घंटों कुर्सी पर बैठने से जाम हो रहे घुटने और कमर, आर्थोपेडिक एक्सपर्ट्स ने बताए बचाव के आसान तरीके

आज की बदलती जीवनशैली और कॉर्पोरेट वर्क कल्चर ने इंसानी दिनचर्या को पूरी तरह से लैपटॉप और ऑफिस चेयर तक सीमित कर दिया है। सुबह नौ बजे से शाम छह बजे तक लगातार एक ही जगह बैठे रहना अब लाखों प्रोफेशनल्स की मजबूरी बन चुका है, लेकिन यह आदत खामोशी से हमारे शरीर के बुनियादी ढांचे यानी हड्डियों और जोड़ों को खोखला कर रही है। भारत के प्रमुख शहरों जैसे लखनऊ, दिल्ली-एनसीआर, बेंगलुरु और मुंबई में आर्थोपेडिक क्लिनिक्स में आने वाले मरीजों में अब 25 से 40 वर्ष के युवा प्रोफेशनल्स की संख्या तेजी से बढ़ रही है। इन युवाओं में सबसे आम शिकायत घुटनों का जाम होना, कमर के निचले हिस्से में अकड़न, गर्दन का खिंचाव और कलाई में झनझनाहट है। डॉक्टरों के अनुसार, यह समस्या किसी बड़ी चोट या बुढ़ापे की वजह से नहीं, बल्कि सेडेंटरी लाइफस्टाइल और गलत बैठने के तरीके यानी पुअर पॉश्चर का सीधा नतीजा है।

डेस्क जॉब और जोड़ों का गहरा संबंध: समझिए विज्ञान

जब शरीर लंबे समय तक एक ही स्थिर मुद्रा में रहता है, तो जोड़ों के भीतर मौजूद सायनोवियल फ्लूइड का प्रवाह धीमा हो जाता है। यह फ्लूइड जोड़ों के लिए ग्रीस या लुब्रिकेंट का काम करता है, जो उन्हें घर्षण से बचाता है। घंटों कुर्सी पर जमे रहने से यह फ्लूइड सूखने लगता है, जिससे उठते-बैठते समय जोड़ों से चटकने की आवाज आने लगती है और अकड़न महसूस होती है। इसके अलावा, लगातार बैठने से शरीर के हिप फ्लेक्सर्स सिकुड़ जाते हैं और ग्लूटियल मांसपेशियां कमजोर पड़ने लगती हैं। जब शरीर का निचला हिस्सा कमजोर होता है, तो पूरा दबाव रीढ़ की हड्डी और घुटनों पर आ जाता है। यदि समय रहते इस पर ध्यान न दिया जाए, तो यह समस्या अर्ली-ऑस्टियोअर्थराइटिस और क्रोनिक स्पोंडिलाइटिस जैसी गंभीर बीमारियों में बदल सकती है।

खराब पोस्चर से गर्दन और रीढ़ पर पड़ता दबाव

अधिकांश लोग काम करते समय लैपटॉप की स्क्रीन की ओर झुक जाते हैं या कंधों को आगे झुकाकर टाइपिंग करते हैं। इस स्थिति को ‘फॉरवर्ड हेड पॉश्चर’ या ‘टेक्स्ट नेक सिंड्रोम’ कहा जाता है। सामान्य स्थिति में इंसानी सिर का वजन लगभग 4 से 5 किलोग्राम होता है, लेकिन जब गर्दन 45 डिग्री तक आगे झुकती है, तो रीढ़ की हड्डी पर लगभग 20 से 22 किलोग्राम का दबाव पड़ता है। यह लगातार पड़ने वाला तनाव सर्वाइकल डिस्क पर बुरा असर डालता है, जिससे गर्दन, कंधे और ऊपरी पीठ में तेज दर्द, सिरदर्द और हाथों में सुन्नपन की समस्या होने लगती है। इसी तरह, कुर्सी पर सीधे न बैठकर आगे की तरफ फिसल कर बैठने से लम्बर स्पाइन यानी कमर के निचले हिस्से पर अतिरिक्त दबाव बनता है, जो आगे चलकर स्लिप डिस्क का कारण बन सकता है।

कारपेल टनल सिंड्रोम और घुटनों की बढ़ती समस्या

लगातार कीबोर्ड पर टाइपिंग करने और माउस का अत्यधिक उपयोग करने से कलाई की नसों पर दबाव पड़ता है, जिसे मेडिकल भाषा में कारपेल टनल सिंड्रोम कहा जाता है। इसमें उंगलियों में झनझनाहट, कमजोरी और दर्द महसूस होता है। वहीं दूसरी ओर, पैरों को 90 डिग्री से कम मोड़कर रखने या क्रॉस लेग (पालथी मारकर या पैर पर पैर रखकर) घंटों बैठने से घुटनों के पटेला कार्टिलेज पर अत्यधिक खिंचाव आता है। इसे ‘मूवी गोअर सिंड्रोम’ या पेटेलोफेमोरल पेन सिंड्रोम भी कहते हैं, जहां लंबे समय तक बैठने के बाद खड़े होते ही घुटनों में अचानक तेज चुभन या दर्द होता है।

