
सनातन परंपरा में कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अमावस्या तिथि का स्थान सर्वोपरि है। इस पावन निशा को ‘कालरात्रि’ और ‘सुखरात्रि’ की संज्ञा दी गई है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, समुद्र मंथन के दौरान इसी पावन तिथि पर क्षीरसागर से धन, ऐश्वर्य, सौभाग्य और कीर्ति की अधिष्ठात्री देवी मां महालक्ष्मी का प्राकट्य हुआ था। इसके साथ ही 14 वर्षों के वनवास के बाद मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण के साथ अयोध्या आगमन पर समस्त नगरवासियों ने घी के दीपक जलाकर उनका स्वागत किया था। दिवाली की शाम को धन-धान्य की देवी मां लक्ष्मी, रिद्धि-सिद्धि के दाता भगवान श्री गणेश और धन के कोषाध्यक्ष कुबेर देव की संयुक्त आराधना करने से दरिद्रता का नाश होता है और घर में वर्षभर सुख-समृद्धि का वास बना रहता है। पूजा में सही मुहूर्त का चयन, शुद्ध मंत्रोच्चार और दीप प्रज्वलन का शास्त्रोक्त क्रम साधना को कई गुना अधिक फलदायी बना देता है।
दिवाली लक्ष्मी पूजा का शुभ मुहूर्त: प्रदोष काल, वृषभ लग्न और निशीथ काल का समय
शास्त्रों के अनुसार, गृहस्थ जीवन जीने वाले साधकों और परिवारजनों के लिए मां लक्ष्मी की पूजा ‘प्रदोष काल’ और ‘स्थिर लग्न’ में करना सर्वोत्तम माना गया है। स्थिर लग्न (जैसे वृषभ लग्न) में पूजा करने से घर में लक्ष्मी स्थिर रूप से निवास करती हैं, यानी धन का व्यर्थ अपव्यय नहीं होता। वहीं व्यापारी वर्ग और तंत्र-मंत्र के साधकों के लिए ‘निशीथ काल’ (महानिशीथ काल) व सिंह लग्न में पूजन का विशेष महत्व होता है।
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प्रदोष काल मुहूर्त (गृहस्थों के लिए सर्वोत्तम): शाम 05:32 बजे से रात 08:12 बजे तक
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वृषभ लग्न (स्थिर लग्न): शाम 06:15 बजे से रात 08:11 बजे तक
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महानिशीथ काल (व्यापारी व तांत्रिक अनुष्ठान): रात 11:38 बजे से देर रात 12:30 बजे तक
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सिंह लग्न (स्थिर लग्न – मध्यरात्रि): रात 12:44 बजे से देर रात 03:01 बजे तक
गृहस्थों को चाहिए कि वे शाम के समय प्रदोष काल और वृषभ लग्न के संधिकाल में अपना मुख्य पूजन संपन्न कर लें, ताकि स्थिर लग्न का पूर्ण फल परिवार की आर्थिक उन्नति में सहायक बने।
मां लक्ष्मी और गणेश जी की संपूर्ण वैदिक पूजन विधि
दिवाली पूजन की शुरुआत सदैव पवित्र मन और शुद्ध वातावरण से होती है। पूजा आरंभ करने से पहले घर के ईशान कोण (उत्तर-पूर्व) या उत्तर दिशा में एक लकड़ी की चौकी स्थापित करें और उस पर लाल या पीला नया वस्त्र बिछाएं।
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आसन और मूर्ति स्थापना: चौकी पर दाईं ओर मां लक्ष्मी और बाईं ओर भगवान श्री गणेश की प्रतिमा स्थापित करें। पास में ही धन कुबेर का यंत्र या चित्र और माता सरस्वती की छोटी प्रतिमा रखें। एक कलश में जल भरकर, उसमें सुपारी, सिक्का और आम के पत्ते लगाकर उसके मुख पर लाल कपड़े में लपेटा हुआ नारियल (श्रीफल) स्थापित करें।
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शुद्धिकरण और संकल्प: स्वयं पर और पूजन सामग्री पर गंगाजल छिड़कते हुए पवित्रीकरण करें। इसके बाद हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर अपना नाम, गोत्र और निवास स्थान का स्मरण करते हुए मां लक्ष्मी की प्रसन्नता के लिए संकल्प लें।
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गणपति पूजन: सबसे पहले ‘प्रथम पूज्य’ भगवान गणेश को रोली-चंदन का तिलक लगाएं, जनेऊ, दूर्वा, मोदक और लाल पुष्प अर्पित करें।
