
भाई-बहन के अटूट स्नेह और विश्वास का महापर्व रक्षाबंधन इस बार विशिष्ट खगोलीय और पंचांगीय संयोग में मनाया जा रहा है। पंचांग गणना के अनुसार श्रावण शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा तिथि आज प्रातः 09:47 बजे तक ही व्याप्त है और इसके साथ ही दिनभर पंचक का प्रभाव भी बना रहेगा। ऐसे में श्रद्धालुओं और बहनों के मन में यह स्वाभाविक प्रश्न उठ रहा है कि क्या पूर्णिमा समाप्त होने के बाद अथवा पंचक के दौरान भाई की कलाई पर रक्षासूत्र बांधा जा सकता है या नहीं। सनातन धर्म के आर्ष ग्रंथों, निर्णयसिंधु और धर्मसिंधु के अनुसार उदयातिथि की मान्यता के चलते यह पर्व पूरे दिन उल्लास और विधि-विधान के साथ मनाया जाएगा।
उदयातिथि का शास्त्रीय विधान: क्यों पूरे दिन मान्य रहेगा रक्षाबंधन
हिंदू धर्म और वैदिक पंचांग में ‘उदयातिथि’ को सर्वोपरि मान्यता दी गई है। शास्त्र सम्मत नियम है कि जिस तिथि में सूर्योदय होता है, वह तिथि पूरे दिन के धार्मिक, मांगलिक और नैमित्तिक कृत्यों के लिए मान्य मानी जाती है। यद्यपि पूर्णिमा तिथि प्रातः 09:47 बजे समाप्त होकर प्रतिपदा तिथि प्रारंभ हो रही है, परंतु सूर्योदय कालीन तिथि श्रावणी पूर्णिमा होने के कारण रक्षाबंधन का संपूर्ण पर्व दिनभर और संध्याकाल तक मनाया जाना पूरी तरह शास्त्र सम्मत और शुभ फलदायी है। जो बहनें प्रातः 09:47 बजे से पहले रक्षासूत्र नहीं बांध पाई हैं, उन्हें किसी भी प्रकार के संशय में पड़ने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि उदयातिथि के प्रभाव से वे पूरे दिन शुभ चौघड़िया देखकर रक्षाबंधन का अनुष्ठान संपन्न कर सकती हैं।
क्या पंचक में राखी बांधना वर्जित है? जानिए ज्योतिषीय सत्य
पूर्णिमा तिथि के साथ-साथ आज पूरे दिन पंचक का प्रभाव भी बना हुआ है। जनमानस में पंचक को लेकर कई भ्रांतियां रहती हैं, परंतु ज्योतिष शास्त्र के अनुसार पंचक सभी कार्यों के लिए अशुभ नहीं होता। जब चंद्रमा कुंभ और मीन राशि में संचरण करता है, तब धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्वाभाद्रपद, उत्तराभाद्रपद और रेवती नक्षत्रों के समूह को पंचक कहा जाता है।
शास्त्रों में पंचक के दौरान केवल पांच विशिष्ट कार्य वर्जित बताए गए हैं:
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दक्षिण दिशा की यात्रा करना
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घर की छत डालना या ढलाई करना
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चारपाई, खाट या पलंग का निर्माण करना व खरीदना
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घास, लकड़ी या ईंधन का भंडारण करना
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दाह संस्कार बिना शांति विधान के करना
रक्षाबंधन एक पवित्र रक्षा विधान, मंगल कामना और पारिवारिक स्नेह का पर्व है। शास्त्रों में रक्षाबंधन के लिए केवल ‘भद्रा’ का निषेध किया गया है, पंचक का नहीं। रक्षाबंधन पर्व में भद्रा का त्याग अनिवार्य होता है, जबकि पंचक में राखी बांधने पर किसी भी प्रकार का शास्त्रीय प्रतिबंध नहीं है। अतः पंचक काल में भी बहनें बिना किसी भय के अपने भाई की दीर्घायु और समृद्धि के लिए राखी बांध सकती हैं।
राखी बांधने के दिनभर के श्रेष्ठ शुभ मुहूर्त और चौघड़िया
यद्यपि उदयातिथि के कारण पूरा दिन शुभ है, परंतु विशेष कार्यों के लिए अमृत, शुभ और लाभ के चौघड़िया कालखंड में रक्षासूत्र बांधना अत्यधिक कल्याणकारी माना जाता है।
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प्रातःकालीन पूर्णिमा काल मुहूर्त: सूर्योदय से प्रातः 09:47 बजे तक। यह समय पूर्णिमा तिथि की प्रत्यक्ष उपस्थिति का सर्वोत्तम काल है।
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अभिजीत मुहूर्त: दोपहर 11:57 बजे से दोपहर 12:48 बजे तक। ज्योतिष में अभिजीत मुहूर्त को स्वयं सिद्ध मुहूर्त माना गया है, जिसमें किसी भी प्रकार के दोष निष्प्रभावी हो जाते हैं।
