धनतेरस पर शाम 06:02 बजे से शुरू होगा महालक्ष्मी और धन्वंतरि पूजन का सबसे शुभ मुहूर्त, जानें सही अवधि, प्रदोष काल और यम दीपदान का समय

कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के साथ ही पांच दिवसीय दीपोत्सव महापर्व का विधिवत शुभारंभ हो चुका है, और पूरे देश में धनतेरस यानी धनत्रयोदशी को लेकर अभूतपूर्व उत्साह और उमंग का माहौल बना हुआ है। वैदिक पंचांग और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली, लखनऊ, वाराणसी सहित उत्तर भारत के प्रमुख ज्योतिषीय पंचांगों की सूक्ष्म गणना के अनुसार, इस वर्ष धनतेरस पर देवी महालक्ष्मी, देवताओं के खजांची कुबेर देव और देवों के वैद्य भगवान धन्वंतरि की पूजा-अर्चना के लिए सबसे मंगलकारी समय शाम को ठीक 06:02 बजे से प्रारंभ हो रहा है। धर्मग्रंथों में इस बात का स्पष्ट और अकाट्य निर्देश मिलता है कि धनतेरस की पूजा सदैव स्थिर लग्न और प्रदोष काल के संगम में ही की जानी चाहिए, क्योंकि स्थिर लग्न में की गई आराधना से घर में धन-संपदा का आगमन होकर वह चिरकाल तक टिकती है और चंचला कही जाने वाली लक्ष्मी का स्थायी वास होता है। आज शाम 06:02 बजे से शुरू होने वाला यह पावन मुहूर्त गृहस्थों, व्यापारियों, उद्यमियों और पेशेवर लोगों के लिए विशेष रूप से आर्थिक संकटों को दूर करने, उत्तम आरोग्य प्राप्त करने और व्यवसाय में चौगुनी उन्नति सुनिश्चित करने वाला दिव्य समय साबित होने जा रहा है।

शुभ मुहूर्त की कुल अवधि और स्थिर वृषभ लग्न का अचूक ज्योतिषीय महत्व

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार इस वर्ष धनतेरस पूजन के मुख्य मुहूर्त की कुल अवधि लगभग 1 घंटा 54 मिनट की रहेगी, जो शाम 06:02 बजे से आरंभ होकर रात्रि 07:56 बजे तक प्रभावी रहेगी। इस समयावधि के दौरान आकाश मंडल में स्थिर स्वभाव वाला वृषभ लग्न उदित रहेगा, जिसे सनातन ज्योतिष में भौतिक सुख, विलासिता, ऐश्वर्य और वैभव के अधिपति शुक्र ग्रह का प्रतिनिधित्व माना गया है। शाम को सूर्यास्त के उपरांत बनने वाला प्रदोष काल शाम 05:32 बजे से रात 08:11 बजे तक रहेगा, लेकिन जैसे ही शाम 06:02 बजे वृषभ लग्न का उदय होगा, प्रदोष और स्थिर लग्न का दुर्लभ संयोग निर्मित हो जाएगा। ज्योतिषियों का स्पष्ट मत है कि इस 1 घंटा 54 मिनट की समयावधि में घर, दुकान, प्रतिष्ठान या कारखाने में दीप प्रज्वलित करना, कलश स्थापना करना और भगवान धन्वंतरि के मंत्रों का जाप करना सबसे तीव्र और चिरस्थायी फल प्रदान करता है। जो जातक इस निश्चित समयावधि के भीतर अपने बहीखाते, तिजोरी, सोना, चांदी, पीतल के नए बर्तन और झाड़ू की पूजा संपन्न कर लेंगे, उनके जीवन में वर्षपर्यंत धन के अभाव का सामना नहीं करना पड़ेगा और घर की सुख-शांति में अप्रत्याशित वृद्धि दर्ज की जाएगी।

प्रदोष काल, चौघड़िया मुहूर्त और दिनभर खरीदारी के सबसे उत्तम समय का संपूर्ण ब्योरा