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षोडशोपचार महालक्ष्मी पूजन: मां लक्ष्मी को पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद, गंगाजल) से स्नान कराएं या जल के छींटे देकर मानसिक स्नान कराएं। तत्पश्चात माता को लाल चुनरी, सिंदूर, इत्र, कमल का पुष्प, गुलाब की माला, अक्षत और आभूषण अर्पित करें।
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अन्नकूट, खील-खिलौने और मिष्ठान: नैवेद्य के रूप में मां लक्ष्मी को खील, बताशे, शक्कर के खिलौने, सिंघाड़ा, अनार, सीताफल और सफेद रंग की मिठाई (दूध के पेड़े या खीर) अर्पित करें। भोग के ऊपर तुलसी दल न रखें, क्योंकि मां लक्ष्मी को तुलसी अर्पित करने का निषेध है (तुलसी केवल विष्णु जी के भोग में रखी जाती है)।
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आरती और क्षमा प्रार्थना: अंत में कर्पूर जलाकर मां लक्ष्मी और गणेश जी की आरती गाएं और जाने-अनजाने हुई भूलों के लिए क्षमा याचना करें।
मां लक्ष्मी के सिद्ध और चमत्कारी मंत्र
पूजा के समय एकाग्रचित्त होकर कमलगट्टे या स्फटिक की माला से इन मंत्रों का जप करना अत्यंत कल्याणकारी माना गया है:
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महालक्ष्मी मूल बीज मंत्र:
ॐ श्रीं ह्रीं श्रीं कमले कमलालये प्रसीद प्रसीद श्रीं ह्रीं श्रीं ॐ महालक्ष्म्यै नमः॥
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सरल लक्ष्मी प्रार्थना मंत्र:
ॐ महालक्ष्म्यै च विद्महे विष्णुपत्नी च धीमहि तन्नो लक्ष्मीः प्रचोदयात्॥
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कुबेर धन प्राप्ति मंत्र:
ॐ यक्षाय कुबेराय वैश्रवणाय धनधान्याधिपतये धनधान्यसमृद्धिं मे देहि दापय स्वाहा॥
दीप जलाने का सही तरीका और 26 दीयों का पारंपरिक क्रम
दिवाली पर दीप प्रज्वलन केवल रोशनी का साधन नहीं, बल्कि अंधकार पर प्रकाश और अज्ञान पर ज्ञान की विजय का प्रतीक है। शास्त्रों में दीपदान का एक निश्चित क्रम और संख्या निर्धारित की गई है। अधिकांश घरों में परंपरा के अनुसार कम से कम 21 या 26 मिट्टी के दीये अवश्य जलाए जाने चाहिए।
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पहला और सबसे बड़ा चौमुखा दीपक (यम व पितृ दीप): एक बड़ा मिट्टी या पीतल का चौमुखा दीपक तैयार करें, जिसमें सरसों का तेल या तिल का तेल भरें और चार बत्तियां लगाएं। इसे पूजा के बाद घर के मुख्य द्वार के दाहिनी ओर या दक्षिण दिशा की ओर मुख करके रखें।
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अखंड घी का दीपक: पूजा की चौकी पर मां लक्ष्मी के सामने शुद्ध गाय के देसी घी का एक बड़ा दीपक जलाएं, जो पूरी रात प्रज्वलित रहना चाहिए।
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धन कुबेर और तुलसी का दीपक: एक दीपक घर की तिजोरी या धन स्थान पर और एक दीपक तुलसी के पौधे के पास रखें।
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रसोई और जल स्थान का दीपक: एक दीपक रसोईघर में पीने के पानी के मटके के पास रखें (यह पितरों और अन्नपूर्णा का स्थान माना जाता है)।
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चौखट और खिड़कियां: बाकी छोटे दीपकों (जिनमें सरसों का तेल भरा हो) को दो-दो के जोड़े में घर के मुख्य प्रवेश द्वार, बालकनी, खिड़कियों, छत की मुंडेर और पूजा घर के कोनों में पंक्तिबद्ध रूप से रखें।
दीप जलाते समय ध्यान रखें कि सभी दीपक मिट्टी के नए होने चाहिए और उन्हें पहले कुछ घंटे पानी में भिगोकर अच्छी तरह सुखा लिया गया हो। टूटे या चटके हुए दीयों का प्रयोग पूजा में वर्जित माना जाता है। शुद्ध आचरण, शांत मन और श्रद्धाभाव से किया गया यह दीपोत्सव जीवन से दरिद्रता को मिटाकर स्थाई सुख और शांति प्रदान करता है।
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