॉकरोच’ शब्द व्यवस्था के उस अहंकार पर एक सीधा तंज था कि जिन्हें तुम कमजोर समझकर कुचलते हो, अगर वे सब एक साथ एकजुट हो जाएं तो तुम्हारा पूरा तख्त हिला सकते हैं।”
डिस्कॉर्ड और टेलीग्राम से सड़कों तक: चंद घंटों में कैसे खड़ा हुआ Gen Z का नेटवर्क?
फीफा मैच खत्म करने के बाद जब कुछ घंटों बाद दीपके ने दोबारा अपना फोन चेक किया, तो उनके होश उड़ गए। उनकी वह छह शब्दों की पोस्ट वायरल हो चुकी थी और उस पर लाखों इम्प्रेशन्स और हजारों रि-पोस्ट्स आ चुके थे। देश भर के अलग-अलग राज्यों से लाखों छात्र, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले युवा और प्रोफेशन्स से जुड़े लोग उस विचार के साथ जुड़ने लगे।
अगले 24 से 48 घंटों के भीतर युवाओं ने खुद ही डिस्कॉर्ड (Discord) सर्वर और टेलीग्राम चैनल्स बना डाले। देखते ही देखते 50 हजार से अधिक Gen Z युवा उन डिजिटल कम्युनिटीज में जुड़ गए। इंटरनेट पर छात्रों ने लिखना शुरू कर दिया कि हमें किसी पारंपरिक राजनीतिक पार्टी का झंडा नहीं उठाना, बल्कि हमें अपनी खुद की ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ चाहिए जो सिर्फ और सिर्फ छात्रों और बेरोजगारों के हक की बात करे। डिजिटल स्पेस से शुरू हुआ यह जुड़ाव इतना ताकतवर था कि इसने अभिजीत दीपके को तुरंत भारत लौटने और इस ऊर्जा को एक संगठित स्वरूप देने के लिए मजबूर कर दिया।
बोस्टन की डिग्री छोड़ सीधे जंतर-मंतर का रुख: जब छात्रों का बना सुरक्षित ठिकाना
अभिजीत दीपके अमेरिका के बोस्टन से पब्लिक रिलेशंस में अपनी पढ़ाई पूरी कर रहे थे। लेकिन भारत में छात्रों के इस जबर्दस्त आह्वान के बाद वे अपनी सुख-सुविधाओं को छोड़कर सीधे नई दिल्ली पहुंचे। दीपके ने अपने सहयोगियों के साथ मिलकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर डेरा डाला और भीषण गर्मी व बारिश के बीच महीनों तक शांतिपूर्ण धरने का नेतृत्व किया।
खास बात यह रही कि इस आंदोलन में कोई बड़ा राजनीतिक मंच, वीआईपी लाउंज या कॉर्पोरेट फंडिंग नहीं थी। पूरे देश से छात्र जंतर-मंतर पहुंचते, जमीन पर बैठकर अपनी समस्याएं साझा करते और प्रतियोगी परीक्षाओं में पारदर्शिता की मांग करते। देखते ही देखते CJP ने देश के विभिन्न राज्यों में अपनी इकाइयां खड़ी कर दीं। हाल ही में पार्टी ने अपनी 12 सदस्यीय राष्ट्रीय कार्यसमिति की घोषणा की है, जिसमें 7 सदस्य खुद 30 वर्ष से कम आयु (Gen Z) के हैं। इनमें शोधकर्ता, छात्र, सामाजिक कार्यकर्ता और कानूनी विशेषज्ञ शामिल हैं।
पारंपरिक राजनीति नहीं बल्कि नागरिक मंच: 5 सितंबर को दिल्ली में महा-मार्च
अभिजीत दीपके ने यह स्पष्ट किया है कि CJP का मकसद पारंपरिक पार्टियों की तरह सिर्फ चुनाव लड़ना या सत्ता हासिल करना नहीं है। यह एक स्वतंत्र ‘सिटिजन एंड स्टूडेंट प्रेशर ग्रुप’ है जो किसी भी सरकार से कड़े सवाल पूछने का साहस रखता है।
इसी क्रम में पार्टी ने शिक्षक दिवस के अवसर पर 5 सितंबर को राजधानी दिल्ली में एक बड़े शांतिपूर्ण मार्च का आह्वान किया है। इस मार्च से पहले CJP ने देश के सभी राज्यों के शिक्षा मंत्रियों को पत्र भेजकर सरकारी स्कूलों की जर्जर हालत, पीने के पानी, क्रियाशील शौचालयों, पंखों की कमी और शिक्षकों के खाली पदों पर आधिकारिक डेटा मांगा है। दीपके का कहना है कि जिस देश में लाखों बच्चे टूटी छतों के नीचे बैठकर पढ़ने को मजबूर हैं, वहां विश्वगुरु बनने का दावा खोखला है और CJP इस जमीनी हकीकत को राष्ट्रीय एजेंडे के केंद्र में लाएगी।
वीडियो गेम से निकले विचार ने सिखाया लोकतंत्र का नया पाठ
एक कमरे में PS5 पर फीफा गेम खेलने से लेकर देश के सबसे चर्चित युवा आंदोलन का चेहरा बनने तक, अभिजीत दीपके और कॉकरोच जनता पार्टी की यह यात्रा डिजिटल युग के नए भारत की तस्वीर पेश करती है। यह कहानी साबित करती है कि नई पीढ़ी (Gen Z) को लामबंद करने के लिए करोड़ों के विज्ञापनों या पारंपरिक रैलियों की जरूरत नहीं होती। यदि युवाओं के दर्द से जुड़ा एक सच्चा और मौलिक विचार सामने आए, तो वह गेमिंग कंसोल से निकलकर देश की संसद और सड़कों तक अपनी आवाज पहुंचाने की ताकत रखता है।
Shashwat Lokwarta – State News,Up News देश-दुनिया