ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्लाह अली खामेनेई के अंतिम संस्कार की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही है, वैसे-वैसे तेहरान से लेकर बगदाद तक सुरक्षा एजेंसियां बेहद सतर्क हो गई हैं। खामेनेई का पार्थिव शरीर बीते फरवरी महीने से ही कोल्ड स्टोरेज में रखा हुआ है और आगामी 9 जुलाई को उन्हें सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा। उनके जनाजे और अंतिम संस्कार को लेकर ईरान और इराक में 5 दिनों तक कई बड़ी धार्मिक रस्में निभाई जाएंगी। हालांकि, इस ऐतिहासिक और संवेदनशील मौके पर ईरानी प्रशासन को एक गहरा खौफ सता रहा है कि खामेनेई की अंतिम विदाई में कहीं वैसी ही जानलेवा भगदड़ न मच जाए, जैसी पहले के बड़े नेताओं के जनाजे में मची थी।
5 दिनों तक चलेंगी रस्में, जानें कहां दफनाए जाएंगे खामेनेई?
‘ईरान इंटरनेशनल’ की एक खास रिपोर्ट के अनुसार, राजधानी तेहरान में अंतिम यात्रा की शुरुआत होने से पहले खामेनेई के शव को 3 दिनों तक तेहरान के मोसल्ला नमाज परिसर में आम जनता के अंतिम दर्शन के लिए रखा जाएगा। इसके बाद उनके पार्थिव शरीर को इराक स्थित शिया समुदाय के सबसे पवित्र शहरों नजफ और कर्बला ले जाया जाएगा।
इराक में रस्में पूरी होने के बाद शव को वापस ईरान के कोम शहर लाया जाएगा और फिर अंतिम संस्कार के लिए खामेनेई के जन्मस्थान मशहद ले जाया जाएगा। उन्हें शिया इस्लाम के आठवें इमाम, इमाम रजा की विश्व प्रसिद्ध दरगाह में सुपुर्द-ए-खाक किया जाएगा। हालांकि, आधिकारिक तौर पर अभी यह साफ नहीं किया गया है कि जनाजे की मुख्य नमाज कौन पढ़ाएगा, लेकिन कयास लगाए जा रहे हैं कि खामेनेई के बेटे मोजतबा खामेनेई यह जिम्मेदारी निभा सकते हैं।
सुरक्षा के अभूतपूर्व इंतजाम: आसमान से रखी जाएगी पैनी नजर
लाखों की संभावित भीड़ को नियंत्रित करना और दो अलग-अलग देशों के कई शहरों के बीच राजकीय ताबूत को सुरक्षित ले जाना ईरान के इतिहास के सबसे बड़े सुरक्षा ऑपरेशनों में से एक है। रजावी खुरासान प्रांत के गवर्नर घोलमहुसैन मोजफ्फरी ने जानकारी दी है कि भीड़ प्रबंधन और ताबूत की सुरक्षित आवाजाही के लिए पूरी अंतिम यात्रा के दौरान सेना के हेलीकॉप्टरों की तैनाती की जा रही है। इस अंतरराष्ट्रीय स्तर की अंतिम यात्रा के सुरक्षा इंतजामों को लेकर इराक के अधिकारियों के साथ सीधे समन्वय स्थापित करने के लिए ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने खुद बगदाद का दौरा किया है।
क्यों कांप रहा है ईरान? इतिहास के ये दो खौफनाक हादसे हैं वजह
ईरान की इस कड़ी सुरक्षा और घबराहट के पीछे इतिहास के दो ऐसे बड़े हादसे हैं, जिन्होंने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया था:
1. खुमैनी के जनाजे में मची ऐतिहासिक अफरातफरी (1989): 3 जून 1989 को इस्लामी गणराज्य के संस्थापक अयातुल्लाह रूहुल्लाह खुमैनी के निधन के बाद करीब 1 करोड़ लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी थी। अंतिम संस्कार के दौरान बेकाबू भीड़ ताबूत को छूने के लिए टूट पड़ी, जिससे सुरक्षा घेरा पूरी तरह टूट गया। भीड़ ने ताबूत को क्षतिग्रस्त कर दिया और कफन तक फाड़ दिया। हालात इतने खराब हो गए कि शव को हेलीकॉप्टर से वापस ले जाना पड़ा और अंतिम संस्कार टालना पड़ा।
2. कासिम सुलेमानी के जनाजे में मौत का तांडव (2020): अमेरिकी ड्रोन हमले में मारे गए कुद्स फोर्स के कमांडर जनरल कासिम सुलेमानी के जनाजे के वक्त भी उनके गृह नगर करमान में भीषण भगदड़ मच गई थी। भारी भीड़ और बैरिकेड्स टूटने की वजह से मची इस भगदड़ में कम से कम 56 लोगों की कुचलकर मौत हो गई थी और 200 से अधिक लोग गंभीर रूप से घायल हो गए थे।
बिना केमिकल लेप के 4 महीने से कैसे सुरक्षित है शव?
खामेनेई के अंतिम संस्कार में हुई महीनों की देरी ने पूरी दुनिया के विशेषज्ञों को हैरान किया है कि आखिर उनके पार्थिव शरीर को इतने लंबे समय तक कैसे सुरक्षित रखा गया, जबकि इस्लाम में मौत के तुरंत बाद शव दफनाने की परंपरा है और केमिकल लेप (एम्बामिंग) लगाने की सख्त मनाही है।
काउंटर-टेररिज्म एक्सपर्ट डॉ. मोहम्मद उमर के मुताबिक, युद्ध जैसे क्षेत्रीय हालात और गंभीर सुरक्षा चिंताओं के कारण इस अंतिम संस्कार में 4 महीने की देरी हुई। उन्होंने स्पष्ट किया कि शव को किसी भी प्रकार का केमिकल लगाने के बजाय अत्याधुनिक रेफ्रिजरेटेड कोल्ड स्टोरेज (फ्रीजर) में सुरक्षित रखा गया है। शिया इस्लामिक कानून असाधारण परिस्थितियों में देरी से दफनाने और शव को कोल्ड स्टोरेज में रखने की इजाजत देता है। ईरान की हाई-टेक फोरेंसिक मोर्चरी में धार्मिक और कानूनी मानकों के तहत शवों को महीनों तक सुरक्षित रखना तकनीकी रूप से बेहद आसान है।
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