US मिडटर्म इलेक्शन बिगाड़ सकते हैं ‘अमेरिका फर्स्ट’ विदेश नीति का खेल; अगर हाथ से निकला कैपिटल हिल तो क्या होगा

अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में दूसरे कार्यकाल की शुरुआत करने के बाद डोनाल्ड ट्रंप के लिए 3 नवंबर को होने वाले मध्यावधि चुनाव (US Midterm Elections) किसी राजनीतिक चक्रव्यूह से कम साबित नहीं हो रहे हैं। अमेरिकी लोकतंत्र में मध्यावधि चुनाव हमेशा से सत्तासीन राष्ट्रपति के कामकाज का पहला और सबसे कठोर जनमत संग्रह माना जाता है। इस बार का चुनाव केवल घरेलू राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर वाशिंगटन की विदेश नीति, वैश्विक व्यापार युद्ध, नाटो सहयोगियों के साथ रिश्तों और मध्य पूर्व से लेकर एशिया तक फैले कूटनीतिक समीकरणों पर पड़ने वाला है। कैपिटल हिल की 435 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा (House of Representatives) और 100 सदस्यीय सीनेट (Senate) में यदि रिपब्लिकन पार्टी अपना बेहद मामूली बहुमत गंवा बैठती है, तो ट्रंप के ‘अमेरिका फर्स्ट’ एजेंडे की गति पर अचानक सबसे बड़ा ब्रेक लग सकता है।

ऐतिहासिक रूप से अमेरिकी मतदाता मध्यावधि चुनावों में सत्तारूढ़ दल को झटका देने के लिए जाने जाते हैं। जॉर्ज डब्ल्यू. बुश से लेकर बराक ओबामा और जो बाइडन तक, लगभग हर आधुनिक राष्ट्रपति को अपने पहले दो साल पूरे होते ही मध्यावधि चुनाव में विपक्षी दल की बगावत का सामना करना पड़ा है। लेकिन इस बार का चुनाव एक दुर्लभ ‘विदेश नीति केंद्रित’ चुनाव बनता नजर आ रहा है। अमेरिकी मतदाता अब यह महसूस कर रहे हैं कि व्हाइट हाउस द्वारा लिए गए आक्रामक अंतरराष्ट्रीय फैसले—चाहे वह चीनी और यूरोपीय आयातों पर लगाए गए दंडात्मक टैरिफ हों या पश्चिम एशिया में बढ़ते सैन्य तनाव—सीधे तौर पर उनकी जेब, किराने के सामान के दाम और घरेलू महंगाई को प्रभावित कर रहे हैं। जब विदेश नीति आम नागरिक की रसोई तक असर डालने लगे, तो मतपेटियों में गुस्सा फूटना स्वाभाविक हो जाता है।

कांग्रेस के हाथ में चाबी: अगर हाउस या सीनेट फिसली तो क्या बदल जाएगा?

अमेरिकी संविधान के तहत राष्ट्रपति के पास सशस्त्र बलों की कमान और विदेशी वार्ताओं का अधिकार जरूर होता है, लेकिन सरकारी खजाने की चाबी यानी ‘पावर ऑफ द पर्स’ केवल अमेरिकी कांग्रेस के हाथों में होती है। वर्तमान में प्रतिनिधि सभा में रिपब्लिकनों का बहुमत इतना बारीक है कि डेमोक्रेट्स को सदन पर दोबारा कब्जा करने के लिए केवल कुछ ही सीटों के उलटफेर की दरकार है। यदि डेमोक्रेटिक पार्टी निचले सदन (House) का नियंत्रण हासिल कर लेती है, तो ट्रंप प्रशासन का कोई भी बजट प्रस्ताव बिना समझौते के पारित नहीं हो सकेगा।

विपक्षी नियंत्रण वाला सदन न केवल अंतरराष्ट्रीय रक्षा सहायता और विदेशी फंडिंग पर कैंची चला सकता है, बल्कि राष्ट्रपति की विदेश नीति से जुड़े गोपनीय फैसलों, सैन्य अभियानों और व्यापारिक समझौतों की जांच के लिए दर्जनों समितियों (Congressional Committees) का गठन कर सकता है। समन भेजने, शीर्ष अधिकारियों को सार्वजनिक गवाही के लिए बुलाने और नीतिगत गलतियों को उजागर करने की डेमोक्रेट्स की यह क्षमता ट्रंप के लिए हर दिन नया संकट पैदा करेगी। वहीं दूसरी ओर, यदि सीनेट में भी सत्ता संतुलन बदला, तो विदेश मंत्री, रक्षा मंत्री और विभिन्न देशों में तैनात होने वाले राजदूतों की नियुक्तियों को रोकने का हथियार भी विपक्ष के हाथ लग जाएगा।

टैरिफ वॉर और घरेलू महंगाई: मतदाताओं की नाराजगी की असली वजह

डोनाल्ड ट्रंप की आर्थिक विदेश नीति का सबसे प्रमुख हथियार भारी आयात शुल्क यानी टैरिफ रहा है। उन्होंने दुनिया भर के देशों, जिसमें सहयोगी यूरोपीय देश, कनाडा, मेक्सिको और प्रतिद्वंद्वी चीन शामिल हैं, से आने वाले सामानों पर कड़े टैरिफ लागू करने की नीति अपनाई। ट्रंप का दावा था कि इससे अमेरिकी विनिर्माण को संजीवनी मिलेगी और स्थानीय नौकरियां सुरक्षित होंगी। लेकिन जमीनी हकीकत यह रही कि विदेशी सरकारों ने जवाबी कार्रवाई करते हुए अमेरिकी सोयाबीन, मक्का, ऑटोमोबाइल और पोर्क पर भारी प्रतिबंध ठोक दिए।

