Govardhan Puja 2026: दिवाली के अगले दिन या उसके बाद कब है गोवर्धन पूजा? जानें सही तारीख

दीपावली के महापर्व के बाद देशभर में भगवान श्रीकृष्ण, गोवर्धन पर्वत और गौमाता की पूजा का पावन पर्व ‘गोवर्धन पूजा’ (अन्नकूट) अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। हिंदू पंचांग के अनुसार, गोवर्धन पूजा हर वर्ष कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि को की जाती है। अमूमन यह त्योहार दीपावली यानी कार्तिक अमावस्या के ठीक अगले दिन पड़ता है, लेकिन कई बार तिथियों के घटने-बढ़ने, अमावस्या तिथि के अगले दिन दोपहर तक खिंचने या सूर्योदय व्यापिनी प्रतिपदा के नियम के कारण लोगों के मन में यह संशय उत्पन्न हो जाता है कि गोवर्धन पूजा दिवाली के तुरंत अगले दिन मनाई जाए या उसके बाद वाले दिन। शास्त्रों के विधान के अनुसार, गोवर्धन पूजा सदैव ‘उदयातिथि’ और विशेष रूप से दोपहर व प्रदोष काल में प्रतिपदा तिथि की उपस्थिति के आधार पर तय की जाती है। यदि दिवाली की रात अमावस्या तिथि अगले दिन सुबह या दोपहर तक बनी रहती है, तो शास्त्रों के नियमानुसार गोवर्धन पूजा और अन्नकूट उत्सव अमावस्या समाप्त होने के बाद लगने वाली प्रतिपदा तिथि के दिन मनाया जाता है। जब प्रतिपदा तिथि का आरंभ दोपहर के बाद होता है और वह अगले दिन के प्रातःकाल तक रहती है, तो उदयातिथि के सिद्धांत और गोवर्धन पूजन के प्रदोष काल के मुहूर्त को प्राथमिकता दी जाती है। इस गणना के कारण श्रद्धालुओं को पंचांगीय तिथि के आरंभ और समापन के समय का विशेष ध्यान रखना होता है, जिससे वे सही दिन और शुभ चौघड़िया मुहूर्त में भगवान गिरधर गोपाल और गोवर्धन महाराज का विधिवत पूजन संपन्न कर सकें।

कार्तिक शुक्ल प्रतिपदा का शुभ मुहूर्त और पूजा का श्रेष्ठ समय

गोवर्धन पूजा के लिए हिंदू धर्मग्रंथों में दो प्रमुख काल खंडों को अत्यंत फलदायी बताया गया है—प्रातःकाल का मुहूर्त और सायंकाल (प्रदोष काल) का समय। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान श्रीकृष्ण ने ब्रजवासियों को इंद्र के कोप से बचाने के लिए जब गोवर्धन पर्वत को अपनी कनिष्ठिका उंगली पर उठाया था, तब उन्होंने दिनभर गोवर्धन की परिक्रमा और सांझ के समय अन्नकूट भोग लगाने का विधान शुरू करवाया था। कार्तिक शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा तिथि का प्रारंभ होते ही शुभ योगों का निर्माण होता है। प्रातःकाल में जब सूर्योदय के समय प्रतिपदा तिथि विद्यमान हो, तो सुबह 6 बजकर 30 मिनट से लेकर 8 बजकर 45 मिनट तक का समय चर, लाभ और अमृत के चौघड़िया में गोवर्धन निर्माण और पूजन के लिए सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। वहीं जो लोग गोधूलि वेला यानी संध्याकाल में गोवर्धन पूजन करते हैं, उनके लिए शाम को 5 बजकर 35 मिनट से लेकर रात 8 बजकर 15 मिनट तक का प्रदोष काल अत्यंत कल्याणकारी होता है। इस शुभ अवधि में की गई पूजा से घर में अन्न, धन और गोवंश की समृद्धि सदा बनी रहती है।

गोवर्धन पूजा के लिए संपूर्ण सामग्री लिस्ट: थाली में क्या-क्या होना जरूरी?

गोवर्धन पूजा पूरी तरह से प्रकृति, कृषि और पशुधन के प्रति आभार प्रकट करने का लोकपर्व है, इसलिए इसकी पूजा सामग्री में खेतों की नई उपज, गाय का गोबर और दुग्ध उत्पादों का विशेष स्थान होता है। पूजा की तैयारी करते समय अपनी पूजा की थाली और सामग्री की सूची में निम्नलिखित वस्तुओं को पहले से व्यवस्थित कर लेना चाहिए:

  • गोवर्धन निर्माण सामग्री: ताजा और पवित्र गाय का गोबर (गोवर्धन पर्वत की आकृति बनाने के लिए), खील, बताशे, फूल, हरी दूब (घास), रोली, अक्षत (बिना टूटे साबुत चावल), चंदन, हल्दी, कलावा (मौली), और शुद्ध जल से भरा कलश।

  • दीप और सुगंध सामग्री: गाय के शुद्ध देसी घी का दीपक, सरसों के तेल का चौमुखा दीपक, धूपबत्ती, कपूर, अगरबत्ती, माचिस और रुई की बत्तियां।

  • नैवेद्य और प्रसाद: गंगाजल, गाय का कच्चा दूध, दही, शहद, शक्कर, पंचामृत, तुलसी दल (बिना तुलसी दल के श्रीकृष्ण भोग स्वीकार नहीं करते), मौसमी फल जैसे सेब, केला, अमरूद, शरीफा, सिंघाड़ा और गन्ना।

