
श्रावण मास की पावन पूर्णिमा और रक्षाबंधन के महापर्व पर देश के दो सबसे प्रमुख ज्योतिर्लिंगों—उज्जैन स्थित भगवान श्री महाकालेश्वर और धर्मनगरी काशी में बाबा श्री विश्वनाथ धाम—में आस्था का अद्भुत और अलौकिक दृश्य देखने को मिला। सनातन परंपरा के अनुसार रक्षाबंधन का सबसे पहला रक्षासूत्र सृष्टि के अधिपति देवाधिदेव महादेव को अर्पित किया गया। मध्य प्रदेश के उज्जैन में तड़के भस्म आरती के दौरान बाबा महाकाल को 20 फीट लंबी भव्य राखी बांधी गई, तो वहीं उत्तर प्रदेश के वाराणसी में काशीपुराधिपति बाबा विश्वनाथ का सदियों पुराना पारंपरिक झूला शृंगार महोत्सव पूरी दिव्यता और शास्त्रीय विधि-विधान के साथ आयोजित हुआ। सावन माह के अंतिम दिन इन दोनों पावन तीर्थों पर उमड़े लाखों श्रद्धालुओं ने महादेव के इन मनोहारी स्वरूपों के दर्शन कर पुण्य अर्जित किया।
उज्जैन में भस्म आरती के साथ महाकाल को बंधी 20 फीट की विशाल राखी
मध्य प्रदेश की धार्मिक राजधानी उज्जैन स्थित विश्व प्रसिद्ध श्री महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग मंदिर में रक्षाबंधन पर्व का शुभारंभ भोर में 4:00 बजे होने वाली भस्म आरती के साथ हुआ। परंपरा के अनुसार, पूरे संसार में सबसे पहली राखी भगवान महाकाल को ही बांधी जाती है। इसके बाद ही देश भर में रक्षाबंधन का पर्व औपचारिक रूप से आरंभ माना जाता है।
सवा लाख लड्डुओं के महाभोग के साथ पुजारियों और भक्तों द्वारा विशेष रूप से तैयार की गई 20 फीट लंबी और भव्य कलात्मक राखी भगवान महाकाल को समर्पित की गई। इस विशाल राखी को रेशम के धागों, जरी, मोतियों, रुद्राक्ष और ॐ के दिव्य प्रतीकों से बेहद खूबसूरती से सजाया गया था। पुजारियों ने वैदिक मंत्रोच्चार के बीच भगवान महाकाल का पंचामृत (दूध, दही, घी, शहद और शर्करा) से अभिषेक किया। इसके उपरांत भांग, चंदन, अबीर और सूखे मेवों से भगवान का दूल्हा स्वरूप शृंगार कर उन्हें भस्म रमाई गई और फिर मस्तक व गर्भगृह के मुख्य द्वार पर इस ऐतिहासिक राखी को सुशोभित किया गया। भस्म आरती के दौरान पूरा महाकाल परिसर ‘जय श्री महाकाल’ और ‘हर हर महादेव’ के गगनभेदी जयकारों से गुंजायमान हो उठा। मंदिर प्रबंध समिति की ओर से श्रद्धालुओं में सवा लाख लड्डुओं का महाप्रसाद भी वितरित किया गया।
काशी विश्वनाथ धाम में बाबा का अलौकिक वार्षिक झूला शृंगार महोत्सव
उज्जैन की तरह ही मोक्षदायिनी काशी में श्रावणी पूर्णिमा के पावन अवसर पर बाबा विश्वनाथ का वार्षिक झूला शृंगार उत्सव अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ संपन्न हुआ। यह काशी विश्वनाथ मंदिर की सबसे प्राचीन और दुर्लभ परंपराओं में से एक है, जो केवल सावन पूर्णिमा के दिन ही आयोजित की जाती है।
