चौथी संतान के जन्म पर नहीं मिलेगा मातृत्व अवकाश, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने खारिज की याचिका

प्रयागराज (राज्य ब्यूरो)। उत्तर प्रदेश की सरकारी नौकरियों में कार्यरत महिला कर्मचारियों के मातृत्व अवकाश (Maternity Leave) के अधिकारों को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने एक अत्यंत महत्वपूर्ण और दूरगामी फैसला सुनाया है। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट शब्दों में व्यवस्था दी है कि राज्य सरकार की सेवा में तैनात महिला कर्मचारी अपनी चौथी संतान के जन्म पर सवेतन मातृत्व अवकाश का दावा कानूनी अधिकार के रूप में नहीं कर सकती हैं। अदालत ने कहा कि राज्य की वित्तीय हस्तपुस्तिका (Financial Handbook) के नियमों के तहत मातृत्व अवकाश का लाभ केवल पहली दो जीवित संतानों (Two Surviving Children) के जन्म तक ही सीमित है। न्यायमूर्ति द्वारा दिए गए इस फैसले ने उत्तर प्रदेश में दो बच्चों की नीति और राज्य सेवा नियमावली की वैधानिकता पर पुनः मुहर लगा दी है। इस फैसले के बाद प्रदेश की लाखों महिला कर्मचारियों, विशेष रूप से बेसिक शिक्षा परिषद की शिक्षिकाओं, स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं, पुलिस बल और प्रशासनिक विभागों में कार्यरत महिला कर्मियों के लिए छुट्टियों के नियम पूरी तरह स्पष्ट हो गए हैं। आइए एक रिपोर्टर के नजरिए से जानते हैं कि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस याचिका पर क्या-क्या कानूनी दलीलें दीं, वित्तीय हस्तपुस्तिका का नियम 153 क्या कहता है और इस निर्णय का महिला कर्मचारियों की सेवा शर्तों पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की पीठ का सख्त फैसला और याचिका की कानूनी पृष्ठभूमि

इलाहाबाद हाईकोर्ट में यह मामला एक महिला कर्मचारी द्वारा दायर की गई विशेष याचिका के जरिए सामने आया था, जिसमें उन्होंने अपनी चौथी संतान के जन्म के समय 180 दिनों के सवेतन मातृत्व अवकाश का आवेदन किया था। संबंधित विभाग द्वारा दो से अधिक जीवित बच्चों का हवाला देकर आवेदन निरस्त कर दिए जाने के बाद महिला ने उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। याची का तर्क था कि केंद्र सरकार के ‘मातृत्व लाभ अधिनियम 1961’ (Maternity Benefit Act, 1961) के तहत महिला कर्मचारियों को मातृत्व सुरक्षा और स्वास्थ्य संबंधी लाभ प्रदान करना एक सामाजिक कल्याणकारी कदम है और इसमें बच्चों की संख्या के आधार पर भेदभाव नहीं किया जाना चाहिए। हालांकि, राज्य सरकार की ओर से खड़े हुए अपर मुख्य स्थायी अधिवक्ता ने कोर्ट के समक्ष दलील दी कि उत्तर प्रदेश सरकार की सेवा नियमावली में वित्तीय हस्तपुस्तिका खंड दो, भाग 2 से 4 के नियम 153 के तहत सवेतन मातृत्व अवकाश केवल दो जीवित बच्चों तक ही सीमित है। उच्च न्यायालय ने दोनों पक्षों की विस्तृत बहस और वैधानिक प्रावधानों का गहनता से अवलोकन करने के बाद याचिकाकर्ता की अर्जी को पूरी तरह से खारिज कर दिया और राज्य सरकार के निर्णय को कानूनन सही ठहराया।

वित्तीय हस्तपुस्तिका (Financial Handbook) के नियम 153 और दो बच्चों की नीति

उत्तर प्रदेश राज्य की सेवा नियमावली में कर्मचारियों के छुट्टी संबंधी नियमों को संचालित करने के लिए ‘वित्तीय हस्तपुस्तिका’ का निर्माण किया गया है। इसके नियम 153 में महिला कर्मचारियों को मातृत्व अवकाश देने का स्पष्ट प्रावधान है। नियम 153 के अनुसार, एक महिला सरकारी सेवक को उसके पूरे सेवाकाल के दौरान पहली दो जीवित संतानों के जन्म पर 180 दिनों का पूर्ण सवेतन मातृत्व अवकाश दिए जाने का प्रावधान है। यदि किसी महिला कर्मचारी की पहले से दो जीवित संतानें हैं और वह तीसरी या चौथी संतान को जन्म देती है, तो उसे 180 दिनों के विशेष मातृत्व अवकाश का लाभ नहीं मिलेगा। अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि राज्य सरकार द्वारा लागू किया गया यह प्रतिबंध एक सोची-समझी नीतिगत योजना का हिस्सा है, जिसका मुख्य उद्देश्य जनसंख्या नियंत्रण को प्रोत्साहन देना और राज्य के खजाने पर पड़ने वाले वित्तीय बोझ को संतुलित करना है। कोर्ट ने कहा कि जब नियम स्वयं दो जीवित बच्चों तक मातृत्व अवकाश को सीमित करते हैं, तो अदालतें अपनी ओर से नियमावली में कोई नई व्यवस्था या ढील नहीं जोड़ सकती हैं।