धनतेरस के पावन अवसर पर केवल शाम की पूजा ही नहीं, बल्कि बाजार से शुभ वस्तुओं की खरीदारी करने का समय भी अत्यधिक मायने रखता है। वैदिक पंचांग के अनुसार दिनभर खरीदारी के लिए कई शुभ चौघड़िया मुहूर्त उपलब्ध रहेंगे, जिनमें सुबह से लेकर दोपहर और शाम तक अलग-अलग समय पर लाभ, अमृत और शुभ के चौघड़िया योग बन रहे हैं। सुबह 07:45 बजे से 09:10 बजे तक ‘शुभ’ का चौघड़िया रहेगा, जो सोना, चांदी और आभूषणों की खरीदारी के लिए सबसे सटीक माना गया है। इसके बाद दोपहर 12:05 बजे से 01:30 बजे तक ‘चर’ और दोपहर 01:30 बजे से 02:55 बजे तक ‘लाभ’ का चौघड़िया रहेगा, जिसमें वाहन, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, गृह उपयोगी मशीनें और भूमि-भवन के सौदे करना अत्यंत लाभकारी सिद्ध होगा। दोपहर 02:55 बजे से शाम 04:20 बजे तक ‘अमृत’ चौघड़िया रहेगा, जो पीतल, तांबे के बर्तन, धनिया के बीज और धार्मिक पूजन सामग्री खरीदने के लिए सर्वोत्तम है। इसके पश्चात शाम को 06:02 बजे से प्रदोष काल का मुख्य पूजन मुहूर्त प्रारंभ हो जाएगा, इसलिए यदि किसी कारणवश आप दिन के समय खरीदारी न कर सकें, तो शाम के इस पावन मुहूर्त में की गई खरीदारी भी अक्षय पुण्य प्रदान करेगी।

भगवान धन्वंतरि और मां लक्ष्मी की चरणबद्ध एवं सरल पूजा विधि

शाम को ठीक 06:02 बजे पूजा प्रारंभ करने से पहले घर के ईशान कोण यानी उत्तर-पूर्व दिशा अथवा उत्तर दिशा में पूजा स्थल को गंगाजल छिड़क कर भलीभांति पवित्र कर लें। एक लकड़ी की चौकी स्थापित करें और उस पर लाल या पीले रंग का नया सूती अथवा रेशमी वस्त्र बिछाएं। चौकी के मध्य में तांबे या पीतल के कलश में शुद्ध जल, गंगाजल, सुपारी, सिक्का और आम के पत्ते डालकर उस पर नारियल स्थापित करें। चौकी पर भगवान गणेश, माता लक्ष्मी, कुबेर देव और अमृत कलशधारी भगवान धन्वंतरि की प्रतिमा या चित्र को स्थापित करें। सबसे पहले भगवान गणेश का ध्यान करते हुए उन्हें रोली, अक्षत, दूर्वा और मोदक अर्पित करें, ताकि अनुष्ठान निर्विघ्न संपन्न हो। इसके पश्चात भगवान धन्वंतरि को पीले चंदन का तिलक लगाएं, पीले पुष्प की माला पहनाएं और तुलसी दल तथा औषधियां अर्पित करें, क्योंकि धन्वंतरि जी आरोग्य के देवता हैं। फिर माता महालक्ष्मी और कुबेर जी को कमल का पुष्प, कमलगट्टा, अक्षत, धूप, दीप और इत्र अर्पित करें तथा धनतेरस पर खरीदे गए नए पीतल के बर्तन में खीर, बताशे या मौसमी फल भरकर नैवेद्य के रूप में भोग लगाएं और घर की तिजोरी की चाबी भी पूजा में समर्पित करें।

