
उत्तर भारत के मैदानी इलाकों से लेकर पहाड़ों की तलहटी तक जैसे ही नवंबर और दिसंबर की ठंडी हवाएं चलना शुरू होती हैं, वैसे ही घरों में छोटे बच्चों की सेहत को लेकर माता-पिता की चिंताएं कई गुना बढ़ जाती हैं। सुबह और शाम के गिरते तापमान, शुष्क हवा तथा बदलते मौसम के बीच बच्चों की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्युनिटी बड़ों की तुलना में काफी नाजुक होती है, जिसके चलते वे बहुत जल्दी मौसमी संक्रमण, सर्दी, जुकाम और छाती में कफ जमने की समस्या की चपेट में आ जाते हैं। कई बार रात में सोते समय बच्चे की छाती से घरघराहट की आवाज आने लगती है या सूखी व बलगम वाली खांसी के कारण उनकी नींद टूट जाती है, जिससे पूरा परिवार परेशान हो जाता है। ऐसे में हर छोटी बात पर बच्चे को तेज एंटीबायोटिक या ओवर-द-काउंटर कफ सिरप देने के बजाय यदि शुरुआत में ही घर में मौजूद प्राकृतिक और पारंपरिक उपायों का सही तरीके से सहारा लिया जाए, तो बच्चे को बिना किसी साइड इफेक्ट के तुरंत आराम पहुंचाया जा सकता है।
सरसों के तेल और लहसुन-अजवाइन की हल्की मालिश से छाती की जकड़न में तुरंत आराम
भारतीय घरों में पीढ़ियों से आजमाया जाने वाला सबसे भरोसेमंद और सुरक्षित नुस्खा सरसों के तेल की हल्की मालिश है, जो बच्चों के सीने में जमे गाढ़े बलगम को पिघलाने में बेहद मददगार साबित होता है। इसे तैयार करने के लिए एक छोटी कटोरी में शुद्ध सरसों का तेल लें और उसमें दो से तीन कुचली हुई लहसुन की कलियां और आधा चम्मच अजवाइन डालकर धीमी आंच पर तब तक पकाएं जब तक लहसुन हल्का भूरा न हो जाए। इसके बाद गैस बंद करके तेल को हल्का गुनगुना होने दें और फिर इस तेल की कुछ बूंदें लेकर बच्चे के सीने, पीठ और पैरों के तलवों पर बहुत हल्के हाथों से मालिश करें। लहसुन में प्राकृतिक एंटी-बैक्टीरियल और एंटी-वायरल गुण मौजूद होते हैं, जबकि अजवाइन और सरसों की तासीर गर्म होती है जो शरीर में रक्त संचार को तेज करती है और फेफड़ों की नलियों को खोलकर सांस लेने की प्रक्रिया को सहज बनाती है। ध्यान रखें कि मालिश के तुरंत बाद बच्चे को खुली या ठंडी हवा में न ले जाएं और पंखा या कूलर पूरी तरह बंद रखें ताकि गर्माहट शरीर के भीतर बनी रहे।
भाप यानी स्टीम इनहेलेशन और अजवाइन की पोटली का जादुई गर्माहट भरा असर
जब बच्चे की नाक बंद हो जाती है और कफ सीने में गहराई तक जम जाता है, तो भाप देना सबसे असरदार और वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित तरीका माना जाता है। छोटे बच्चों को सीधे उबलते पानी के बर्तन के पास ले जाना खतरनाक हो सकता है, इसलिए सबसे सुरक्षित तरीका यह है कि आप बाथरूम का दरवाजा बंद करके गर्म पानी का नल चला दें ताकि पूरे कमरे में भाप भर जाए और फिर बच्चे को गोद में लेकर वहां 5 से 7 मिनट तक सामान्य रूप से सांस लेने दें। यह नम हवा बच्चे के श्वसन तंत्र की सूजन को शांत करती है और सूखे बलगम को ढीला करके बाहर निकालने में मदद करती है। इसके अलावा एक सूती कपड़े में दो चम्मच भुनी हुई अजवाइन बांधकर पोटली बना लें और इस पोटली को तवे पर हल्का सा गुनगुना करके बच्चे के सीने और पीठ पर बहुत सावधानी से सिकाई करें। अजवाइन से निकलने वाली हल्की सुगंधित भाप और गर्माहट बंद नाक को खोलने, छाती की जकड़न को दूर करने और रात के समय होने वाली लगातार खांसी को रोकने में चमत्कारिक रूप से काम करती है।