परंपरा के अनुसार, महंत आवास से बाबा विश्वनाथ, माता पार्वती और प्रथम पूज्य भगवान श्री गणेश की पंचबदन चल रजत प्रतिमाओं को भव्य पालकी में विराजमान कर काशी विश्वनाथ धाम के गर्भगृह में लाया गया। गर्भगृह में विशेष रूप से तैयार किए गए चांदी के झूले पर भगवान शिव, माता गौरा और बाल गणेश की प्रतिमाओं को स्थापित किया गया। इसके बाद बेला, चमेली, गुलाब, गेंदा, धतूरा और मदार की सुगंधित मालाओं से पूरा दरबार महक उठा।
झूला शृंगार के दौरान काशी की शास्त्रीय संगीत परंपरा के मूर्धन्य कलाकारों और स्थानीय भक्तों ने बाबा के सम्मुख पारंपरिक कजरी, ठुमरी और शिव भजनों का गायन किया। “झूला धीरे से झुलाओ, अमवा की डारी पे…” जैसे पारंपरिक लोकगीतों और कजरी की धुनों पर भक्त भक्ति रस में झूमते नजर आए। मान्यता है कि सावन पूर्णिमा पर बाबा विश्वनाथ को झूले में झूलते हुए देखने मात्र से वैवाहिक जीवन के समस्त संकट दूर हो जाते हैं और परिवार में अखंड सुख-शांति की प्राप्ति होती है।
सावन मास का औपचारिक समापन और रक्षाबंधन का धार्मिक मर्म
सावन पूर्णिमा का दिन केवल रक्षाबंधन ही नहीं, बल्कि पूरे श्रावण मास के तप, व्रत और जलाभिषेक का पूर्णाहूति दिवस भी होता है। एक माह तक चलने वाले कांवड़ मेले और निरंतर जलाभिषेक का संकल्प इसी दिन विधिवत संपन्न होता है।
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, रक्षाबंधन के दिन सबसे पहले अपने ईष्टदेव और विशेष रूप से भगवान शिव को रक्षासूत्र बांधने का विधान है। महादेव को जगतपिता और सर्वस्व रक्षक माना गया है। उन्हें राखी बांधकर भक्त अपने जीवन, परिवार और धर्म की रक्षा की प्रार्थना करते हैं। इसी दिन वैदिक परंपरा के अनुसार श्रावणी उपाकर्म भी किया जाता है, जिसमें ब्राह्मण और द्विज समाज जनेऊ (यज्ञोपवीत) परिवर्तन कर वेदों के स्वाध्याय का संकल्प दोहराते हैं। साथ ही इस पावन तिथि को विश्व संस्कृत दिवस के रूप में भी मनाया जाता है।
वाराणसी और उज्जैन में श्रद्धालुओं का महाकुंभ जैसा नजारा
श्रावणी पूर्णिमा के अवसर पर वाराणसी के दशाश्वमेध घाट, अस्सी घाट और गंगा के समस्त प्रमुख घाटों पर सुबह से ही स्नानार्थियों की भारी भीड़ देखी गई। गंगा स्नान के उपरांत श्रद्धालुओं की कतारें काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के चारों द्वारों पर कई किलोमीटर लंबी नजर आईं। प्रशासन द्वारा श्रद्धालुओं के लिए पेयजल, मेडिकल सहायता और छायादार रास्तों की चाक-चौबंद व्यवस्था की गई थी।
वहीं उज्जैन में भी शिप्रा नदी के रामघाट और दत्त अखाड़ा घाट पर स्नान करने के बाद लाखों भक्त महाकाल लोक और गर्भगृह दर्शन के लिए उमड़े। सावन के समापन पर दोनों ही धार्मिक नगरियों में स्थानीय बाजारों, फूल-मालाओं की दुकानों और मिष्ठान प्रतिष्ठानों पर भारी चहल-पहल रही।
भगवान महाकाल को पहली राखी अर्पित होने और काशी विश्वनाथ में झूले पर विराजे देवाधिदेव के दर्शन के साथ ही पूरे देश में रक्षाबंधन का पावन पर्व अत्यंत उल्लास, भाई-बहन के प्रेम और आध्यात्मिक ऊर्जा के साथ मनाया जा रहा है।
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