
मध्य पूर्व की भू-राजनीति में इन दिनों एक ऐसी खबर ने अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा विश्लेषकों को चौंका दिया है, जिसने रियाद के लंबे समय से चले आ रहे शक्ति संतुलन को पूरी तरह हिला दिया है। इजरायली और अंतरराष्ट्रीय मीडिया में आई ताजा रिपोर्टों के अनुसार, सऊदी अरब ने यमन के ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों को अपने क्षेत्रों पर हमले रोकने और एक स्थायी संघर्षविराम (सीजफायर) पर राजी करने के लिए कथित तौर पर 1 अरब डॉलर (करीब 8,400 करोड़ रुपये) की भारी-भरकम वित्तीय पेशकश की है। तेहरान की मध्यस्थता में चल रही इस गुप्त वार्ता की खबरों के सामने आते ही यह सवाल तेजी से उठने लगा है कि क्या यमन के गृहयुद्ध में दस साल तक अरबों डॉलर फूंकने और अत्याधुनिक पश्चिमी हथियारों का इस्तेमाल करने के बाद आखिरकार सऊदी अरब ने हूतियों के आगे घुटने टेक दिए हैं?
यह घटनाक्रम ऐसे समय में सामने आया है जब लाल सागर में जहाजों को निशाना बनाने के साथ-साथ हूती लड़ाकों ने सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों, हवाई अड्डों और सीमावर्ती शहरों पर ड्रोन व बैलिस्टिक मिसाइल हमलों की तीव्रता अचानक बढ़ा दी है। सऊदी अरब की विशाल अर्थव्यवस्था का पूरा पहिया उसकी तेल कंपनी अरामको और क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान के महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट ‘विजन 2030’ पर टिका है। यदि देश के अंदरूनी इलाकों में नियमित अंतराल पर सायरन बजते रहें और रिफाइनरियां आग की लपटों में घिरती रहें, तो विदेशी निवेश और पर्यटन को भारी झटका लगना तय है। ऐसे में सैन्य साधनों से हूतियों को पूरी तरह कुचलने में नाकाम रहने के बाद रियाद अब वित्तीय पैकेज और कूटनीतिक सौदेबाजी के जरिए अपने आसमान को सुरक्षित करने का व्यावहारिक रास्ता तलाश रहा है।
ईरान की मध्यस्थता और 1 अरब डॉलर का गणित: शांति खरीदी जा रही है या मजबूरी?
सऊदी अरब द्वारा 1 अरब डॉलर की पेशकश का यह प्रस्ताव सीधे हूतियों को नहीं, बल्कि तेहरान में आयोजित बैठकों के दौरान ईरान के शीर्ष नेतृत्व के जरिए आगे बढ़ाया गया है। दरअसल, पिछले कुछ समय से हूती विद्रोही लगातार यह मांग कर रहे थे कि यमन में उनके नियंत्रण वाले उत्तरी हिस्सों में सरकारी कर्मचारियों, शिक्षकों और स्वास्थ्य कर्मियों के वर्षों से रुके हुए वेतन का भुगतान सऊदी अरब अपने खजाने से करे। इसके अलावा, सना अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे और होदेइदाह बंदरगाह से सभी प्रकार की नाकाबंदी हटाने की शर्त भी रखी गई थी।
कूटनीतिक सूत्रों के मुताबिक, यह 1 अरब डॉलर का फंड उसी ‘वेतन भुगतान और मानवीय पुनर्निर्माण’ के नाम पर हूती प्रशासन को हस्तांतरित करने की रूपरेखा का हिस्सा है, ताकि इसे सीधे तौर पर ‘रंगदारी’ या युद्ध का हर्जाना न कहा जा सके। इसके बदले में सऊदी अरब हूतियों से दो टूक गारंटी चाहता है: पहला, सऊदी अरब की सीमाओं के भीतर किसी भी तेल डिपो, हवाई अड्डे या सैन्य अड्डे पर ड्रोन और मिसाइल हमले पूरी तरह बंद हों; और दूसरा, लाल सागर में गुजरने वाले सऊदी व्यापारिक जहाजों को कोई नुकसान न पहुंचाया जाए। हालांकि, विश्लेषकों का मानना है कि इतनी बड़ी रकम देकर शांति हासिल करने की कोशिश यह दर्शाती है कि युद्ध के मैदान में सऊदी अरब का पलड़ा कितना कमजोर पड़ चुका है।
‘मक्का डिफेंस पैक्ट’ का क्या हुआ? क्यों फेल साबित हुआ इस्लामिक नाटो?
