
आजकल आंख में हल्की सी लालिमा, धूल जाने, खुजली, सूखापन (ड्राई आईज) या लंबे समय तक मोबाइल-लैपटॉप स्क्रीन देखने से होने वाली थकान पर लोग तुरंत नजदीकी मेडिकल स्टोर का रुख करते हैं और बिना किसी नेत्र रोग विशेषज्ञ (ऑप्थल्मोलॉजिस्ट) की सलाह के कोई भी ओवर-द-काउंटर (ओटीसी) आईड्रॉप खरीदकर आंखों में डालने लगते हैं। सार्वजनिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों और देश के शीर्ष आई हॉस्पिटल्स के डॉक्टरों ने इस गैर-जिम्मेदाराना आदत को लेकर गंभीर चेतावनी जारी की है। विशेषज्ञों का कहना है कि केमिस्ट अक्सर बिना जांचे-परखे स्टेरॉयड या एंटीबायोटिक युक्त आईड्रॉप थमा देते हैं, जो फौरी तौर पर आंखों की लाली तो दबा देते हैं लेकिन लंबे समय में आंखों के नाजुक टिश्यूज को हमेशा के लिए क्षतिग्रस्त कर पूर्ण दृष्टिहीनता (अंधापन) का शिकार बना सकते हैं।
स्टेरॉयड युक्त आईड्रॉप्स का अंधाधुंध इस्तेमाल ग्लूकोमा और मोतियाबिंद की मुख्य वजह
आई स्पेशलिस्ट्स के अनुसार, सबसे बड़ा खतरा बिना जरूरत के स्टेरॉयड बेस्ड आईड्रॉप्स (जैसे डेक्सामेथासोन, प्रेडनिसोलोन या बीटामेथासोन युक्त दवाएं) के लगातार इस्तेमाल से पैदा होता है। जब कोई मरीज बिना डॉक्टर की निगरानी के हफ्तों या महीनों तक इन ड्रॉप्स का उपयोग करता है, तो आंख के अंदर का तरल दबाव (इंट्राओक्युलर प्रेशर – IOP) तेजी से बढ़ जाता है। इस स्थिति को ‘स्टेरॉयड-इंड्यूस्ड ग्लूकोमा’ या काला मोतिया कहा जाता है। यह बीमारी ऑप्टिक नर्व को धीरे-धीरे नष्ट कर देती है, जिससे होने वाला नुकसान स्थायी होता है और इसे कभी ठीक नहीं किया जा सकता। इसके अलावा, कम उम्र में ही आंखों की पुतली में धुंधलापन यानी मोतियाबिंद (कैटरेक्ट) विकसित होने का जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।
कॉर्नियल अल्सर और फंगल इन्फेक्शन का बढ़ जाता है जानलेवा जोखिम
आंख में लालिमा केवल एक सामान्य लक्षण है, जिसके पीछे एलर्जी, बैक्टीरियल इन्फेक्शन, फंगल इन्फेक्शन, वायरल कंजंक्टिवाइटिस या कॉर्निया में बारीक खरोंच जैसे अलग-अलग कारण हो सकते हैं। जब मरीज किसी फंगल इन्फेक्शन या कॉर्निया की चोट पर स्टेरॉयड आईड्रॉप डाल लेता है, तो यह दवा आंख की प्राकृतिक रोग प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) को दबा देती है। नतीजतन, सूक्ष्म फंगस या बैक्टीरिया कॉर्निया की गहरी परतों में फैलकर जानलेवा ‘कॉर्नियल अल्सर’ बना देते हैं। ऐसी स्थिति में कॉर्निया पिघलने (मेल्टिंग) लगती है और गंभीर मामलों में आंख को बचाने के लिए इमरजेंसी कॉर्नियल ट्रांसप्लांट (केराटोप्लास्टी) तक की नौबत आ जाती है।
एंटीबायोटिक आईड्रॉप्स के गलत प्रयोग से पैदा हो रहा है ड्रग रेजिस्टेंस
बिना डॉक्टर से पूछे एंटीबायोटिक आईड्रॉप्स (जैसे सिप्रोफ्लोक्सासिन, मोक्सीफ्लोक्सासिन, टोब्रामाइसिन आदि) का मनमाना उपयोग ‘एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस’ (AMR) को बढ़ावा दे रहा है। जब वायरल इन्फेक्शन या केवल धूल-मिट्टी से होने वाली जलन में एंटीबायोटिक ड्रॉप्स डाली जाती हैं, तो वे आंख में मौजूद लाभकारी बैक्टीरिया को मार देती हैं और हानिकारक रोगाणु उस दवा के प्रति प्रतिरोधी बन जाते हैं। भविष्य में जब कभी आंख में कोई गंभीर बैक्टीरियल संक्रमण होता है, तो मानक दवाएं असर करना बंद कर देती हैं, जिससे मामूली सा इन्फेक्शन भी लाइलाज रूप धारण कर लेता है।
