कल शाम 3:30 बजे तक ही रहेगा विजयादशमी पूजा का शुभ मुहूर्त, जानें प्रदोष काल में रावण दहन का सबसे सटीक और उत्तम समय

बुराई पर अच्छाई और असत्य पर सत्य की शाश्वत विजय का पावन प्रतीक विजयादशमी यानी दशहरे का महापर्व कल देश भर में पूरी श्रद्धा, उत्साह और धूमधाम से मनाया जा रहा है। मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम द्वारा लंकापति रावण का संहार करने और मां भगवती दुर्गा द्वारा महिषासुर का वध कर देवताओं को भयमुक्त करने का यह पावन दिन हर सनातनी के लिए विशेष महत्व रखता है। इस दिन घर-घर में शस्त्र पूजा, वाहन पूजा, शमी पूजन और नए कार्यों की शुरुआत करने की सदियों पुरानी परंपरा है। पंचांगीय गणनाओं के अनुसार, इस वर्ष दशमी तिथि और अपराह्न काल का संयोग कुछ इस तरह बन रहा है कि पूजा-अर्चना के लिए समय बेहद सीमित रहेगा। दोपहर के बाद से शाम 3:30 बजे तक ही विशेष पूजा का मुख्य समय उपलब्ध रहेगा। यदि आप भी कल विजयादशमी के पावन अवसर पर शस्त्र पूजन, शमी दर्शन या रावण दहन के कार्यक्रम में शामिल होने की योजना बना रहे हैं, तो शुभ मुहूर्तों की सटीक जानकारी होना बेहद जरूरी है।

दशहरा पूजन का शुभ मुहूर्त: दोपहर 1:15 से शाम 3:30 बजे तक ही रहेगा समय

ज्योतिषाचार्यों के अनुसार दशहरे के दिन पूजा मुख्य रूप से ‘अपराह्न काल’ (दोपहर के समय) में करने का शास्त्रीय विधान है। पंचांग के मुताबिक कल दशहरा पूजन का सबसे श्रेष्ठ और फलदायी मुहूर्त दोपहर 01:15 बजे से शुरू होकर शाम 03:30 बजे तक रहेगा। इस लगभग सवा दो घंटे की समयावधि में ही शमी वृक्ष की विधिवत पूजा, अस्त्र-शस्त्रों की साफ-सफाई व अर्चन, व्यापारिक बही-खातों का पूजन और नए वाहनों की पूजा संपन्न करना सर्वोत्तम माना गया है। शास्त्रों में मान्यता है कि अपराह्न काल में की गई विजय पूजा से शत्रुओं पर विजय प्राप्त होती है और पूरे वर्ष कार्यों में आने वाली विघ्न-बाधाएं स्वतः दूर हो जाती हैं। यदि आप किसी नए प्रतिष्ठान की शुरुआत या नई खरीदारी की योजना बना रहे हैं, तो इस तय समय सीमा के भीतर शुभ संकल्प लेना अत्यंत लाभकारी रहेगा।

रावण दहन का सबसे सटीक समय: प्रदोष काल में ही करें पुतला दहन

दशहरे के दिन शाम को रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशालकाय पुतलों के दहन का विधान हमेशा ‘प्रदोष काल’ यानी सूर्यास्त के ठीक बाद शुरू होने वाले समय में किया जाता है। कल रावण दहन का सबसे उत्तम और मंगलकारी समय शाम 05:50 बजे से रात 08:25 बजे तक रहेगा। इस दौरान प्रदोष काल और शाम की गोधूलि वेला का सुंदर संयोग बन रहा है। शाम के समय जब सूर्य अस्ताचल की ओर प्रस्थान करता है और अंधकार की शुरुआत होती है, ठीक उसी संधि वेला में रावण के पुतले में अग्नि प्रवाहित कर यह संदेश दिया जाता है कि अहंकार और बुराई का अंत सुनिश्चित है। रामलीला मैदानों और सार्वजनिक समितियों के लिए भी शाम 06:00 बजे से 07:30 बजे के बीच रावण दहन का कार्यक्रम संपन्न कराना सबसे अनुकूल रहेगा।

दशहरे के दिन शस्त्र और शमी पूजन का अचूक महत्व

दशहरे का दिन केवल उत्सव का नहीं, बल्कि आत्मरक्षा और सामर्थ्य के वंदन का भी पर्व है। क्षत्रिय परंपरा और सनातन संस्कृति में इस दिन घर में रखे सभी औजारों, सुरक्षा अस्त्रों, तलवारों और आधुनिक औजारों पर रोली-अक्षत लगाकर, कलावा बांधकर उनकी पूजा की जाती है। इसके साथ ही शमी के वृक्ष की पूजा का विशेष फल माना गया है। महाभारत काल में पांडवों ने अपने अज्ञातवास के दौरान इसी पेड़ पर गांडीव समेत सभी दिव्य हथियार छिपाए थे और विजय प्राप्त की थी। वहीं भगवान श्रीराम ने भी लंका पर चढ़ाई करने से पहले शमी वृक्ष के समक्ष सिर झुकाकर विजय का आशीर्वाद मांगा था। कल अपराह्न मुहूर्त के दौरान शमी के पत्तों की पूजा कर उन्हें एक-दूसरे को ‘स्वर्ण’ (सोना) मानकर भेंट करने से घर-परिवार में कभी धन-धान्य की कमी नहीं रहती और आपसी प्रेम बढ़ता है।

विजयादशमी पर इन विशेष नियमों का रखें ध्यान

शास्त्रों के अनुसार विजयादशमी एक ऐसा स्वयं सिद्ध ‘अबूझ मुहूर्त’ है जिसमें बिना पंचांग देखे भी कई शुभ कार्य किए जा सकते हैं। लेकिन पूजा और रावण दहन के लिए तय समय का पालन करना आध्यात्मिक दृष्टि से अनिवार्य माना गया है। कल सुबह स्नान आदि से निवृत्त होकर सबसे पहले अपने ईष्टदेव और प्रभु श्रीराम का ध्यान करें। दोपहर 3:30 बजे से पहले अपने घर के मुख्य द्वार पर रंगोली बनाएं, अपराजिता के पौधे या फूल का पूजन करें और शमी के पत्ते तिजोरी में रखें। शाम को रावण दहन देखने के बाद घर लौटते समय उस स्थल की थोड़ी सी भस्म (राख) को सुरक्षित लाकर घर के आग्नेय कोण में रखने की लोक परंपरा भी है, जिसे नकारात्मक ऊर्जा को दूर रखने वाला माना जाता है। समय का ध्यान रखते हुए इन शुभ मुहूर्तों में की गई आराधना आपके जीवन में सफलता, यश और कीर्ति का नया मार्ग प्रशस्त करेगी।

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