विजयादशमी पर क्यों जरूरी है देवी अपराजिता और शमी पूजन? जानिए शुभ मुहूर्त, वराह पुराण का रहस्य और श्रीराम की विजय से जुड़ा इतिहास

शारदीय नवरात्रि के नौ दिनों तक मां दुर्गा के नौ पावन रूपों की उपासना के बाद दशमी तिथि यानी विजयादशमी का पर्व पूरे देश में विजय और शक्ति के प्रतीक के रूप में मनाया जाता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, विजयादशमी के दिन मां दुर्गा के मूल स्वरूप ‘देवी अपराजिता’ की विशेष पूजा का विधान है। सनातन धर्म में अपराजिता का शाब्दिक अर्थ है ‘जिसे कभी कोई पराजित न कर सके’। यह देवी शक्ति की वह संहारकारी और रौद्र ऊर्जा हैं जो जीवन के हर संघर्ष, युद्ध, मुकदमे और व्यापारिक संकटों में विजयश्री का वरदान देती हैं। शस्त्र पूजा हो या नए कार्यों की शुरुआत, धर्मग्रंथों में इस दिन अपराजिता देवी के आह्वान के बिना नवरात्रि पूजन को अपूर्ण माना गया है। प्राचीन काल में जहां यह पर्व देवासुर संग्राम में देवताओं की दानवों पर विजय के रूप में मनाया जाता था, वहीं त्रेता युग में मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम द्वारा अहंकारी लंकापति रावण का वध करने के बाद यह दिन विजयादशमी के महात्योहार के रूप में जन-जन के बीच प्रसिद्ध हो गया।

देवासुर संग्राम और शमी वृक्ष से जुड़ा देवी अपराजिता की आराधना का पावन इतिहास

देवी अपराजिता के पूजन की जड़ें सतयुग के उस भीषण देवासुर संग्राम से जुड़ी हैं, जब दानवों ने स्वर्गलोक पर अधिकार कर समस्त सृष्टि को संकट में डाल दिया था। उस समय नवदुर्गाओं ने प्रकट होकर असुरों का समूल नाश किया। युद्ध की समाप्ति के बाद जगत जननी मां दुर्गा अपनी मूल आदिशक्ति देवी अपराजिता की विशेष साधना करने के लिए शमी की पत्तियां साथ लेकर हिमालय की कंदराओं में अंतर्धान हो गई थीं। यही कारण है कि विजयादशमी के पावन अवसर पर शमी के वृक्ष की पूजा और इसके पत्तों को सोने के प्रतीक के रूप में भेंट करने की सुदृढ़ परंपरा विकसित हुई। शमी वृक्ष को अग्नि का वास और शनि के कुप्रभावों को शांत करने वाला माना गया है। जब कोई भक्त विजयादशमी के दिन शमी पूजन के साथ अपराजिता का ध्यान करता है, तो उसके घर में अटूट ऐश्वर्य, आरोग्यता और अभय का वास सुनिश्चित हो जाता है।

त्रेता युग में भगवान श्रीराम को कैसे प्राप्त हुआ देवी अपराजिता का विजय वरदान

त्रेता युग में जब धर्म और अधर्म का महासंग्राम चरम पर था, तब रावण के भीषण मायावी बल के कारण युद्ध अनिर्णायक स्थिति में पहुंच गया था। रणभूमि में रावण अपनी विशाल सेना के साथ डटा हुआ था और उसकी शक्तियां कम होने का नाम नहीं ले रही थीं। युद्ध के उस गंभीर मोड़ पर भगवान श्रीराम ने विजय प्राप्ति की प्रबल अभिलाषा से युद्धभूमि में उतरने से पूर्व देवी अपराजिता की कठोर आराधना की। श्रीराम की अनन्य भक्ति और धर्म रक्षा के संकल्प से प्रसन्न होकर स्वयं आदिशक्ति अपराजिता प्रकट हुईं। देवी ने प्रभु श्रीराम को अमोघ विजय का वरदान दिया और रावण के अंत का मार्ग प्रशस्त किया। देवी अपराजिता से मिले उस दिव्य आशीर्वाद और असीम बल के सहारे ही श्रीराम ने दशानन रावण का संहार कर धर्म ध्वजा की पुनर्स्थापना की थी।

विजयादशमी पर अपराजिता देवी, शस्त्र पूजा और रावण दहन का सबसे सटीक शुभ मुहूर्त

विजयादशमी के दिन पूजन का फल तभी पूर्ण रूप से प्राप्त होता है जब उसे शास्त्रों द्वारा निर्देशित सही काल में संपन्न किया जाए। आज दोपहर के समय देवी अपराजिता की पूजा के लिए दोपहर 01:14 बजे से दोपहर 03:30 बजे तक का अपराह्न काल अत्यंत फलदायी और प्रशस्त माना गया है। इस मुख्य पूजन के उपरांत दोपहर 01:59 बजे से दोपहर 02:45 बजे के मध्य विजय मुहूर्त के दौरान शस्त्र पूजा, वाहन पूजा और नए अनुष्ठानों की शुरुआत करना सर्वार्थ सिद्धि प्रदान करता है। वहीं बुराई के प्रतीक रावण, मेघनाद और कुंभकर्ण के पुतलों के दहन का सबसे शुभ समय शाम 05:47 बजे से लेकर रात्रि 08:21 बजे तक रहेगा। इस समयावधि में पूजन और उत्सव मनाना परिवार में सुख, समृद्धि और नकारात्मक शक्तियों से मुक्ति की गारंटी देता है।

वराह पुराण में छिपा रहस्य: देवी वैष्णवी के कठोर तप से जन्मीं अपराजिता

वराह पुराण के गूढ़ प्रसंगों के अनुसार देवी अपराजिता की उत्पत्ति का सीधा संबंध भगवान श्रीहरि विष्णु की पराशक्ति देवी वैष्णवी के कठोर तप से है। वैष्णवी वस्तुतः देवी त्रिकला का ही एक परम तेजस्वी रूप हैं, जो विष्णु की योगमाया और संरक्षण शक्ति की अधिष्ठात्री हैं। उनका वर्ण दिव्य लाल है, जो तेज और ऊर्जा का परिचायक है। वैष्णवी के इसी तपोबल से देवी अपराजिता सहित अनेक पराक्रमशाली देवियों का प्राकट्य हुआ था। महाभारत काल के रचयिता महर्षि वेदव्यास ने भी अपने ग्रंथों में देवी अपराजिता को आदिकाल की सर्वश्रेष्ठ और कल्याणकारी देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया है। मान्यता है कि दोपहर के बाद और गोधूलि वेला से पहले उत्तर-पूर्व दिशा में अष्टदल कमल बनाकर नीले अपराजिता के पुष्पों से देवी का अर्चन करने से जन्म-जन्मांतर की दरिद्रता और ग्रह दोषों का हमेशा के लिए नाश हो जाता है।

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