
चेन्नई: तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय (थलपति विजय) ने दक्षिण भारत के करोड़ों वादकारियों और आम नागरिकों को सस्ता व सुलभ न्याय दिलाने के लिए एक बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को एक विस्तृत पत्र लिखकर चेन्नई में भारत के सर्वोच्च न्यायालय की एक स्थायी क्षेत्रीय पीठ (Regional Bench of the Supreme Court) स्थापित करने की दिशा में आवश्यक और अनुकूल कदम उठाने का औपचारिक अनुरोध किया है।
मुख्यमंत्री विजय ने अपने पत्र में स्पष्ट किया कि चेन्नई में सुप्रीम कोर्ट की पीठ स्थापित करना केवल तमिलनाडु की ही नहीं, बल्कि समूचे दक्षिण भारत के राज्यों की लगभग 46 साल पुरानी और लंबे समय से लंबित मांग है। उन्होंने संविधान के अनुच्छेदों, विधि आयोग (Law Commission) की रिपोर्टों और संसदीय समितियों की सिफारिशों का हवाला देते हुए रेखांकित किया कि दिल्ली की भौगोलिक दूरी और मुकदमेबाजी का भारी खर्च दक्षिण भारत के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए न्याय पाने के रास्ते में सबसे बड़ी बाधा बन रहा है।
1. ‘संविधान के अनुच्छेद 130’ और 1980 से लंबित मांग का दिया हवाला
मुख्यमंत्री विजय ने पत्र में संविधान के अनुच्छेद 130 का विशेष रूप से उल्लेख किया, जिसमें देश में सुप्रीम कोर्ट की अतिरिक्त पीठें स्थापित करने का स्पष्ट संवैधानिक प्रावधान मौजूद है:
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अनुच्छेद 130 का प्रावधान: संविधान का अनुच्छेद 130 कहता है कि सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली में या ऐसे अन्य स्थान अथवा स्थानों पर बैठ सकता है, जिसे भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI), राष्ट्रपति के पूर्व अनुमोदन से समय-समय पर तय करें।
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1980 से उठ रही है मांग: सीएम विजय ने याद दिलाया कि तमिलनाडु सरकार ने पहली बार आधिकारिक रूप से 1980 में चेन्नई में क्षेत्रीय पीठ की मांग उठाई थी। इससे पूर्व 1979 के मुख्य न्यायाधीशों के सम्मेलन (Chief Justices’ Conference) में भी विकेंद्रीकरण और क्षेत्रीय पीठों के गठन पर विमर्श हुआ था।
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लगातार प्रस्ताव खारिज होने पर पुनर्विचार की अपील: यद्यपि पूर्व में सुप्रीम कोर्ट की पूर्ण पीठ ने क्षेत्रीय पीठों के गठन के प्रस्तावों से असहमति जताई थी, लेकिन मुख्यमंत्री ने केंद्र सरकार से आग्रह किया है कि बदलते समय और मुकदमों के बढ़ते बोझ को देखते हुए इस पुराने रुख पर नए सिरे से विचार किया जाए।
2. ‘दूरी और खर्च के चलते अनुच्छेद 32 से वंचित हो रहे दक्षिण के नागरिक’
मुख्यमंत्री ने अपने पत्र में न्याय तक आम आदमी की पहुंच के अधिकार पर जोर देते हुए लिखा:
“हमारे संविधान निर्माताओं का स्पष्ट विजन था कि चाहे अमीर हो या गरीब, देश के प्रत्येक नागरिक को न्याय की सर्वोच्च चौखट तक सीधी और आसान पहुंच मिलनी चाहिए। लेकिन व्यावहारिक हकीकत यह है कि दक्षिण भारत के राज्य नई दिल्ली से हजारों किलोमीटर दूर स्थित हैं। गरीब और मध्यमवर्गीय मुवक्किलों के लिए दिल्ली तक यात्रा करना, वहां रहना और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकीलों की फीस वहन करना आर्थिक रूप से असंभव हो जाता है। इसके चलते दक्षिण के लोग संविधान के अनुच्छेद 32 (संवैधानिक उपचारों का अधिकार) के तहत अपने मौलिक अधिकारों के संरक्षण से व्यवहारिक तौर पर वंचित रह जाते हैं। न्याय केवल सैद्धांतिक नहीं, बल्कि सुलभ और किफायती होना चाहिए।”
3. मद्रास हाईकोर्ट की 164 साल पुरानी कानूनी विरासत का उल्लेख
