इंजेक्शन और सुई के दर्द से कांपती है रूह? कान में लगाएं ईयरफोन और सुनें पसंदीदा गाना, मेडिकल साइंस की नई राहत

अस्पताल के गलियारे में बैठते ही सफेद एप्रन पहने डॉक्टर या नर्स के हाथ में सिरिंज देखकर दिल की धड़कनें तेज हो जाना एक बेहद आम इंसानी प्रतिक्रिया है। चाहे खून की जांच के लिए नस ढूंढनी हो, ड्रिप चढ़ाने के लिए कैनुला लगाना हो या फिर कोई साधारण टीका लगना हो, नुकीली सुई की कल्पना मात्र से बच्चों से लेकर बड़ों तक के पसीने छूट जाते हैं। कई लोग तो ट्रिपैनोफोबिया यानी सुई के डर के चलते जरूरी चेकअप और इलाज तक टाल देते हैं। अगर आपके साथ भी ऐसा ही होता है, तो आधुनिक मेडिकल साइंस आपके लिए एक बेहद आसान, प्राकृतिक और जादुई समाधान लेकर आई है। आपको जानकर सुखद आश्चर्य होगा कि अगली बार जब आप पैथोलॉजी लैब, क्लिनिक या अस्पताल के वॉर्ड में बैठें, तो केवल अपने मोबाइल का ईयरफोन कान में लगाकर अपना मनपसंद संगीत बजाने भर से वह असहनीय चुभन पलक झपकते ही गायब हो सकती है। विज्ञान की प्रतिष्ठित शोध पत्रिका ‘फ्रंटियर्स इन पेन रिसर्च’ में छपे एक ताजा वैज्ञानिक अध्ययन ने यह साबित कर दिखाया है कि नस में सुई लगने के दौरान अगर मरीज का पसंदीदा गाना बज रहा हो, तो मस्तिष्क में दर्द का तीव्र संकेत बेहद कमजोर पड़ जाता है और मरीज को चुभन महसूस ही नहीं होती।

ज्यूरिख के यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल में 204 मरीजों पर हुआ यह ऐतिहासिक परीक्षण

इस अनूठे और मानवीय दृष्टिकोण वाले वैज्ञानिक अध्ययन को स्विट्जरलैंड के प्रतिष्ठित यूनिवर्सिटी हॉस्पिटल ज्यूरिख के न्यूरो और मेडिकल रिसर्चर्स की टीम ने अंजाम दिया है। शोधकर्ताओं ने अस्पताल में मैग्नेटिक रेजोनेंस इमेजिंग यानी एमआरआई जांच कराने पहुंचे 204 वयस्क मरीजों को इस क्लिनिकल स्टडी में शामिल किया। एमआरआई से पहले मरीज की नस में कंट्रास्ट डाई या दवा चढ़ाने के लिए कैनुला डाला जाता है, जो सामान्य पतली सुई की तुलना में थोड़ा ज्यादा दर्दनाक और असुविधाजनक अनुभव होता है। भारतीय अस्पतालों और डायग्नोस्टिक सेंटरों में भी मरीज अक्सर कैनुला लगाते समय हाथ खींचने की कोशिश करते हैं क्योंकि नस का दर्द सीधा मस्तिष्क की संवेदनशील नसों पर असर डालता है। ज्यूरिख के शोधकर्ताओं ने इस चुभन को नियंत्रित करने के लिए सभी 204 मरीजों को चार अलग-अलग विशेष समूहों में बांट दिया। पहले समूह के मरीजों को उनकी अपनी पसंद का गाना या संगीत सुनने की पूरी आजादी दी गई। दूसरे समूह को विश्व प्रसिद्ध पश्चिमी शास्त्रीय संगीतकार मोजार्ट की सुकून देने वाली कालजयी धुनें सुनाई गईं। तीसरे समूह को केवल ध्यान केंद्रित कराने वाला धीमा रिलैक्सेशन म्यूजिक सुनाया गया। वहीं चौथे समूह को पूरी तरह शांत वातावरण में बिना किसी हेडफोन या संगीत के सामान्य तरीके से कैनुला लगाया गया। शोधकर्ताओं ने हर मरीज से सुई चुभते ही शून्य सेकंड, फिर 30 सेकंड बाद और ठीक दो मिनट बीतने पर महसूस होने वाले दर्द के स्तर को वैज्ञानिक रेटिंग स्केल पर दर्ज किया।