यमराज के निमित्त दीपदान का सही समय, दिशा और प्राण रक्षा से जुड़ा पौराणिक विधान

धनतेरस की शाम को मुख्य लक्ष्मी-धन्वंतरि पूजन के समापन के उपरांत यम दीपदान करने का विधान सनातन धर्म में अत्यंत अनिवार्य माना गया है, जिसे परिवार के सदस्यों को अकाल मृत्यु और गंभीर असाध्य रोगों के भय से मुक्ति दिलाने वाला माना जाता है। यम दीपदान का सबसे उपयुक्त समय रात्रि 07:15 बजे से 08:30 बजे के मध्य रहेगा, जब घर के सभी सदस्य भोजन कर चुके हों या मुख्य पूजा समाप्त हो चुकी हो। इसके लिए गेहूं के आटे अथवा साफ मिट्टी से बना एक बड़ा चौमुखा दीपक तैयार करें, जिसमें चार लंबी रुई की बत्तियां चारों दिशाओं की ओर रखी जाएं और उसमें शुद्ध तिल अथवा सरसों का तेल भरपूर मात्रा में भरा जाए। इस दीपक को घर के पूजा घर में रोली, चावल और खील से पूजने के बाद, घर का कोई भी वरिष्ठ सदस्य इसे हाथ में लेकर मुख्य द्वार के बाहर ले जाए। मुख्य प्रवेश द्वार के बाहर दक्षिण दिशा की ओर मुंह करके, जमीन पर एक मुट्ठी गेहूं या खील की ढेरी बनाकर उस पर यह चौमुखा दीपक स्थापित कर दें। दीपक जलाते समय ‘मृत्युना पाशदण्डाभ्यां कालेन श्यामया सह, त्रयोदश्यां दीपदानात् सूर्यजः प्रीयतां मम’ मंत्र का उच्चारण करते हुए हाथ जोड़कर परिवार के कल्याण और दीर्घायु की प्रार्थना करें, और दीपक रखकर बिना पीछे मुड़े सीधे घर में प्रवेश कर जाएं।

धनतेरस पूजा में इन गलतियों से बचें ताकि वर्षभर बनी रहे मां लक्ष्मी की अटूट कृपा

मुहूर्त की दिव्यता का पूरा लाभ उठाने के लिए यह बेहद आवश्यक है कि पूजा और दिनचर्या के दौरान शास्त्रों में वर्जित आचरणों से पूरी तरह बचा जाए। धनतेरस के पावन दिन घर के भीतर किसी भी प्रकार का कलह, वाद-विवाद या कटु वचनों का प्रयोग बिल्कुल न करें, क्योंकि अशांत वातावरण से देवी लक्ष्मी तत्काल रुष्ट होकर प्रस्थान कर जाती हैं। पूजा स्थल पर कभी भी काले या गहरे नीले रंग के वस्त्र पहनकर न बैठें; हमेशा लाल, पीले, गुलाबी या नारंगी जैसे शुभ और मांगलिक रंगों के वस्त्र ही धारण करें। बाजार से जो भी नया बर्तन आप खरीदकर लाएं, उसे कभी भी खाली घर के अंदर न लाएं; उसमें थोड़े से बताशे, चावल या फल अवश्य डाल लें। इसके अलावा घर के मुख्य द्वार पर जूते-चप्पल या कूड़ा-कचरा कतई जमा न होने दें और शाम के समय पूरे घर में रोशनी रखें ताकि किसी भी कोने में अंधकार न रहे। शाम 06:02 बजे से शुरू होने वाले इस पावन 1 घंटा 54 मिनट के मुहूर्त में पूरी श्रद्धा, निष्ठा और पवित्र अंतःकरण के साथ किया गया यह पूजन आपके संपूर्ण परिवार के जीवन में आरोग्य, ऐश्वर्य और सुख-शांति की अमृत वर्षा करेगा।

Check Also

कल का राशिफल 7 नवंबर: शनिवार को चमकेंगे इन 5 राशियों के सितारे, शनिदेव की कृपा से दूर होंगे सारे कष्ट

कार्तिक मास के पावन कृष्ण पक्ष के शनिवार यानी 7 नवंबर को आकाश मंडल में …