कार्यस्थल पर एर्गोनॉमिक्स का सही इस्तेमाल जरूरी

डेस्क जॉब के दुष्प्रभावों से बचने के लिए सबसे जरूरी कदम कार्यस्थल का सही सेटअप यानी एर्गोनॉमिक्स है। आपकी कुर्सी ऐसी होनी चाहिए जिसमें लम्बर सपोर्ट हो और रीढ़ की हड्डी का स्वाभाविक ‘S’ आकार बना रहे। बैठते समय आपके दोनों पैर जमीन पर सपाट होने चाहिए और घुटने कूल्हों के समानांतर या थोड़े नीचे होने चाहिए। कंप्यूटर या लैपटॉप की स्क्रीन आपकी आंखों के स्तर पर होनी चाहिए, ताकि काम करते वक्त गर्दन को नीचे न झुकाना पड़े। यदि लैपटॉप इस्तेमाल कर रहे हैं, तो लैपटॉप स्टैंड और एक्सटर्नल कीबोर्ड-माउस का प्रयोग करना अनिवार्य बना लें, जिससे कलाई और कोहनी प्राकृतिक 90 डिग्री के कोण पर रहें।

20-20-20 और माइक्रोबिक्स की आदत अपनाएं

लगातार काम के दौरान आंखों और शरीर को आराम देने के लिए 20-20-20 का नियम बेहद असरदार माना जाता है। हर 20 मिनट के काम के बाद, 20 सेकंड के लिए 20 फीट दूर किसी वस्तु को देखें और साथ ही अपनी कुर्सी से उठकर खड़े हो जाएं। हर एक घंटे में कम से कम 2 से 3 मिनट का ‘माइक्रो-ब्रेक’ लें। इस दौरान ऑफिस के कमरे में हल्का वॉक करें, सीढ़ियों का इस्तेमाल करें या पानी पीने उठें। यह छोटा सा ब्रेक शरीर में ब्लड सर्कुलेशन को दोबारा दुरुस्त कर देता है और जोड़ों को जमने से रोकता है।

सीट पर बैठे-बैठे की जाने वाली 5 आसान स्ट्रेचिंग

डेस्क पर रहते हुए भी आप कुछ सरल स्ट्रेचिंग के जरिए अपने जोड़ों को एक्टिव रख सकते हैं। पहला, शोल्डर रोल्स—कंधों को 10 बार आगे और 10 बार पीछे की तरफ गोल घुमाएं। दूसरा, नेक स्ट्रेच—गर्दन को धीरे-धीरे बाएं, दाएं, ऊपर और नीचे स्ट्रेच करें और कुछ सेकंड होल्ड करें। तीसरा, सीटेड ट्विस्ट—कुर्सी पर सीधे बैठें और धड़ को एक तरफ घुमाकर कुर्सी के पिछले हिस्से को पकड़ें, फिर दूसरी तरफ भी यही दोहराएं। चौथा, रिस्ट एक्सटेंशन—हाथों को आगे सीधा फैलाएं और उंगलियों को पीछे की ओर खींचकर कलाई की मांसपेशियों को रिलैक्स करें। पांचवां, एंकल रोटेशन—पैरों को हवा में उठाकर टखनों को क्लॉकवाइज और एंटी-क्लॉकवाइज घुमाएं ताकि पैरों की नसों में खून का प्रवाह सुचारू बना रहे।

खानपान और हाइड्रेशन का जोड़ों की सेहत पर असर

शारीरिक गतिविधियों के साथ-साथ सही पोषण जोड़ों के कार्टिलेज को मजबूत बनाए रखने में निर्णायक भूमिका निभाता है। दिनभर पर्याप्त मात्रा में पानी पिएं, क्योंकि डिहाइड्रेशन से कार्टिलेज की लोच कम होती है और जोड़ों में घर्षण बढ़ जाता है। अपने भोजन में कैल्शियम और विटामिन डी युक्त चीजें जैसे दूध, दही, पनीर, हरी पत्तेदार सब्जियां और नट्स जरूर शामिल करें। शरीर में ओमेगा-3 फैटी एसिड की पूर्ति के लिए अलसी के बीज, चिया सीड्स, अखरोट या फिश ऑयल का सेवन करें, जो जोड़ों की अंदरूनी सूजन को कम करने में मदद करते हैं। हर साल कम से कम एक बार विटामिन डी3 और विटामिन बी12 की जांच करवाएं और कमी होने पर डॉक्टर की सलाह से सप्लीमेंट्स लें।

शुरुआती लक्षणों को नजरअंदाज करना पड़ सकता है भारी

अक्सर लोग शुरुआत में होने वाले हल्के दर्द या अकड़न को थकावट समझकर पेनकिलर खा लेते हैं या अनदेखा कर देते हैं। डॉक्टरों का कहना है कि अगर उठने-बैठने में घुटनों से तेज कट-कट की आवाज आने लगे, सुबह उठने पर कमर में 30 मिनट से ज्यादा अकड़न रहे, या हाथों-पैरों में लगातार झुनझुनी का अहसास हो, तो तुरंत फिजियोथेरेपिस्ट या आर्थोपेडिक विशेषज्ञ से संपर्क करना चाहिए। समय पर की गई जीवनशैली में सुधार और हल्की कोर-स्ट्रेंथनिंग एक्सरसाइज से जोड़ों के बड़े नुकसान और भविष्य की सर्जरी से पूरी तरह बचा जा सकता है। याद रखें, काम आपकी जिंदगी का हिस्सा है, लेकिन स्वस्थ शरीर के बिना कोई भी सफलता अधूरी है।

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