नतीजतन, अमेरिकी विनिर्माण क्षेत्र में कच्चे माल की लागत बढ़ गई और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें आसमान छूने लगीं। आयोवा, विस्कॉन्सिन, मिशिगन और पेंसिल्वेनिया जैसे महत्वपूर्ण स्विंग स्टेट्स में किसानों और मध्यमवर्गीय परिवारों में इस बात को लेकर गहरी नाराजगी देखी जा रही है। आर्थिक थिंक टैंकों और जनमत सर्वेक्षणों के आंकड़े बताते हैं कि 70 से 80 प्रतिशत से अधिक मतदाता टैरिफ को जीवन-यापन की लागत बढ़ाने का जिम्मेदार मान रहे हैं। यदि मध्यावधि चुनाव में यह ग्रामीण और कामकाजी मतदाता रिपब्लिकन उम्मीदवारों से मुंह मोड़ते हैं, तो कांग्रेस में ट्रंप के टैरिफ लागू करने के अधिकारों को सीमित करने वाला कानून पारित होना तय माना जा रहा है।

वैश्विक गठबंधनों में पसरा सन्नाटा: क्या रुक जाएगी कूटनीतिक सौदेबाजी?

वाशिंगटन में हो रही इस सियासी खींचतान की गूंज पूरी दुनिया की राजधानियों में सुनी जा रही है। दुनिया भर के मित्र और प्रतिद्वंद्वी देश इस समय ‘वेट एंड वॉच’ (इंतजार करो और देखो) की मुद्रा में चले गए हैं। यूक्रेन और यूरोपीय देशों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि क्या कीव को मिलने वाली रक्षा सहायता और नाटो के प्रति अमेरिकी प्रतिबद्धता में कोई बड़ा मोड़ आने वाला है। यदि कांग्रेस में यूक्रेन समर्थक खेमा मजबूत होता है, तो ट्रंप के लिए रूस-यूक्रेन युद्ध को अपनी शर्तों पर अचानक समाप्त करने का दबाव बनाना मुश्किल हो जाएगा।

दूसरी तरफ, चीन, ईरान और खाड़ी देशों के रणनीतिकार भी इस चुनाव परिणाम की प्रतीक्षा कर रहे हैं। बीजिंग अच्छी तरह जानता है कि एक बंटी हुई अमेरिकी सरकार (Divided Government) घरेलू स्तर पर इतनी उलझ जाती है कि उसके लिए नए आक्रामक प्रतिबंधों या कड़े व्यापार समझौतों को लागू करना बेहद पेचीदा हो जाता है। ताइवान जलडमरूमध्य और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी रक्षा रणनीति के दीर्घकालिक बजट को मंजूरी देने के लिए जिस राजनीतिक स्थिरता की जरूरत होती है, वह चुनाव नतीजों के आधार पर ही तय होगी। कोई भी विदेशी ताकत चुनाव से ठीक पहले ट्रंप प्रशासन के साथ किसी बड़े बहुपक्षीय समझौते पर दस्तखत करने का जोखिम नहीं उठाना चाहती।

आगे की राह: 120वीं कांग्रेस और ट्रंप के अंतिम दो साल का रोडमैप

मध्यावधि चुनाव के बाद जनवरी में जब नई 120वीं अमेरिकी कांग्रेस अपना कार्यभार संभालेगी, तो वाशिंगटन की सत्ता का चरित्र पूरी तरह बदल चुका हो सकता है। यदि रिपब्लिकन पार्टी दोनों सदनों में अपनी बढ़त बनाए रखने में किसी तरह कामयाब रहती है, तो यह ट्रंप की ‘अमेरिका फर्स्ट’ नीति पर जनता की अंतिम मुहर मानी जाएगी और वे अपनी वैश्विक नीतियों को बिना किसी हिचक के और आक्रामक बना सकेंगे।

लेकिन अगर पूर्वानुमानों के अनुसार डेमोक्रेट्स कैपिटल हिल के एक भी सदन में बहुमत का झंडा फहराने में सफल हो जाते हैं, तो ट्रंप को अपने दूसरे कार्यकाल के शेष दो वर्षों में ‘लंगड़ी बत्तख’ (Lame Duck) जैसी स्थिति का सामना करना पड़ेगा। ऐसी स्थिति में वे कानून बनाने के बजाय केवल कार्यकारी आदेशों (Executive Orders) के सहारे प्रशासन चलाने के लिए विवश होंगे, जिन्हें अमेरिकी संघीय अदालतें अक्सर रद्द करती रहती हैं। कुल मिलाकर, यह मध्यावधि चुनाव केवल सांसदों को चुनने का मुकाबला नहीं है, बल्कि यह तय करने की अंतिम परीक्षा है कि 21वीं सदी के इस नाजुक वैश्विक दौर में अमेरिका दुनिया को किस नजरिए से हांकने की ताकत रखता है।

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