
सनातन धर्म में एकादशी व्रत को सभी व्रतों में शिरोमणि और सर्वाधिक पुण्य फलदायी माना गया है। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी को ‘अजा एकादशी’ के नाम से जाना जाता है। पद्म पुराण और ब्रह्मवैवर्त पुराण के अनुसार, अजा एकादशी का श्रद्धापूर्वक व्रत रखने से जातक के जाने-अनजाने में किए गए समस्त पाप, पूर्व जन्मों के दोष और दरिद्रता का पूर्ण नाश हो जाता है।
पौराणिक इतिहास में राजा हरिश्चंद्र ने अपने खोए हुए राज-पाट, परिवार और मान-सम्मान को पुनः प्राप्त करने के लिए महर्षि गौतम के निर्देश पर इसी अजा एकादशी का कठोर व्रत रखा था। इस व्रत के प्रभाव से ही राजा हरिश्चंद्र को उनका खोया हुआ राज्य वापस मिला और उनके मृत पुत्र रोहिताश्व को नया जीवनदान प्राप्त हुआ। अजा एकादशी के दिन जगत के पालनहार भगवान श्री हरि विष्णु के ‘ऋषिकेश’ स्वरूप की पूजा-अर्चना करने का शास्त्रीय विधान है।
अजा एकादशी 2026: शुभ तिथि, पूजन मुहूर्त और पंचांगीय गणना
पंचांग के अनुसार भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि का आरंभ 6 सितंबर की सायंकाल से होकर 7 सितंबर को पूरे दिन व्याप्त रहेगा। उदयातिथि की शास्त्रीय मान्यता के अनुसार गृहस्थ और वैष्णव संप्रदाय दोनों ही 7 सितंबर को अजा एकादशी का मुख्य व्रत रखेंगे।
प्रातःकाल का समय भगवान विष्णु की साधना के लिए अत्यंत शुभ और फलदायी माना जाता है। 7 सितंबर को प्रातः ब्रह्म मुहूर्त से लेकर अभिजीत मुहूर्त तक पूजा-अर्चना के विशेष संयोग बन रहे हैं। जो भक्त इस दिन सूर्योदय से पूर्व उठकर पवित्र नदियों में स्नान करते हैं या घर पर ही गंगाजल मिश्रित जल से स्नान कर व्रत का संकल्प लेते हैं, उन्हें अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल की प्राप्ति होती है।
अजा एकादशी की प्रामाणिक पूजा विधि: ऋषिकेश स्वरूप का पंचोपचार पूजन
अजा एकादशी पर भगवान विष्णु के ऋषिकेश स्वरूप के पूजन के लिए एक निश्चित और पवित्र विधि का पालन किया जाता है। प्रातःकाल स्नान आदि से निवृत्त होकर स्वच्छ पीले या श्वेत वस्त्र धारण करें। इसके बाद पूजा स्थल पर एक लकड़ी की चौकी स्थापित कर उस पर पीला वस्त्र बिछाएं और भगवान विष्णु तथा माता लक्ष्मी की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।
सर्वप्रथम भगवान को गंगाजल और पंचामृत से प्रतीकात्मक स्नान कराएं। इसके पश्चात उन्हें पीले चंदन का तिलक लगाएं, पीले पुष्प, मौसमी फल, अक्षत और तुलसी दल अर्पित करें। ध्यान रहे कि भगवान विष्णु की पूजा तुलसी पत्र के बिना अधूरी मानी जाती है, इसलिए नैवेद्य में तुलसी का पत्ता अवश्य रखें। धूप और शुद्ध गाय के घी का दीपक प्रज्वलित कर भगवान के समक्ष अजा एकादशी व्रत कथा का श्रद्धा से पाठ करें। अंत में ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ महामंत्र का 108 बार जप करें और कपूर से विधिवत आरती उतारें।
अजा एकादशी व्रत के कठोर नियम और दिनभर के आचार-विचार
एकादशी का व्रत केवल निराहार रहने का नाम नहीं है, बल्कि यह मन, वाणी और कर्म की शुद्धि का महापर्व है। अजा एकादशी का व्रत रखने वाले जातकों को दशमी तिथि की शाम से ही नियमों का पालन शुरू कर देना चाहिए:
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दशमी की रात्रि से लेकर एकादशी के पूरे दिन तक तामसिक भोजन, प्याज, लहसुन और विशेष रूप से चावल का पूर्ण त्याग करें।
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एकादशी के दिन किसी भी प्रकार का झूठ, क्रोध, वाद-विवाद या दूसरों की निंदा करने से बचें। ब्रह्मचर्य का पूर्ण पालन करें।
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दिनभर निराहार रहकर या जल-फलाहार पर व्रत रखें। वृद्ध, रोगी और गर्भवती महिलाएं फलाहार ग्रहण कर सकती हैं।
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एकादशी की रात्रि में शयन करने के बजाय रात्रि जागरण करने का विधान है। रात के समय भजन-कीर्तन और विष्णु सहस्रनाम का पाठ करने से अनंत पुण्यों की प्राप्ति होती है।
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इस दिन तुलसी के पत्तों को कभी नहीं तोड़ना चाहिए। पूजा के लिए तुलसी के पत्ते एक दिन पहले यानी दशमी तिथि को ही तोड़कर रख लेने चाहिए।
पारण का समय और व्रत समाप्ति की शास्त्रीय परंपरा
एकादशी व्रत का संपूर्ण फल तभी प्राप्त होता है जब इसका पारण अगले दिन यानी द्वादशी तिथि के शुभ मुहूर्त में और सही विधि से संपन्न किया जाए। अजा एकादशी व्रत का पारण 8 सितंबर को प्रातःकाल किया जाएगा।
द्वादशी तिथि के दिन सूर्योदय के बाद स्नान कर पुनः भगवान विष्णु की पूजा करें। इसके बाद किसी योग्य ब्राह्मण, पुरोहित या जरूरतमंद व्यक्ति को अन्न, वस्त्र, पीले फल और सामर्थ्य अनुसार दक्षिणा दान करें। इसके पश्चात तुलसी दल और चरणामृत ग्रहण करके ही अपने व्रत का पारण करें। द्वादशी तिथि समाप्त होने से पहले और हरि वासर का समय बीत जाने के बाद पारण करना अनिवार्य होता है, अन्यथा व्रत का फल निष्फल माना जाता है।
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