AI से आगे निकलने की तैयारी में ट्रंप: अमेरिका में ‘सुपर इंटेलिजेंस’ पर जोर देने का ऐलान, सरकारी कागजों से ‘आर्टिफिशियल’ शब्द हटाने का आदेश

दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर मची तकनीकी क्रांति के बीच अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक चौंकाने वाला और बड़ा नीतिगत ऐलान किया है। ट्रंप प्रशासन ने साफ किया है कि अब अमेरिका केवल पारंपरिक या मौजूदा ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश का पूरा फोकस ‘सुपर इंटेलिजेंस’ (Super Intelligence – SI) की दिशा में तकनीकी बढ़त हासिल करने पर होगा। इसके लिए राष्ट्रपति ट्रंप ने एक विशेष कार्यकारी आदेश (Executive Order) पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसके तहत सभी संघीय विभागों, रक्षा एजेंसियों और आधिकारिक सरकारी दस्तावेजों में ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ शब्द के इस्तेमाल को चरणबद्ध तरीके से समाप्त कर उसकी जगह ‘सुपर इंटेलिजेंस’ शब्द को अनिवार्य रूप से लागू करने के निर्देश दिए गए हैं।

ट्रंप का तर्क है कि ‘आर्टिफिशियल’ (कृत्रिम) शब्द इस तकनीक की असीम क्षमता, वादे और तेजी से बढ़ रही कार्यक्षमता को कमतर आंकता है। जब तकनीक इंसानी दिमाग की सीमाओं को पार कर राष्ट्र की सुरक्षा, अर्थव्यवस्था और नवाचार का केंद्र बन रही है, तो इसे केवल ‘कृत्रिम’ कहना गलत है। यह कदम महज एक शाब्दिक या शब्दावली बदलाव नहीं है, बल्कि इसके जरिए अमेरिका वैश्विक पटल पर यह संदेश देना चाहता है कि वह अगली पीढ़ी की उस सर्वोच्च बुद्धिमत्ता (ASI – Artificial Superintelligence) के विकास में दुनिया का निर्विवाद अगुआ बना रहना चाहता है, जो आने वाले दशकों में वैश्विक सत्ता का निर्धारण करेगी।

‘सुपर इंटेलिजेंस फोर्स’ का गठन: रक्षा, खुफिया और व्यापार का साझा मंच

इस महत्वाकांक्षी विजन को जमीन पर उतारने के लिए राष्ट्रपति ट्रंप ने एक हाई-पावर्ड ‘सुपर इंटेलिजेंस फोर्स’ (Super Intelligence Force) के गठन की औपचारिक घोषणा की है। यह विशेष टास्क फोर्स सीधे राष्ट्रपति और व्हाइट हाउस के चीफ ऑफ स्टाफ को रिपोर्ट करेगी। इस टास्क फोर्स में अमेरिकी खुफिया एजेंसियां (CIA, NSA), रक्षा विभाग (पेंटागन), ऊर्जा विभाग और वाणिज्य व व्यापार मंत्रालय के शीर्ष अधिकारियों को शामिल किया गया है। इसका मुख्य उद्देश्य राष्ट्रीय सुरक्षा से लेकर आर्थिक नीतियों तक सभी क्षेत्रों में सुपर इंटेलिजेंस के अनुप्रयोगों को एक केंद्रीय रणनीति के तहत संचालित करना है।

अमेरिका की नई रणनीति यह सुनिश्चित करना है कि देश के महत्वपूर्ण बुनियादी ढांचे, जैसे न्यूक्लियर ग्रिड, उपग्रह नेटवर्क, वित्तीय प्रणाली और उन्नत हथियार प्रणालियों में केवल अमेरिकी सुपर कंप्यूटिंग और अत्याधुनिक एल्गोरिदम का ही इस्तेमाल हो। यह टास्क फोर्स निजी टेक दिग्गजों—जैसे एनवीडिया, ओपनएआई, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट और एक्सएआई—के साथ मिलकर बड़े डेटा सेंटर्स के लिए निर्बाध बिजली आपूर्ति, चिप सप्लाई चेन और एडवांस्ड सेमीकंडक्टर रिसर्च को गति देने के लिए एक समन्वयक की भूमिका निभाएगी।

चीन के साथ तकनीकी शीतयुद्ध: बढ़त बनाए रखने की छटपटाहट

ट्रंप के इस आक्रामक रुख के पीछे की सबसे बड़ी वजह चीन के साथ चल रही तकनीकी और सामरिक प्रतिस्पर्धा है। पिछले कुछ वर्षों में चीन ने क्वांटम कंप्यूटिंग, डीप-सीखने वाले मॉडल्स और रोबोटिक्स में भारी सरकारी निवेश किया है। बीजिंग का घोषित लक्ष्य है कि वह वैश्विक स्तर पर एआई का सबसे बड़ा हब बने। ट्रंप प्रशासन इस बात से भली-भांति वाकिफ है कि यदि अमेरिका ने सुपर इंटेलिजेंस की दौड़ में थोड़ी भी ढिलाई बरती, तो भविष्य की सैन्य और आर्थिक ताकत का संतुलन हमेशा के लिए पूरब की ओर झुक जाएगा।

