‘मैं वापस आऊंगा’ का वो सीन जिसे समझने में चूक गए दर्शक, जानिए नसीरुद्दीन शाह के ‘चांद’ और ‘मार्शियंस’ का गहरा इम्तियाज अली कनेक्शन

नई दिल्ली/सिनेमा डेस्क: इम्तियाज अली के निर्देशन में बनी फिल्म ‘मैं वापस आऊंगा’ सिनेमाघरों में धूम मचा रही है. महज 70 करोड़ रुपये के बजट में बनी यह फिल्म अपनी रिलीज के दो हफ्तों के भीतर ही 60 करोड़ से ज्यादा का कलेक्शन कर बॉक्स ऑफिस पर सुपरहिट साबित हो चुकी है. विभाजन की त्रासदी और मानवीय भावनाओं को समेटे इस फिल्म की क्रिटिक्स और दर्शक जमकर तारीफ कर रहे हैं.

इम्तियाज अली की फिल्मों की यह खासियत रही है कि वे अपनी कहानियों में कई गहरे सिम्बॉलिज्म (प्रतीकवाद) और छिपे हुए अर्थ छोड़ देते हैं. ‘मैं वापस आऊंगा’ में भी अभिनेता नसीरुद्दीन शाह (कीनू) और दिलजीत दोसांझ (निर्वैर) के बीच कुछ ऐसे ही सीन्स थे, जो थिएटर में देखने में तो फनी या बड़बड़ाहट जैसे लगे, लेकिन उनका असल मतलब बेहद भावुक और गहरा था. आइए, उन सीन्स को डिकोड करते हैं:

1. ‘चांद पर मैच है… तुम गए हो कभी चांद पर?’

फिल्म के एक दृश्य में जब नसीरुद्दीन शाह का किरदार कीनू अपने पोते (दिलजीत दोसांझ) से अचानक कहता है, “चांद पर मैच है, तुम गए हो कभी चांद पर?” तो इस पर दर्शक हंस पड़ते हैं. अधिकांश लोगों को लगा कि उम्र के इस पड़ाव पर कीनू का किरदार ‘डिमेंशिया’ (भूलने की बीमारी) के कारण मानसिक संतुलन खो चुका है और कुछ भी बेतुकी बातें कर रहा है.

क्या है इसका असल मतलब?

नसीरुद्दीन शाह का किरदार डिमेंशिया के कारण नहीं, बल्कि अतीत की खूबसूरत यादों के कारण ऐसा बोल रहा होता है. यहाँ ‘चांद’ का मतलब विभाजन से पहले का वह खुशहाल और खूबसूरत पाकिस्तान (सरगोधा) है, जहां कीनू का बचपन बीता था. वहीं ‘मैच’ शब्द उस दौर में बिना किसी भेदभाव के सभी कौमों और मजहबों के बीच सौहार्द, हंसी-खुशी और मिलजुल कर रहने के ताने-बाने का प्रतीक है. वह अपने पोते से असल में यह पूछ रहा होता है कि क्या उसने कभी नफरत से दूर वह खुशहाल दुनिया देखी है.

2. दंगाइयों को बार-बार ‘मार्शियंस’ (मंगल ग्रह के लोग) कहना

पूरी फिल्म में कीनू का किरदार बंटवारे के समय के दंगाइयों और नफरत फैलाने वाले लोगों को ‘मार्शियंस’ यानी मंगल ग्रह के लोग कहकर बुलाता है. इसे भी दर्शकों ने उनकी बीमारी का ही एक हिस्सा समझा.

क्या है इसके पीछे की कहानी?

फिल्म 1947 और वर्तमान समय के बैकड्रॉप को एक साथ दिखाती है. कीनू जब छोटा था, तब उसने अपनी आंखों के सामने अपने उन पड़ोसियों और अपनों को हैवान बनते देखा, जिनके साथ वह पला-बड़ा था. नफरत की आग में जलते इंसानों को देखकर उस मासूम बच्चे का दिमाग यह स्वीकार ही नहीं कर पाया कि हाड़-मांस का बना एक साधारण इंसान इतना निर्दयी और कातिल कैसे हो सकता है.

उस डरावने सच से बचने के लिए उसके सबकॉन्शियस माइंड (अचेतन मन) ने यह धारणा बना ली कि इंसानों की जान लेने वाले ये क्रूर लोग इस धरती के हो ही नहीं सकते, ये तो किसी और ग्रह (जैसे मंगल ग्रह) से आए अनोखे और अजीब जीव हैं. बुढ़ापे और मृत्युशैया (डेथबेड) पर भी वह इसी शब्द को एक ढाल की तरह इस्तेमाल करता है ताकि उस खौफनाक याद से बच सके.

गिल्ट और अधूरी मोहब्बत की दास्तान है फिल्म

‘मैं वापस आऊंगा’ की मुख्य कहानी मृत्युशैया पर पड़े एक बुजुर्ग के इसी ‘गिल्ट’ (पछतावे) के इर्द-गिर्द घूमती है, जो उसे चैन से मरने नहीं दे रहा. वह 1947 में अपनी प्रेमिका (जिया) को दंगों के बीच पाकिस्तान में ही अकेला छोड़ आया था. जिंदगी की आखिरी सांसें गिनते हुए वह बस एक बार अपनी जिया को देखना चाहता है और उससे माफी मांगना चाहता है.

इम्तियाज अली ने इस फिल्म के जरिए बेहद खूबसूरती से यह दिखाया है कि इंसान का शरीर भले ही बूढ़ा हो जाए, लेकिन अतीत के घाव और सबकॉन्शियस माइंड में दबे खौफ और यादें कभी बूढ़ी नहीं होतीं.

Check Also

Dahan Raakan Ka Rahasya OTT: 9 एपिसोड की इस रोंगटे खड़े करने वाली वेब सीरीज…

डिजिटल स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म्स पर क्राइम, मर्डर मिस्ट्री और रोमांस से जुड़ी ढेरों वेब सीरीज मौजूद …