
देश में आरक्षण की अधिकतम सीमा और जातिगत प्रतिनिधित्व को लेकर चल रही कानूनी बहस में एक बड़ा न्यायिक फैसला सामने आया है। हाईकोर्ट ने अनुसूचित जातियों (SC) और अनुसूचित जनजातियों (ST) के लिए आरक्षण प्रतिशत बढ़ाने वाले राज्य सरकार के कानून को असंवैधानिक घोषित करते हुए पूरी तरह रद्द (Quash) कर दिया है। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि यह वृद्धि संविधान के अनुच्छेद 14, 15 और 16 के तहत समानता के मूल अधिकार का उल्लंघन करती है और सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय की गई 50 प्रतिशत की अधिकतम सीमा की संवैधानिक लक्ष्मण रेखा को पार करती है।
क्या था मामला और कितना बढ़ाया गया था आरक्षण?
राज्य सरकार ने विशेष आयोग (जस्टिस नागमोहन दास आयोग) की सिफारिशों के आधार पर राज्य में एससी और एसटी समुदायों के आरक्षण में बढ़ोतरी का कानून बनाया था:
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अनुसूचित जाति (SC) कोटा: 15% से बढ़ाकर 17% किया गया।
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अनुसूचित जनजाति (ST) कोटा: 3% से बढ़ाकर 7% किया गया।
इस कानून के लागू होने के बाद राज्य में कुल सामाजिक आरक्षण 50% से बढ़कर सीधे 56% पर पहुंच गया था। इसके अलावा जब 10% आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) का कोटा जोड़ा जाता, तो कुल आरक्षण 66% तक पहुंच रहा था। इस वृद्धि को चुनौती देते हुए कई याचिकाएं हाईकोर्ट में दाखिल की गई थीं, जिनमें दलील दी गई थी कि यह कानून सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की संविधान पीठ द्वारा ‘इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ’ (1992) मामले में तय 50% की सीमा का सीधा उल्लंघन है।
हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी: ‘बिना असाधारण स्थिति के 50% की सीमा नहीं टूट सकती’
मामले की सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ ने सरकार की उन दलीलों को खारिज कर दिया जिसमें कहा गया था कि आबादी के अनुपात और सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर यह फैसला लिया गया था।
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इंदिरा साहनी फैसले की बाध्यता: अदालत ने कहा कि संविधान में आरक्षण पर्याप्त प्रतिनिधित्व (Adequate Representation) के लिए है, न कि आनुपातिक प्रतिनिधित्व (Proportional Representation) के लिए।
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कोई असाधारण परिस्थिति नहीं: सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों के अनुसार 50 प्रतिशत की सीमा केवल बहुत ही असाधारण और दूरदराज के क्षेत्रों की परिस्थितियों में ही लांघी जा सकती है। राज्य सरकार अदालत के समक्ष ऐसा कोई पुख्ता और असाधारण आधार साबित करने में विफल रही।
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खुली मेरिट पर असर: अदालत ने रेखांकित किया कि 50% से अधिक आरक्षण बढ़ाने से ओपन मेरिट (सामान्य वर्ग और मेरिट आधारित अभ्यर्थियों) के संवैधानिक अधिकारों का हनन होता है।
बिहार और छत्तीसगढ़ में भी रद्द हो चुके हैं ऐसे कानून
यह पहला मौका नहीं है जब किसी हाईकोर्ट ने 50% से ज्यादा आरक्षण देने वाले कानून पर रोक लगाई हो:
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बिहार मामला (पटना हाईकोर्ट): नीतीश कुमार सरकार द्वारा जाति आधारित गणना के बाद एससी, एसटी और पिछड़े वर्गों का कोटा 50% से बढ़ाकर 65% करने वाले कानून को पटना हाईकोर्ट ने असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया था।
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छत्तीसगढ़ मामला (बिलासपुर हाईकोर्ट): राज्य में आरक्षण को बढ़ाकर 58% करने के फैसले को भी हाईकोर्ट ने इंदिरा साहनी फैसले का उल्लंघन मानते हुए खारिज किया था।
अब क्या हैं सरकार के पास विकल्प?
हाईकोर्ट के इस कड़े आदेश के बाद राज्य में चल रही सरकारी भर्तियों, पदोन्नतियों और शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश प्रक्रियाओं पर इसका सीधा असर पड़ेगा। राज्य सरकार के पास अब दो मुख्य रास्ते बचे हैं:
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सुप्रीम कोर्ट में चुनौती: राज्य सरकार हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ शीर्ष अदालत में विशेष अनुमति याचिका (SLP) दाखिल कर अंतरिम स्थगन (Stay) की मांग कर सकती है।
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9वीं अनुसूची में शामिल कराने का दबाव: तमिलनाडु की तरह (जहां 69% आरक्षण लागू है) राज्य सरकार केंद्र से इस कानून को संविधान की नौवीं अनुसूची में डलवाने का राजनीतिक प्रस्ताव पारित कर सकती है, हालांकि आई.आर. कोएल्हो केस के बाद नौवीं अनुसूची के कानून भी न्यायिक समीक्षा के दायरे में आते हैं।
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