जायफल, तुलसी और देसी शहद का सही उम्र के हिसाब से औषधीय सेवन
रसोई में मौजूद मसाले न केवल भोजन का स्वाद बढ़ाते हैं बल्कि वे बेहतरीन आयुर्वेदिक औषधि के रूप में भी काम करते हैं, बशर्ते उनका इस्तेमाल सही उम्र और संतुलित मात्रा में किया जाए। यदि आपका बच्चा एक वर्ष से बड़ा है, तो उसे आधा चम्मच शुद्ध शहद में दो बूंद अदरक का ताजा रस और चुटकी भर पिसी हुई काली मिर्च मिलाकर दिन में दो बार चटाया जा सकता है। शहद गले की भीतरी परत पर एक सुरक्षात्मक लेप बना देता है जिससे लगातार होने वाली खराश और चुभन से तुरंत आराम मिलता है। वहीं छोटे शिशुओं के लिए जायफल को साफ सिलबट्टे पर गाय के दूध या गुनगुने पानी की दो बूंद के साथ घिसकर एक चावल के दाने के बराबर पेस्ट उनकी जीभ पर लगाया जा सकता है। जायफल की तासीर शरीर को भीतर से गर्माहट देती है और पेट के साथ-साथ सीने के कफ को शांत करने में मदद करती है, लेकिन यह याद रखना बेहद जरूरी है कि एक वर्ष से कम उम्र के शिशुओं को कभी भी शहद नहीं देना चाहिए क्योंकि इससे इन्फेंट बॉटुलिज्म का गंभीर खतरा हो सकता है।
हाइड्रेशन, गर्म तरल पदार्थ और कमरे के वातावरण की सही देखरेख
सर्दियों के दिनों में अक्सर प्यास कम लगती है जिसके कारण बच्चे पानी पीना कम कर देते हैं, जिससे शरीर में डिहाइड्रेशन होने लगता है और फेफड़ों में जमा कफ सूखकर और ज्यादा जिद्दी बन जाता है। इसलिए यह बेहद जरूरी है कि बच्चे को दिनभर में बार-बार थोड़ा-थोड़ा गुनगुना पानी, सब्जियों का हल्का सूप या दाल का पानी पीने के लिए दिया जाए। तरल पदार्थों की प्रचुर मात्रा शरीर के तापमान को संतुलित रखती है, टॉक्सिन्स को बाहर निकालती है और बलगम को पतला बनाकर खांसी या छींक के जरिए आसानी से बाहर निकलने का रास्ता देती है। इसके साथ ही जिस कमरे में बच्चा सोता है, वहां की हवा बहुत अधिक शुष्क नहीं होनी चाहिए; यदि आप हीटर या ब्लोअर का उपयोग कर रहे हैं तो कमरे के एक कोने में पानी से भरा चौड़ा बर्तन अवश्य रखें ताकि नमी का स्तर बना रहे। बच्चे को सीधे ऊनी कपड़े पहनाने के बजाय पहले सूती इनर पहनाएं और फिर परतों में कपड़े पहनाएं ताकि जरूरत से ज्यादा पसीना न आए, क्योंकि पसीना सूखने से भी ठंड लगने और कफ बनने का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
माता-पिता कब न करें देरी और तुरंत लें योग्य बाल रोग विशेषज्ञ की सलाह
घरेलू नुस्खे सामान्य मौसमी सर्दी, हल्की खांसी और शुरुआती कफ में बहुत तेजी से और सुरक्षित रूप से काम करते हैं, लेकिन माता-पिता को बच्चे के लक्षणों पर बहुत पैनी नजर रखनी चाहिए। यदि घरेलू उपायों को अपनाने के दो से तीन दिन बाद भी बच्चे को आराम न मिले, खांसी के साथ 101 डिग्री से अधिक तेज बुखार बना रहे, बच्चा दूध पीना या खाना पूरी तरह छोड़ दे, या सांस लेते समय पसलियां भीतर धंसती हुई दिखाई दें और होंठों के आसपास नीलापन नजर आए, तो बिना एक पल गंवाए तुरंत नजदीकी बाल रोग विशेषज्ञ (पीडियाट्रिशियन) से संपर्क करना चाहिए। शुरुआती सावधानी, सही घरेलू देखभाल, प्यार भरी देखरेख और समय पर उचित चिकित्सकीय मार्गदर्शन ही आपके बच्चे को कड़ाके की ठंड में भी पूरी तरह सुरक्षित, स्वस्थ और मुस्कुराता हुआ बनाए रख सकता है।
Shashwat Lokwarta – State News,Up News देश-दुनिया