चेन्नई को दक्षिण भारत में सुप्रीम कोर्ट की पीठ के लिए सबसे उपयुक्त केंद्र बताते हुए मुख्यमंत्री विजय ने ऐतिहासिक तथ्यों को सामने रखा:
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1862 की चार्टर्ड विरासत: उन्होंने रेखांकित किया कि मद्रास उच्च न्यायालय देश के सबसे पुराने और प्रतिष्ठित चार्टर्ड उच्च न्यायालयों में से एक है, जिसकी स्थापना वर्ष 1862 में हुई थी।
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सक्षम बार और इंफ्रास्ट्रक्चर: चेन्नई का बार काउंसिल अत्यंत सक्षम, प्रतिभाशाली और समृद्ध कानूनी परंपराओं से युक्त है।
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दक्षिण के सभी राज्यों को लाभ: चेन्नई दक्षिण भारत का एक प्रमुख भौगोलिक और लॉजिस्टिक केंद्र है, जिससे तमिलनाडु के अलावा केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और पुडुचेरी के वादकारियों को दिल्ली जाने के मानसिक और आर्थिक तनाव से मुक्ति मिलेगी।
4. संविधान पीठ का 2016 का फैसला और विधि आयोग की सिफारिशें
अपने कानूनी तर्कों को पुख्ता करने के लिए सीएम विजय ने सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक न्यायिक आदेशों का हवाला दिया:
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वी. वसंतकुमार बनाम एच.सी. भाटिया (2016): पत्र में 13 जुलाई 2016 के सुप्रीम कोर्ट के उस महत्वपूर्ण आदेश का जिक्र किया गया, जिसमें कोर्ट ने क्षेत्रीय पीठों और ‘नेशनल कोर्ट ऑफ अपील’ की स्थापना के प्रश्न को तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली 5 सदस्यीय संविधान पीठ के पास विचारार्थ भेजा था।
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संसदीय स्थायी समिति व विधि आयोग: 18वें विधि आयोग (रिपोर्ट संख्या 229) और संसद की कानून व न्याय संबंधी स्थायी समिति ने बार-बार यह सिफारिश की है कि मुकदमों के विशाल ढेर को घटाने और जनता की पहुंच बढ़ाने के लिए देश के चार प्रमुख कोनों—चेन्नई (दक्षिण), मुंबई (पश्चिम), कोलकाता (पूर्व) और दिल्ली (उत्तर)—में सुप्रीम कोर्ट की बेंच या अपीलीय अदालतें स्थापित की जानी चाहिए।
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न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर कोई आंच नहीं: मुख्यमंत्री ने स्पष्ट किया कि क्षेत्रीय पीठों के गठन से न्यायपालिका की स्वतंत्रता रत्ती भर भी प्रभावित नहीं होगी, क्योंकि इन सभी पीठों का प्रशासनिक और न्यायिक नियंत्रण सीधे तौर पर भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के पास ही रहेगा।
तमिल राजनीति और कानूनी सुधारों के लिए बड़ा संदेश
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि ‘तमिझागा वेत्री कझगम’ (TVK) के प्रमुख और मुख्यमंत्री के रूप में थलपति विजय द्वारा उठाया गया यह कदम राज्य के अधिकारों (State Rights), संघीय ढांचे (Federalism) और सामाजिक न्याय की दिशा में एक सोची-समझी पहल है। दक्षिण के राज्यों में यह भावना लंबे समय से रही है कि राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में स्थित केंद्रीय व न्यायिक संस्थाओं तक आम दक्षिण भारतीय की पहुंच कठिन रहती है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को सीधे पत्र लिखकर विजय ने न केवल कानूनी बिरादरी और आम जनता के एक बड़े भावनात्मक मुद्दे को राष्ट्रीय मंच पर उठाया है, बल्कि केंद्र सरकार और न्यायपालिका पर इस ऐतिहासिक मांग पर निर्णय लेने का नैतिक व कानूनी दबाव भी बना दिया है।
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