
उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ स्थित प्रतिष्ठित किंग जॉर्ज मेडिकल यूनिवर्सिटी (KGMU) में कथित धर्मांतरण और उत्पीड़न के गंभीर आरोपों के बाद प्रशासन ने बड़े स्तर पर कानूनी और विभागीय शिकंजा कसना शुरू कर दिया है। स्पेशल टास्क फोर्स (STF) द्वारा शासन को सौंपी गई सात पन्नों की विस्तृत जांच रिपोर्ट में विश्वविद्यालय के 13 डॉक्टरों और कई कर्मचारियों की संदिग्ध भूमिका सामने आई है। इस सनसनीखेज रिपोर्ट के आधार पर केजीएमयू कार्यपरिषद (Executive Council) ने आपात बैठक बुलाकर मामले की गहन पड़ताल के लिए एक उच्चस्तरीय 6 सदस्यीय ‘अनुशासनात्मक कार्रवाई समिति’ (Disciplinary Action Committee) गठित करने का सर्वसम्मत फैसला लिया है। कुलपति डॉ. सोनिया नित्यानंद की अध्यक्षता में हुई इस बैठक के बाद संस्थान में हड़कंप का माहौल है और दोषी पाए जाने वाले डॉक्टरों पर प्रशासनिक पदों से हटाए जाने से लेकर बर्खास्तगी तक की तलवार लटक गई है।
6 सदस्यीय कमेटी में शामिल होंगे रिटायर्ड IPS: निष्पक्ष जांच का खाका
विश्वविद्यालय कार्यपरिषद ने केजीएमयू एक्ट और परिनियमावली (Statutes) के नियम 11.11 के तहत जांच कमेटी के गठन को हरी झंडी दी है।
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कमेटी की संरचना: इस छह सदस्यीय समिति की अध्यक्षता स्वयं कुलपति करेंगी, जबकि कुलसचिव (Registrar) इसके सदस्य सचिव होंगे।
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वरिष्ठ संकाय सदस्य: विश्वविद्यालय के दो वरिष्ठ प्रोफेसरों को संकाय प्रतिनिधि के रूप में नामित किया जाएगा।
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स्वतंत्र प्रशासनिक चेहरे: मामले की संवेदनशीलता और निष्पक्षता को बनाए रखने के लिए दो बाहरी स्वतंत्र सदस्यों को शामिल करने का निर्णय हुआ है, जिनमें उत्तर प्रदेश पुलिस के वरिष्ठ पदों से सेवानिवृत्त आईपीएस (Retired IPS) अधिकारियों को प्राथमिकता दी जाएगी।
यह कमेटी एसटीएफ की ओर से मिले सभी साक्ष्यों, इलेक्ट्रॉनिक दस्तावेजों, पीड़ितों के बयानों और आरोपी डॉक्टरों द्वारा दिए गए लिखित प्रत्यावेदनों का बारीकी से परीक्षण करेगी। जांच प्रक्रिया पूरी होने के बाद समिति अपनी विस्तृत संस्तुति शासन और विश्वविद्यालय प्रशासन को सौंपेगी।
डॉ. रमीज प्रकरण और 13 साल के उत्पीड़न की दास्तान
इस पूरे मामले की मुख्य कड़ी आरोपी डॉक्टर रमीज मलिक से जुड़ी है, जिसके खिलाफ लखनऊ के चौक थाने में भारतीय न्याय संहिता (BNS) और उत्तर प्रदेश विधि विरुद्ध धर्म संपरिवर्तन प्रतिषेध अधिनियम के तहत आपराधिक मुकदमा दर्ज है। एसटीएफ की जांच के दौरान एक पीड़िता महिला डॉक्टर ने सनसनीखेज खुलासे करते हुए बताया कि आरोपी ने दोस्ती की आड़ में नशीला पदार्थ देकर आपत्तिजनक वीडियो बनाया और ब्लैकमेल करके वर्षों तक शारीरिक और मानसिक उत्पीड़न किया। पीड़िता का आरोप है कि उस पर जबरन धर्म परिवर्तन और निकाह का दबाव बनाया गया। जब उसके परिवार ने अन्यत्र विवाह तय करने का प्रयास किया, तो लड़के वालों को आपत्तिजनक सामग्री भेजकर रिश्ता तुड़वा दिया गया। इस गिरोह के तार संस्थान के हॉस्टलों और कुछ खास विभागों से जुड़े होने की बात भी सामने आई है।
प्रशासनिक पदों से हटाए जाने की तैयारी, शिक्षक संघ ने उठाए सवाल
एसटीएफ की जांच रिपोर्ट के आधार पर केजीएमयू प्रशासन उन डॉक्टरों के खिलाफ कड़े कदम उठाने की योजना बना रहा है, जिन पर विभागीय स्तर पर शिकायतों को दबाने या संदिग्ध गतिविधियों को संरक्षण देने के आरोप लगे हैं। सूत्रों के मुताबिक, रिपोर्ट में नामजद कुछ वरिष्ठ डॉक्टरों को उनके वर्तमान प्रशासनिक पदों और विभागाध्यक्ष (HOD) की जिम्मेदारियों से मुक्त किया जा सकता है।
वहीं दूसरी ओर, शिक्षक संघ ने एसटीएफ रिपोर्ट के कुछ बिंदुओं पर आपत्ति जताते हुए कहा है कि कुछ डॉक्टरों के नाम और विभागों की जानकारी त्रुटिपूर्ण दर्ज है। संघ का तर्क है कि जिन मामलों में न्यायालय में चार्जशीट दाखिल हो चुकी है, वहां आंतरिक स्तर पर डॉक्टरों को बेवजह कटघरे में न खड़ा किया जाए। हालांकि, प्रशासन का रुख बेहद स्पष्ट है कि स्वास्थ्य और शिक्षा के इतने बड़े संस्थान में किसी भी प्रकार की अनैतिक या गैर-कानूनी गतिविधि को बर्दाश्त नहीं किया जाएगा और जांच के नतीजे आते ही कठोर विभागीय कार्रवाई की जाएगी।
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