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विजय मुहूर्त: दोपहर 02:30 बजे से दोपहर 03:22 बजे तक। इस मुहूर्त में रक्षासूत्र बांधने से भाई को कार्यक्षेत्र, व्यापार और सामाजिक प्रतिष्ठा में विजय प्राप्त होती है।
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अमृत और शुभ चौघड़िया (अपराह्न): दोपहर 12:20 बजे से अपराह्न 03:30 बजे तक। पारिवारिक मेल-मिलाप और राखी बांधने के लिए यह सबसे सुगम समय है।
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प्रदोष काल (संध्याकालीन मुहूर्त): सायं 06:45 बजे से रात्रि 08:52 बजे तक। जो बहनें शाम को पूजन करती हैं, उनके लिए यह समय अत्यंत पावन रहेगा।
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राहुकाल समय (परहेज योग्य): दोपहर 04:30 बजे से सायं 06:00 बजे तक। इस समयावधि में शुभ कार्य करने से बचना श्रेयस्कर रहता है।
रक्षाबंधन की संपूर्ण प्रामाणिक पूजा विधि
रक्षाबंधन के पावन अवसर पर प्रातःकाल स्नानादि के बाद स्वच्छ वस्त्र धारण करें। घर के मंदिर में दीप प्रज्वलित कर कुलदेवी, कुलदेवता, विघ्नहर्ता भगवान श्रीगणेश और अपने ईष्टदेव की आराधना करें। रक्षाबंधन की थाली में पहली राखी भगवान गणेश को समर्पित करनी चाहिए, जिससे जीवन के समस्त विघ्नों का नाश हो।
पूजा की थाली में रोली, चंदन, अक्षत (बिना टूटे चावल), ताजे पुष्प, दूर्वा, सरसों के दाने, दीपक, शुद्ध घी की मिठाई और रेशमी रक्षासूत्र रखें।
राखी बांधते समय दिशा का विशेष ध्यान रखें। भाई का मुख पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर होना चाहिए और बहन का मुख पश्चिम दिशा की ओर हो। यह दिशा मानसिक एकाग्रता और सकारात्मक ऊर्जा के संचार के लिए सर्वोत्तम मानी जाती है।
सर्वप्रथम भाई के माथे पर रोली और चंदन का तिलक लगाएं और उस पर अक्षत लगाएं। अक्षत दीर्घायु और अखंड सौभाग्य का प्रतीक है। इसके बाद भाई की दाहिनी कलाई पर रक्षासूत्र बांधें। रक्षासूत्र में तीन गांठें लगाना शास्त्रीय माना जाता है, जो त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) और त्रिगुणों (सत्व, रज, तम) का प्रतीक हैं।
राखी बांधते समय इस वैदिक रक्षा मंत्र का पाठ अवश्य करें:
येन बद्धो बली राजा दानवेन्द्रो महाबलः। तेन त्वामनुबध्नामि रक्षे मा चल मा चल॥
मंत्रोच्चारण के पश्चात भाई की आरती उतारें ताकि सभी नकारात्मक शक्तियां और नजर दोष दूर हो सकें। तत्पश्चात भाई को मिष्ठान खिलाएं। भाई अपनी बहन के चरण स्पर्श कर आशीर्वाद लें अथवा बहन को यथायोग्य उपहार व स्नेह देकर जीवनभर उसके सम्मान और रक्षा का वचन दे।
देश के प्रमुख शहरों में स्थानीय समयानुसार प्रभाव
स्थानीय सूर्योदय और भौगोलिक अक्षांश के अनुसार दिल्ली-एनसीआर, उत्तर प्रदेश (नोएडा, लखनऊ, कानपुर, प्रयागराज, वाराणसी), बिहार (पटना, गया, मुजफ्फरपुर), मध्य प्रदेश (भोपाल, इंदौर, ग्वालियर), राजस्थान (जयपुर, उदयपुर) और महाराष्ट्र (मुंबई, पुणे) में चौघड़िया के समय में कुछ मिनटों का स्थानीय अंतर हो सकता है। हालांकि उदयातिथि और पंचक के नियमों का प्रभाव पूरे देश में एक समान लागू रहेगा।
रक्षाबंधन पर ध्यान रखने योग्य महत्वपूर्ण सावधानियां
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रक्षासूत्र का चयन करते समय ध्यान दें कि वह सूती, रेशमी अथवा कलावे से बना हो। प्लास्टिक, अशुद्ध धातुओं या काले धागे वाली राखी बांधने से बचें।
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यदि राखी खंडित हो गई हो या धागा उलझा हुआ हो तो उसे न बांधें।
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भाई को नंगे सिर राखी नहीं बंधवानी चाहिए। सिर पर रुमाल, टोपी या कोई स्वच्छ वस्त्र अवश्य रखें।
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बहन को उपहार में काले वस्त्र, धारदार वस्तुएं, नुकीले उपकरण या कांच की वस्तुएं देने से बचना चाहिए। इसके स्थान पर वस्त्र, पुस्तकें, आभूषण, मिष्ठान या आर्थिक उपहार देना शुभ माना जाता है।
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