ट्रंप ने अपने बयानों में बार-बार रेखांकित किया है कि अमेरिका के पास वर्तमान में अन्य देशों और खासकर चीन पर एक बहुत बड़ी बढ़त हासिल है, और इस बढ़त को किसी भी कीमत पर खोने नहीं दिया जाएगा। इसके लिए उन्होंने अमेरिकी कंपनियों पर कड़े सरकारी नियमों और भारी नौकरशाही की पाबंदियों को खत्म करने का संकेत दिया है। बाइडेन प्रशासन के दौरान जहां एआई सुरक्षा और सख्त सरकारी दिशानिर्देशों पर अधिक बल दिया जा रहा था, वहीं ट्रंप का मॉडल ‘इंडस्ट्री-ड्रिवन’ यानी उद्योग जगत के स्व-नियमन और तीव्र विस्तार (डिरिगुलेशन) पर आधारित है, ताकि अमेरिकी कंपनियां बिना किसी लालफीताशाही के दुनिया के सबसे ताकतवर कंप्यूटिंग मॉडल तैयार कर सकें।

ऊर्जा, डेटा सेंटर और चिप्स: सुपर इंटेलिजेंस के लिए बुनियादी ढांचे की तैयारी

सुपर इंटेलिजेंस का सपना केवल सॉफ्टवेयर कोड लिखने से पूरा नहीं हो सकता; इसके लिए विशाल डेटा सेंटर्स, गीगावाट स्तर की निर्बाध बिजली और लाखों की संख्या में उन्नत जीपीयू (GPU) चिप्स की दरकार होती है। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप के इस कदम से अमेरिका के भीतर ऊर्जा क्षेत्र और सेमीकंडक्टर निर्माण में निवेश की अभूतपूर्व बाढ़ आने वाली है। अमेरिकी टेक कंपनियों ने पहले ही चेतावनी दी है कि पारंपरिक पावर ग्रिड आधुनिक डेटा सेंटर्स की बिजली जरूरतों को पूरा करने के लिए नाकाफी साबित हो रहे हैं।

इसी को देखते हुए ट्रंप प्रशासन ने छोटे मॉड्यूलर परमाणु रिएक्टरों (SMRs), गैस आधारित पावर प्लांट्स और घरेलू चिप निर्माण को फास्ट-ट्रैक क्लीयरेंस देने की रूपरेखा तैयार की है। सेमीकंडक्टर निर्माण के लिए ताइवान और बाहरी देशों पर निर्भरता को कम करते हुए घरेलू धरती पर एरिजोना, टेक्सास और ओहायो जैसे राज्यों में फैब यूनिट्स को तेजी से सक्रिय किया जा रहा है। इसका मकसद यह है कि सुपर इंटेलिजेंस के निर्माण के लिए जरूरी हार्डवेयर और ऊर्जा का पूरा नियंत्रण अमेरिकी सीमाओं के भीतर ही सुरक्षित रहे।

आगे की राह: तकनीकी क्रांति या शब्दों का नया कॉस्मेटिक खेल?

ट्रंप के इस बड़े नीतिगत बदलाव को लेकर तकनीकी विशेषज्ञों और आलोचकों के बीच दोहरी राय देखने को मिल रही है। सिलिकॉन वैली के एक बड़े वर्ग और निवेशकों ने नियमों के सरलीकरण और सुपर इंटेलिजेंस पर राष्ट्रीय मिशन के स्तर पर काम करने के फैसले का स्वागत किया है। उनका मानना है कि इससे नवाचार की गति दोगुनी होगी और वैश्विक बाजार में अमेरिकी टेक कंपनियों की बादशाहत और अधिक मजबूत होगी।

दूसरी ओर, कुछ आलोचकों और सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि महज आधिकारिक दस्तावेजों में ‘आर्टिफिशियल’ की जगह ‘सुपर’ लिख देने से तकनीक रातोंरात असाधारण नहीं हो जाती। तकनीकी रूप से ‘आर्टिफिशियल सुपरइंटेलिजेंस’ (ASI) उस काल्पनिक मुकाम को कहा जाता है जहां मशीनें हर मामले में मानव मस्तिष्क से अधिक सक्षम हो जाएं, और मौजूदा वैज्ञानिक जगत अभी उस स्तर से काफी कदम दूर है। इसके अलावा, बिना सुरक्षा गार्डरेल्स के सुपर इंटेलिजेंस की अंधी दौड़ साइबर सुरक्षा, कॉपीराइट और नौकरियों के विस्थापन को लेकर नए संकट खड़े कर सकती है। बहरहाल, व्हाइट हाउस से निकले इस फरमान ने यह स्पष्ट कर दिया है कि अमेरिका ने अब वैश्विक तकनीकी मुकाबले को एक नए पायदान पर ले जाने का बिगुल फूंक दिया है।

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