अपनी पसंद की धुन सुनने वाले मरीजों को मिली सबसे ज्यादा जादुई राहत

जब चारों समूहों से जुटाए गए वैज्ञानिक डेटा का बारीकी से विश्लेषण किया गया, तो परिणाम हैरान कर देने वाले निकले। शोध में पाया गया कि जिन मरीजों ने अपनी पसंद का गाना सुना था, उन्हें सुई चुभने के 30 सेकंड बाद और दो मिनट बाद दर्द का अहसास न के बराबर हुआ। इतना ही नहीं, जिन मरीजों को कैनुला लगने से पहले ही किसी पुरानी बीमारी या तनाव के कारण शरीर में दर्द महसूस हो रहा था, उन्हें पसंदीदा संगीत सुनते ही सुई चुभते वक्त तुरंत भारी राहत मिली। उनकी नब्ज शांत रही और चेहरे पर आने वाली शिकन गायब हो गई। इसके विपरीत, क्लासिकल मोजार्ट का संगीत सुनने वाले कुछ मरीजों को राहत तो मिली, लेकिन उसका स्पष्ट प्रभाव केवल उन्हीं लोगों पर दिखा जो प्रक्रिया शुरू होने से पहले से किसी अन्य दर्द से जूझ रहे थे। सबसे ज्यादा चौंकाने वाला नतीजा तीसरे समूह में देखने को मिला, जहां डॉक्टरों द्वारा दिया गया शांत और मेडिटेटिव रिलैक्सेशन म्यूजिक दर्द को कम करने में कोई खास कमाल नहीं दिखा सका। इस समूह के मरीजों को सुई चुभने का अहसास लगभग चौथे समूह के उन मरीजों जैसा ही हुआ, जिन्होंने बिना किसी संगीत के सामान्य तरीके से सुई लगवाई थी।

रिलैक्सेशन ट्यून की जगह क्यों जीता आपका पर्सनल फेवरेट गाना

इस दिलचस्प नतीजे के पीछे की न्यूरोबायोलॉजिकल वजह समझाते हुए वैज्ञानिकों ने बताया कि दर्द केवल नस के स्तर पर नहीं, बल्कि इंसानी दिमाग के गहरे कॉग्निटिव और इमोशनल नेटवर्क में महसूस होता है। जब कोई मरीज अपना पसंदीदा गाना सुनता है, चाहे वह कोई सुरीला बॉलीवुड रोमांटिक ट्रैक हो, आध्यात्मिक भजन हो, गजल हो या कोई जोशीला रॉक सॉन्ग, दिमाग की तंत्रिकाएं उस संगीत से भावनात्मक रूप से तुरंत जुड़ जाती हैं। इससे मरीज का अटेंशन यानी ध्यान सुई लगने के डर और चुभन की जगह सीधे संगीत की लय, बोल और उससे जुड़ी सुखद यादों में पूरी तरह रम जाता है। दिमाग का न्यूरोलॉजिकल फोकस शिफ्ट होते ही पेन रिसेप्टर्स से आने वाले सिग्नल्स दब जाते हैं और दिमाग डोपामाइन जैसे हैप्पी हॉर्मोन रिलीज करने लगता है, जो प्राकृतिक पेनकिलर का काम करते हैं। इसके उलट, अस्पताल या क्लिनिक में बैकग्राउंड में बजने वाला बहुत धीमा, अनजान और एकरस रिलैक्सेशन म्यूजिक मरीज के मन को मजबूती से नहीं बांध पाता। मरीज का दिमाग भटककर बार-बार नर्स के हाथ, सिरिंज की सुई और अपनी कलाई पर ही टिक जाता है, जिसके चलते दर्द की तीव्रता कम होने के बजाय और ज्यादा हावी हो जाती है।

क्या हर छोटी-बड़ी बीमारी और सर्जरी में काम करेगा यह म्यूजिकल नुस्खा

ज्यूरिख के विशेषज्ञों का स्पष्ट मानना है कि यह तकनीक सामान्य क्लिनिक, पैथोलॉजी लैब, ब्लड डोनेशन कैंप और ओपीडी के दौरान मरीजों को मानसिक और शारीरिक आराम देने का सबसे सस्ता, सुरक्षित और असरदार तरीका साबित हो सकती है। खून का सैंपल देने, ग्लूकोज की बोतल चढ़ाने, दांतों के छोटे चेकअप या सालाना वैक्सीन लगवाने के दौरान अगर मरीज अपनी पसंद की प्लेलिस्ट सुने, तो उसका डर लगभग खत्म हो जाएगा। हालांकि, शोधकर्ताओं ने यह सावधानी भरा वैज्ञानिक पहलू भी स्पष्ट किया है कि यह अध्ययन केवल कुछ सेकंड तक चलने वाली कैनुला लगाने की प्रक्रिया पर किया गया था। इसलिए इस तकनीक को किसी बड़ी हड्डी की सर्जरी, गहरे घाव के टांकों या लंबे समय तक चलने वाले गंभीर मेडिकल प्रोसीजर के लिए एनेस्थीसिया का विकल्प नहीं माना जा सकता। गंभीर और अत्यधिक दर्द वाली बीमारियों में डॉक्टर की सुझाई गई दवाएं और चिकित्सीय प्रक्रियाएं ही अनिवार्य रहेंगी। लेकिन अगर बात रोजमर्रा के रूटीन चेकअप, सुई की चुभन और पैथोलॉजी के डर की हो, तो आपका मोबाइल और पसंदीदा ईयरफोन किसी चमत्कारी पेनकिलर से कम नहीं है।

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