डिकंजेस्टेंट ड्रॉप्स से तुरंत राहत का भ्रम और ‘रिबाउंड रेडनेस’ का फंदा
बाजार में मिलने वाली कई ओवर-द-काउंटर आईड्रॉप्स में नेफाजोलिन या फेनिलाइफ्रिन जैसे डिकंजेस्टेंट तत्व होते हैं। ये रसायन आंख की फैली हुई रक्त वाहिकाओं को तुरंत सिकोड़ देते हैं, जिससे आंखें 10 मिनट के भीतर सफेद और साफ दिखने लगती हैं। मरीज इसे दवा का चमत्कार समझकर बार-बार इस्तेमाल करने लगता है। हालांकि, कुछ दिनों बाद जब दवा का असर खत्म होता है, तो नसें पहले से कहीं ज्यादा फैल जाती हैं, जिसे मेडिकल भाषा में ‘रिबाउंड हाइपेरेमिया’ कहा जाता है। मरीज इस चक्र में फंसकर आंख को लगातार केमिकल्स के संपर्क में रखता है, जिससे आंखों की प्राकृतिक नमी पूरी तरह सूख जाती है।
एक महीने से ज्यादा पुरानी खुली आईड्रॉप की शीशी का उपयोग है बेहद घातक
आईड्रॉप्स के इस्तेमाल से जुड़ी एक और आम और खतरनाक लापरवाही है पुरानी रखी हुई शीशी का इस्तेमाल करना। आईड्रॉप्स की सील एक बार टूटने के बाद हवा के संपर्क में आते ही उसमें मौजूद प्रिजर्वेटिव्स का असर 28 से 30 दिनों में खत्म होने लगता है। बहुत से लोग घर में महीनों पहले खुली रखी दवा को दोबारा इस्तेमाल करने लगते हैं। पुरानी शीशी के नोजल पर जमा बैक्टीरिया सीधे आंख में जाकर गंभीर संक्रामक ‘एंडोफ्थाल्माइटिस’ पैदा कर सकते हैं, जिससे कुछ ही घंटों के भीतर आंख की रोशनी जाने का वास्तविक खतरा उत्पन्न हो जाता है।
आंखों की सुरक्षा और सही देखभाल के लिए नेत्र रोग विशेषज्ञों के अनिवार्य दिशा-निर्देश
नेत्र विशेषज्ञों ने आंखों की हिफाजत के लिए आम जनता के लिए कुछ बुनियादी नियम निर्धारित किए हैं:
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स्व-चिकित्सा (Self-Medication) से पूरी तरह बचें: आंख में किसी भी प्रकार की खुजली, लाली, पानी आने या दर्द होने पर केमिस्ट से दवा लेने के बजाय सीधे योग्य नेत्र चिकित्सक (एमबीबीएस/एमएस ऑप्थल्मोलॉजी) को दिखाएं।
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प्रिजर्वेटिव-फ्री लुब्रिकेंट ड्रॉप्स का ही करें चयन: स्क्रीन टाइम अधिक होने या ड्राइनेस की शिकायत पर केवल विशेषज्ञ द्वारा सुझाई गई माइल्ड लुब्रिकेटिंग या आर्टिफिशियल टीयर्स (जैसे कार्बोक्सीमिथाइलसेल्युलोज आधारित ड्रॉप्स) का ही सीमित प्रयोग करें।
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ड्रॉप्स डालने का सही तरीका अपनाएं: शीशी की टिप (नोजल) को कभी भी अपनी उंगलियों या पलकों से न छुएं। शीशी खोलने की तारीख बोतल पर लिख लें और 30 दिन पूरे होते ही बची हुई दवा को फेंक दें।
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घरेलू नुस्खों और अनपेक्षित द्रवों से बचें: आंख में गुलाब जल, शहद, दूध, थूक या अशुद्ध नल का पानी सीधे डालने की भूल कभी न करें, यह कॉर्निया पर सीधा इन्फेक्शन ला सकता है।
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