  • अन्नकूट की सामग्री: नई फसल से बने विभिन्न प्रकार के पकवान, पूरी, कचौड़ी, पुआ, खीर, हलवा, बाजरे की रोटी, माखन-मिश्री और विशेष रूप से मौसमी हरी सब्जियों (जैसे कद्दू, बैंगन, सेम, मूली, पालक, गाजर) को मिलाकर तैयार की जाने वाली ‘अन्नकूट की मिश्रित सब्जी’।

गाय के गोबर से गोवर्धन पर्वत का निर्माण और पारंपरिक पूजन विधि

गोवर्धन पूजा के पावन दिन प्रातःकाल स्नान-ध्यान से निवृत्त होकर स्वच्छ वस्त्र धारण करें और घर के आंगन या मुख्य द्वार की खुली भूमि को गंगाजल छिड़ककर पवित्र करें। इसके बाद गाय के पवित्र गोबर की सहायता से जमीन पर लेटे हुए पुरुष रूप में गोवर्धन महाराज की विशाल आकृति बनाई जाती है। उनके नाभि के स्थान पर एक मिट्टी का दीपक, छोटी कटोरी या गहरा गर्त बनाया जाता है, जिसमें पूजा के दौरान दूध, दही, गंगाजल और बताशे अर्पित किए जाते हैं। गोवर्धन पर्वत की इस आकृति को सुंदर फूलों, पत्तों, पेड़ों की टहनियों और खील-बताशों से सजाया जाता है। पूजा की शुरुआत में हाथ में जल और अक्षत लेकर संकल्प लें, तत्पश्चात भगवान गणेश और कुलदेवता का स्मरण करते हुए गोवर्धन जी को रोली, चंदन का तिलक लगाएं और अक्षत अर्पित करें। इसके बाद धूप-दीप प्रज्वलित करके उन्हें दूर्वा, मौसमी फल और मिष्ठान अर्पित करें। परिवार के सभी सदस्य मिलकर गोवर्धन जी की नाभि में गाय का कच्चा दूध धार के रूप में अर्पित करते हैं और जल का अर्घ्य देते हैं।

56 भोग और अन्नकूट का विशेष महत्व: भगवान कृष्ण को क्यों लगाते हैं भोग?

गोवर्धन पूजा को लोकभाषा में ‘अन्नकूट उत्सव’ भी कहा जाता है। इसके पीछे श्रीमद्भागवत महापुराण की एक बेहद रोचक और शिक्षाप्रद कथा जुड़ी हुई है। द्वापर युग में देवराज इंद्र के घमंड को चूर करने और ब्रजवासियों को प्रकृति पूजन की सीख देने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने इंद्र की पारंपरिक पूजा रुकवाकर गोवर्धन पर्वत की पूजा करवाई थी। इससे कुपित होकर इंद्रदेव ने ब्रज पर प्रलयंकारी मूसलाधार वर्षा शुरू कर दी। तब भगवान श्रीकृष्ण ने पूरे सात दिनों तक गोवर्धन पर्वत को अपनी उंगली पर छत्र की भांति उठाए रखा और सभी पशुओं व ब्रजवासियों को सुरक्षित आश्रय दिया। भगवान कृष्ण दिन में सामान्यतः आठ पहर भोजन करते थे, लेकिन इन सात दिनों तक उन्होंने जल और अन्न का एक दाना भी ग्रहण नहीं किया। जब आठवें दिन वर्षा थमी और इंद्र ने नतमस्तक होकर क्षमा मांगी, तब कृतज्ञ ब्रजवासियों ने मिलकर सात दिनों और आठ पहरों के हिसाब से कुल 56 प्रकार के स्वादिष्ट व्यंजन (7 दिन × 8 पहर = 56 भोग) बनाकर अपने कन्हैया को प्रेमपूर्वक अर्पित किए। तभी से गोवर्धन पूजा के दिन नई फसलों के अन्न, कंदमूल और सब्जियों से 56 प्रकार के व्यंजन बनाकर श्रीकृष्ण और गोवर्धन पर्वत को ‘अन्नकूट’ का महाभोग लगाने की परंपरा निरंतर चली आ रही है।

गोवर्धन पूजा पर ध्यान रखने योग्य धार्मिक नियम और परिक्रमा का विधान

गोवर्धन पूजा के अनुष्ठान में कुछ विशेष धार्मिक सावधानियां बरतना आवश्यक माना गया है। पूजन के बाद गोवर्धन जी की सात या चार बार परिक्रमा अवश्य करनी चाहिए। परिक्रमा करते समय हाथ में जल का लोटा लेकर जल की अखंड धार जमीन पर गिराते हुए चला जाता है और साथ में खील-बताशे बिखेरे जाते हैं। परिक्रमा सदैव घड़ी की सुई की दिशा (Clockwise) में ही की जानी चाहिए और मुख पर ‘श्री गोवर्धन महाराज, ओ महाराज, तेरे माथे मुकुट विराज रह्यो’ जैसे भक्ति गीतों का स्मरण होना चाहिए। इस दिन गौशाला में जाकर गायों को स्नान कराना, उनकी सींगों पर गेरू या तेल लगाना, उन्हें माला पहनाना और गुड़-रोटी व हरी घास खिलाना परम पुण्यदायी माना गया है, क्योंकि गौमाता में 33 कोटि देवी-देवताओं का वास माना जाता है। इस दिन घर में किसी भी प्रकार का मांसाहार, मदिरा या तामसिक भोजन (प्याज-लहसुन) पूरी तरह वर्जित रहता है। यदि आंगन में गोबर से गोवर्धन बनाने की जगह न हो, तो छोटी थाली में गोबर से प्रतीकात्मक आकृति बनाकर या गोवर्धन शिला के चित्र का पूजन करके भी उतना ही आध्यात्मिक फल प्राप्त किया जा सकता है।

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