
कुत्ते, बिल्ली या बंदर जैसे आवारा जानवरों के काटने के बाद जान बचाने वाली सबसे बुनियादी दवा पर ही जालसाजों ने डाका डाल दिया है। खुले मेडिकल बाजार और थोक दवा मंडियों में नकली एंटी-रेबीज वैक्सीन (Anti-Rabies Vaccine – ARV) की एक बड़ी खेप पकड़े जाने से स्वास्थ्य महकमे और आम जनता के बीच भारी हड़कंप मच गया है। ड्रग कंट्रोल विभाग और एसटीएफ की संयुक्त छापेमारी में प्रतिष्ठित फार्मास्यूटिकल कंपनियों के हूबहू रैपर, होलोग्राम और क्यूआर कोड लगाकर बेची जा रही नकली वाइल्स जब्त की गई हैं। यह मामला केवल आर्थिक धोखाधड़ी का नहीं, बल्कि सीधे तौर पर अनगिनत मरीजों की जान से खिलवाड़ का है, क्योंकि रेबीज एक ऐसा लाइलाज वायरल संक्रमण है जिसमें 100 प्रतिशत मृत्यु दर होती है और समय पर असली वैक्सीन न मिलने का मतलब सीधा मौत का बुलावा है।
ऐसे फूटा फर्जीवाड़े का भांडा: शक से लेकर लैब टेस्ट तक की इनसाइड स्टोरी
इस जानलेवा रैकेट का खुलासा उस वक्त शुरू हुआ जब एक अस्पताल में आवारा कुत्ते के काटने के बाद पूरे चार इंजेक्शन लगवाने के बावजूद एक मरीज में रेबीज जैसे न्यूरोलॉजिकल लक्षण दिखने लगे।
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डॉक्टरों को हुआ संदेह: पूरी डोज लेने के बाद भी संक्रमण न रुकने पर डॉक्टरों ने मरीज के परिजनों से खरीदी गई वैक्सीन की खाली शीशी और बिल मंगवाया।
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कंपनी से संपर्क: स्थानीय स्तर पर जब दवा की पैकिंग को संबंधित विनिर्माता कंपनी के तकनीकी विंग को भेजा गया, तो कंपनी ने पुष्टि की कि उस विशेष बैच नंबर का उत्पादन उनके संयंत्र में उस तारीख को हुआ ही नहीं था।
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ड्रग इंस्पेक्टरों की छापेमारी: कंपनी की लिखित शिकायत मिलते ही औषधि विभाग हरकत में आया। थोक दवा बाजार के गोदामों और संदिग्ध मेडिकल स्टोर्स पर एक साथ दबिश दी गई, जहां बिना किसी वैध बिल, कोल्ड-चेन मेंटेनेंस और खरीद रिकॉर्ड के सैकड़ों पेटियां बरामद की गईं।
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लैब रिपोर्ट में पानी का घोल: जब जब्त नमूनों को राजकीय औषधि प्रयोगशाला (Government Drug Testing Lab) भेजा गया, तो जांच में पाया गया कि शीशियों के अंदर एक्टिव एंटीजन के नाम पर केवल डिस्टिल्ड वॉटर (आसुत जल) और सोडियम क्लोराइड (हल्का नमक) भरा हुआ था।
रेबीज में नकली वैक्सीन का मतलब: 100% जान का जोखिम
चिकित्सा विशेषज्ञों के अनुसार, नकली एंटी-रेबीज वैक्सीन का बाजार में बिकना किसी भी अन्य नकली दवा की तुलना में सैकड़ों गुना अधिक घातक है:
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शत-प्रतिशत घातक वायरस: रेबीज का वायरस नसों के जरिए दिमाग (सेंट्रल नर्वस सिस्टम) पर हमला करता है। हाइड्रोफोबिया (पानी से डर) और एरोफोबिया जैसे लक्षण दिखने के बाद मरीज को दुनिया का कोई डॉक्टर नहीं बचा सकता।
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इम्यूनिटी का न बनना: जानवर के काटने के 0, 3, 7 और 14वें या 28वें दिन लगाई जाने वाली वैक्सीन शरीर में न्यूट्रलाइजिंग एंटीबॉडीज बनाती है। यदि शीशी में केवल पानी या सामान्य लिक्विड है, तो शरीर में कोई सुरक्षा कवच नहीं बनता और वायरस बेरोकटोक दिमाग तक पहुंच जाता है।
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झूठा सुरक्षा का अहसास: मरीज और उसका परिवार यह मानकर निश्चिंत बैठ जाता है कि उन्होंने पूरे टीके लगवा लिए हैं, जबकि शरीर के भीतर वायरस तेजी से फैल रहा होता है।
नकली और असली वैक्सीन की पहचान कैसे करें?
औषधि विभाग और वरिष्ठ डॉक्टरों ने आम नागरिकों और पैरामेडिकल स्टाफ को वैक्सीन खरीदते व लगवाते समय अत्यधिक सावधानी बरतने के कड़े निर्देश दिए हैं:
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कोल्ड-चेन की अनिवार्यता: असली रेबीज वैक्सीन को हर हाल में 2°C से 8°C के तापमान (रेफ्रिजरेटर) में स्टोर किया जाता है। यदि कोई मेडिकल स्टोर संचालक इसे सामान्य रैक या काउंटर से निकाल कर दे, तो उसे तुरंत अस्वीकार करें।
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क्यूआर कोड और बैच वेरिफिकेशन: शीशी पर दिए गए सुरक्षा बारकोड या क्यूआर कोड को मोबाइल से स्कैन करें और देखें कि वह मूल फार्मा निर्माता की आधिकारिक वेबसाइट पर सही बैच नंबर, निर्माण और एक्सपायरी डेट दिखा रहा है या नहीं।
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प्रिंटिंग और पैकेजिंग की गुणवत्ता: नकली वाइल्स के लेबल पर प्रिंटिंग हल्की, फॉन्ट साइज में अंतर या स्पेलिंग की गलतियां अक्सर देखने को मिलती हैं।
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पक्का बिल जरूर लें: कभी भी बिना जीएसटी इनवॉइस या बिना बैच नंबर दर्ज किए किसी भी केमिस्ट से वैक्सीन न खरीदें।
प्रशासन का सख्त रुख: एनएसए और गैंगस्टर एक्ट की तैयारी
नकली दवाओं के इस नेटवर्क की कड़ियां अंतरराज्यीय स्तर पर जुड़ी होने की आशंका जताई जा रही है। जांच एजेंसियां अब यह पता लगा रही हैं कि इस नकली खेप को कहां तैयार किया गया था और अब तक कितने मेडिकल स्टोर्स या निजी क्लीनिकों में इसकी आपूर्ति की जा चुकी है।
स्वास्थ्य विभाग ने सभी सरकारी अस्पतालों को निर्देश दिया है कि वे अपनी इन-हाउस आपूर्ति की दोबारा जांच करें और आम जनता से अपील की है कि वे आवारा पशुओं के काटने पर निजी मेडिकल स्टोर्स से सीधे वैक्सीन खरीदने के बजाय अधिकृत सरकारी अस्पतालों और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHCs) से ही टीकाकरण कराएं। पुलिस अधिकारियों के अनुसार, इस घिनौने अपराध में शामिल गिरोह के मुख्य सरगनाओं के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) और गैंगस्टर एक्ट जैसी कठोर धाराओं के तहत कार्रवाई की जाएगी।
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