मातृत्व लाभ अधिनियम 1961 और राज्य के सेवा नियमों के बीच अंतर

अदालत में सुनवाई के दौरान केंद्रीय अधिनियम ‘मातृत्व लाभ अधिनियम 1961’ और राज्य के स्थानीय नियमों के टकराव का मुद्दा भी उठा। याची का कहना था कि केंद्रीय कानून राज्य के नियमों से ऊपर होना चाहिए। इस पर उच्च न्यायालय ने विधिक स्थिति स्पष्ट करते हुए कहा कि राज्य सरकार के कर्मचारियों पर राज्य द्वारा निर्मित सेवा नियमावली (Fundamental Rules) ही सीधे तौर पर प्रभावी होती है। यद्यपि केंद्रीय अधिनियम मातृत्व सुरक्षा का एक ढांचा प्रदान करता है, लेकिन राज्य सरकार को अपने कर्मचारियों की सेवा शर्तों, अवकाश नीतियों और वित्तीय भत्तों को विनियमित करने का पूरा संवैधानिक अधिकार है। अदालत ने कहा कि राज्य सरकार का नियम 153 संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन नहीं करता है, क्योंकि दो बच्चों तक ही मातृत्व लाभ को सीमित रखना एक युक्तियुक्त वर्गीकरण (Reasonable Classification) है जो जनहित और नीतिगत उद्देश्यों के अनुकूल है।

महिला सरकारी कर्मचारियों और शिक्षिकाओं पर इस फैसले का दूरगामी प्रभाव

उत्तर प्रदेश में बेसिक शिक्षा परिषद के अंतर्गत कार्यरत प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों की लाखों महिला शिक्षिकाओं के साथ-साथ विभिन्न सरकारी विभागों की महिला कर्मियों के लिए यह आदेश अत्यंत महत्वपूर्ण माना जा रहा है। अक्सर बेसिक शिक्षा विभाग और अन्य विभागों में छुट्टियों की स्वीकृति को लेकर बेसिक शिक्षा अधिकारियों (BSA) और विभागाध्यक्षों के स्तर पर विवाद की स्थिति बनी रहती थी। कई बार तीसरी या चौथी संतान के जन्म पर मातृत्व अवकाश की अर्जी खारिज होने के बाद महिला कर्मचारी अदालतों का रुख करती थीं। इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले के बाद अब सभी संशय समाप्त हो गए हैं। यदि किसी महिला कर्मचारी की पहले से दो या दो से अधिक जीवित संतानें हैं और वह पुनः मां बनती है, तो उसे सवेतन मातृत्व अवकाश (Paid Maternity Leave) नहीं मिलेगा। ऐसी स्थिति में महिला कर्मचारी अपनी अर्जित छुट्टी (Earned Leave), अर्ध-वेतन छुट्टी (Half Pay Leave) या असाधारण अवकाश (Extraordinary Leave) का उपयोग करने के लिए स्वतंत्र होगी, लेकिन वह मातृत्व अवकाश के विशेष 180 दिनों के वेतन और भत्तों का दावा नहीं कर सकेगी।

जनसंख्या नियंत्रण, नीतिगत नियम और अदालती टिप्पणियां

उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में यह भी संकेत दिया कि राज्य सरकार द्वारा बनाए गए सेवा नियम समाज में जिम्मेदारी और जनसंख्या नियंत्रण के संदेश को बढ़ावा देते हैं। अदालत ने कहा कि सरकारी कर्मचारियों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे राज्य की नीतिगत योजनाओं और कानूनों का निष्ठापूर्वक पालन करें। जब राज्य सरकार ने दो बच्चों के मानदंड को प्रोत्साहन देने के लिए अपने सेवा नियमों में संशोधन किया है, तो कर्मचारियों को उन सीमाओं का सम्मान करना होगा। न्यायपीठ ने कहा कि मातृत्व अवकाश एक वैधानिक अधिकार (Statutory Right) है, जो कानून और नियमों द्वारा तय की गई शर्तों पर ही निर्भर करता है। यदि नियम स्वयं दो बच्चों के बाद मातृत्व अवकाश देने से मना करते हैं, तो कोई भी कर्मचारी इसे अपने मौलिक अधिकार (Fundamental Right) के रूप में नहीं मांग सकता। अदालत के इस सख्त रुख से यह साफ हो गया है कि भविष्य में भी इस प्रकार की याचिकाओं पर कोई ढील मिलने की संभावना बेहद कम है।

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