नवरात्रि में कलश पर बोए गए जौ (जवारे) का क्या करें? विसर्जन के दौरान भूलकर भी न करें ये गलतियां, जानें सही नियम

नवरात्रि के पहले दिन कलश स्थापना के साथ मिट्टी के पात्र में जौ बोने की परंपरा सदियों पुरानी है। सनातन धर्म में जौ (यव) को सृष्टि की पहली फसल और अन्नपूर्णा का साक्षात रूप माना गया है। नवरात्रि के नौ दिनों में नियमित जल अर्पण और मंत्रोच्चार से अंकुरित हुए इन हरे-भरे जौ को ‘जवारे’ कहा जाता है। नवमी और दशमी तिथि पर जब माता की विदाई और व्रत का पारण होता है, तो सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि इन पवित्र जवारों का क्या किया जाए। कई बार अनजाने में या सही जानकारी न होने के कारण लोग इन्हें कचरे में डाल देते हैं या गलत जगह प्रवाहित कर देते हैं, जिससे जाने-अनजाने दोष लगता है। शास्त्रों के अनुसार जवारे मां दुर्गा का साक्षात प्रसाद होते हैं, जिनका सही उपयोग और आदरपूर्वक विसर्जन घर में साल भर सुख, शांति और बरकत बनाए रखता है।

पूजा और पारण के बाद जौ के पत्तों का क्या करें: अपनाएं ये पवित्र नियम

दशमी के दिन कलश विसर्जन से पहले मां भगवती की अंतिम आरती करें और फिर श्रद्धापूर्वक जवारों की भी पूजा करें। इसके बाद इन जवारों का उपयोग इन शुभ कार्यों के लिए करना चाहिए:

  • घर की तिजोरी और धन स्थान में रखें: जवारे के कुछ सबसे स्वस्थ और लंबे हरे पत्तों को तोड़कर साफ लाल या पीले कपड़े में लपेट लें। इसे अपनी तिजोरी, लॉकर या जहां आप धन और आभूषण रखते हैं, वहां रख दें। धार्मिक मान्यता है कि इससे घर में कभी अन्न-धन की कमी नहीं होती और आर्थिक तंगी दूर रहती है।

  • बड़ों के कानों और सिर पर धारण करवाएं: उत्तराखंड, हिमाचल, उत्तर प्रदेश और बिहार समेत कई राज्यों में नवरात्रि के बाद बड़े-बुजुर्गों को जवारे भेंट कर उनका आशीर्वाद लेने की परंपरा है। घर के सदस्य इसे अपने कानों के पीछे या सिर पर तिलक के साथ धारण करते हैं, जिसे दीर्घायु और आरोग्य का प्रतीक माना जाता है।

  • पुस्तकों और व्यापारिक बही-खातों में रखें: विद्यार्थियों को अपनी पढ़ाई की मुख्य किताबों में और व्यापारियों को अपनी तिजोरी व बही-खातों में जवारे के कुछ पत्ते जरूर रखने चाहिए। इससे मां सरस्वती और मां लक्ष्मी दोनों की कृपा बनी रहती है।

  • स्वास्थ्य लाभ (जवारे का रस): अगर आपने जवारे साफ-सुथरी जैविक मिट्टी में उगाए हैं, तो थोड़े से हरे पत्तों को पीसकर उसका रस निकालें और परिवार के सदस्यों को चरणामृत की तरह दें। मेडिकल साइंस में भी गेहूं और जौ के ज्वारे (Wheatgrass/Barley grass) को इम्युनिटी बढ़ाने और खून साफ करने वाला सुपरफूड माना गया है।

विसर्जन के दौरान भूलकर भी न करें ये गलतियां

जवारे केवल एक पौधा नहीं बल्कि नौ दिनों की अखंड साधना की ऊर्जा समेटे हुए होते हैं। इसलिए इनका विसर्जन करते समय इन गलतियों से पूरी तरह बचें:

  • कूड़ेदान या कचरे के ढेर में न फेंकें: कभी भी जवारे को बेकार समझकर डस्टबिन में न डालें। ऐसा करने से मां दुर्गा और अन्नपूर्णा का घोर अपमान माना जाता है, जिससे घर की बरकत रुक सकती है।

  • पैरों के नीचे आने वाली जगह पर न रखें: सूखे हुए जवारे या बची हुई मिट्टी को सड़क किनारे या ऐसी जगह न छोड़ें जहां लोगों के या जानवरों के पैर पड़ें।

  • प्लास्टिक बैग में बांधकर न छोड़ें: यदि आप जवारे को विसर्जित करने जा रहे हैं, तो उन्हें प्लास्टिक की थैली में बांधकर न फेंकें। यह पर्यावरण और धर्म दोनों के विरुद्ध है।

  • गंदे नाले या रुके हुए गंदे पानी में विसर्जन न करें: जवारे का विसर्जन केवल साफ और पवित्र जल में ही होना चाहिए।

जवारे विसर्जित करने का सबसे सही और शास्त्रसम्मत तरीका

यदि आपके शहर या गांव के पास कोई स्वच्छ नदी, नहर, तालाब या बहता हुआ साफ जलाशय है, तो जवारे को सम्मानपूर्वक जल में प्रवाहित करें। जल में छोड़ते समय हाथ जोड़कर मां दुर्गा से प्रार्थना करें कि वे परिवार के संकटों को हरें और अगले वर्ष पुनः पधारें।

यदि आसपास कोई नदी या जलाशय नहीं है या जल प्रदूषण से बचना चाहते हैं, तो सबसे उत्तम विकल्प है कि जवारे और उसकी मिट्टी को अपने घर के आंगन में लगे किसी पवित्र पेड़ जैसे पीपल, बरगद, शमी, आंवला या तुलसी के गमले की जड़ के पास साफ जगह पर अर्पित कर दें। यदि गमले में जगह है, तो इसे किसी साफ पौधे में मिट्टी के नीचे दबा दें, जहां किसी का पैर न लगे। कुछ ही दिनों में यह मिट्टी में मिलकर प्राकृतिक खाद बन जाएगा, जिससे पौधे को पोषण मिलेगा और जवारे का पूर्ण सम्मान भी सुरक्षित रहेगा।

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