इस पूरे प्रकरण में सबसे बड़ा झटका सऊदी अरब द्वारा बनाए गए बहुप्रचारित ‘मक्का डिफेंस पैक्ट’ (Mecca Joint Defence Agreement) की साख को लगा है। कुछ ही महीने पहले सऊदी अरब, तुर्की और पाकिस्तान ने मिलकर एक ऐतिहासिक आपसी रक्षा समझौता किया था, जिसे वैश्विक मीडिया में ‘इस्लामिक नाटो’ का नाम दिया गया था। इस समझौते का सीधा सिद्धांत था कि यदि इनमें से किसी एक देश पर बाहरी हमला होता है, तो बाकी दोनों देश उसकी रक्षा के लिए अपनी सैन्य ताकत के साथ खड़े होंगे।
लेकिन जब हूती विद्रोहियों ने हाल के हफ्तों में सऊदी रिफाइनरियों और रियाद की ओर मिसाइलें दागीं, तो यह रक्षा समझौता कागजों में ही दबा रह गया। न तो पाकिस्तान ने अपनी सेना सऊदी अरब में तैनात करने की हिम्मत दिखाई और न ही तुर्की ने हूतियों के खिलाफ कोई सीधा सैन्य कदम उठाया। पाकिस्तान के सामने उसकी घरेलू शिया आबादी का संवेदनशील संतुलन और अपनी खस्ताहाल अर्थव्यवस्था सबसे बड़ी रुकावट बनी, जबकि तुर्की किसी भी सूरत में ईरान के साथ सीधा टकराव मोल नहीं लेना चाहता था। नतीजतन, जब असली खतरे की घड़ी आई, तो सऊदी अरब को यह अहसास हो गया कि विदेशी सहयोगियों के सैन्य वादों पर भरोसा करने के बजाय उसे अपने दम पर ही कोई न कोई रास्ता निकालना होगा। इस निष्क्रियता ने मक्का समझौते की प्रतिरोधक क्षमता (Deterrence) पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा दिया है।
‘विजन 2030’ और अर्थव्यवस्था को बचाने की छटपटाहट
सऊदी अरब की इस कथित लाचारी के पीछे का असली सच उसकी दीर्घकालिक आर्थिक योजना ‘विजन 2030’ में छिपा हुआ है। क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान देश को तेल आधारित अर्थव्यवस्था से निकालकर पर्यटन, टेक हब, रियल एस्टेट और वैश्विक व्यापार का केंद्र बनाना चाहते हैं। इसके लिए ‘नियोम’ (NEOM) जैसी 500 अरब डॉलर की फ्यूचरिस्टिक मेगा-सिटी, रेड सी टूरिज्म प्रोजेक्ट्स और विदेशी कंपनियों के क्षेत्रीय मुख्यालयों को रियाद में स्थापित करने की योजनाएं चल रही हैं।
विदेशी निवेशक किसी भी ऐसे देश में पैसा लगाने से कतराते हैं जहां हर दूसरे हफ्ते हवाई रक्षा प्रणालियों (पैट्रियट मिसाइलों) के चलने की आवाजें गूंजती हों। इसके अलावा, अमेरिकी सुरक्षा छतरी के धीमे-धीमे पीछे हटने और वाशिंगटन के भरोसेमंद न रहने के चलते सऊदी अरब अब लंबे सैन्य संघर्षों को खींचने की स्थिति में नहीं है। ऐसे में 1 अरब डॉलर खर्च करके अगर देश के बुनियादी ढांचे, तेल निर्यात और आर्थिक स्थिरता को अगले कुछ वर्षों के लिए बचाया जा सकता है, तो सऊदी नेतृत्व इसे सैन्य हार के बजाय एक ‘व्यावहारिक आर्थिक निवेश’ मानकर आगे बढ़ रहा है।
आगे की राह: क्या 1 अरब डॉलर से रुकेंगे हूतियों के हमले?
सबसे बड़ा यक्ष प्रश्न यही है कि क्या पैसे देकर खरीदी गई शांति लंबे समय तक टिक पाएगी? हूती विद्रोही केवल यमन की स्थानीय सत्ता के आकांक्षी नहीं हैं, बल्कि वे क्षेत्र में ईरान के ‘एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस’ (Axis of Resistance) का सबसे आक्रामक और बेकाबू घटक बन चुके हैं। गाजा, लेबनान और पूरे पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच हूतियों की रणनीतिक दिशा केवल रियाद की सीमाओं तक सीमित नहीं है।
तेहरान में चल रही वार्ताओं के बीच भी सऊदी रिफाइनरी को निशाना बनाने की हूती कोशिशों ने यह संकेत दे दिया है कि वे अपनी आक्रामकता को सौदेबाजी में और अधिक लाभ उठाने के लिए एक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं। यदि यह 1 अरब डॉलर का ईरान-मध्यस्थता वाला समझौता औपचारिक रूप ले भी लेता है, तो भी इस बात की कोई पुख्ता गारंटी नहीं है कि भविष्य में किसी नए क्षेत्रीय तनाव के भड़कने पर हूती अपनी मिसाइलों का रुख फिर से उत्तर की ओर नहीं मोड़ेंगे। फिलहाल तो इस घटनाक्रम ने यह साबित कर दिया है कि आधुनिक युद्ध में अरबों डॉलर के हथियारों और बड़े सैन्य गठबंधनों पर गुरिल्ला ड्रोन वॉरफेयर और राजनीतिक दृढ़ता भारी पड़ रही है।
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