
भाई-बहन के अटूट प्रेम और विश्वास का महापर्व रक्षाबंधन हर साल श्रावण मास की पूर्णिमा तिथि को अत्यंत हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। इस पावन अवसर पर बहनें अपने भाइयों की लंबी उम्र, सुख-समृद्धि और सुरक्षा की कामना करते हुए उनकी कलाई पर रक्षासूत्र बांधती हैं। हालांकि, जब भी पूर्णिमा तिथि पर चंद्र ग्रहण या भद्रा का साया पड़ता है, तो धार्मिक अनुष्ठानों और शुभ मुहूर्त को लेकर श्रद्धालुओं के मन में कई सवाल खड़े हो जाते हैं। इस बार भी रक्षाबंधन पर चंद्र ग्रहण की खगोलीय घटना को लेकर लोगों के बीच असमंजस की स्थिति बनी हुई है कि क्या ग्रहण के कारण राखी बांधने का समय बदलेगा और क्या भारत में सूतक काल के कड़े नियम लागू होंगे।
वैदिक ज्योतिष और धर्मशास्त्रों के अनुसार, किसी भी शुभ कार्य को करने से पहले ग्रहों की स्थिति, ग्रहण काल, भद्रा और चौघड़िया मुहूर्त का विशेष ध्यान रखा जाता है। रक्षाबंधन जैसे पवित्र पर्व पर ग्रहण का संयोग हमेशा से ज्योतिषियों और आम जनमानस के बीच गहरी चर्चा का विषय रहता है।
क्या भारत में मान्य होगा सूतक काल? जानिए धर्मशास्त्रों के नियम
ज्योतिष शास्त्र और हिंदू धर्मग्रंथों में यह स्पष्ट रूप से वर्णित है कि ग्रहण से जुड़ा कोई भी धार्मिक नियम, सूतक या पाबंदी केवल उसी भौगोलिक क्षेत्र में मान्य होती है, जहां वह ग्रहण नग्न आंखों से स्पष्ट रूप से दिखाई दे। शास्त्रों का स्पष्ट नियम है—’दृश्यं चेत फलम्’, अर्थात जो खगोलीय घटना हमारे भूभाग पर दिखाई देगी, उसी का धार्मिक व आध्यात्मिक प्रभाव जनजीवन पर पड़ेगा।
यदि चंद्र ग्रहण भारत के आकाश में दृश्यमान नहीं है, तो देश में सूतक काल के नियम बिल्कुल भी लागू नहीं होंगे। ऐसी स्थिति में मंदिरों के कपाट बंद नहीं किए जाते हैं, न ही भोजन पकाने या खाने पर कोई प्रतिबंध रहता है। बहनें बिना किसी हिचकिचाहट और भय के शुभ मुहूर्त में अपने भाइयों को राखी बांध सकती हैं। वहीं, यदि चंद्र ग्रहण भारत में आंशिक या पूर्ण रूप से दिखाई देता है, तो ग्रहण शुरू होने से ठीक 9 घंटे (तीन प्रहर) पहले सूतक काल प्रभावी हो जाता है। सूतक काल के दौरान किसी भी प्रकार के मांगलिक कार्य, पूजा-पाठ और शुभ अनुष्ठान वर्जित माने जाते हैं।
भद्रा काल और शुभ मुहूर्त का सटीक गणित
रक्षाबंधन के दिन ग्रहण के अलावा सबसे बड़ा विचार ‘भद्रा’ का किया जाता है। पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भद्रा भगवान सूर्यदेव की पुत्री और न्याय के देवता शनिदेव की बहन हैं। भद्रा काल को अत्यंत उग्र और अशुभ माना गया है, जिसमें रक्षासूत्र बांधना पूरी तरह निषेध होता है। धार्मिक ग्रंथों में कहा गया है कि रावण की बहन शूर्पणखा ने उसे भद्रा काल में ही रक्षासूत्र बांधा था, जिसके परिणामस्वरूप रावण के पूरे कुल का विनाश हो गया था।
रक्षाबंधन के लिए सबसे उपयुक्त समय दोपहर का ‘अपराह्न काल’ माना जाता है। यदि अपराह्न काल में भद्रा का वास पाताल या स्वर्ग लोक में न होकर मृत्यु लोक (पृथ्वी) पर हो, तो उस समय राखी नहीं बांधी जाती। भद्रा समाप्त होने के बाद ही ‘प्रदोष काल’ या स्थिर लग्न में राखी बांधना सर्वोत्तम फलदायी होता है। इसलिए ग्रहण से ज्यादा ध्यान भद्रा की समय सीमा पर देना आवश्यक होता है, ताकि पूजा का पूरा पुण्य फल प्राप्त हो सके।
राखी बांधने की सही विधि और दिशा का महत्व
रक्षाबंधन का पर्व केवल धागा बांधने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक संपूर्ण वैदिक प्रक्रिया है। सही दिशा और विधि से किया गया रक्षाबंधन भाई और बहन दोनों के जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार करता है:
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दिशा का चयन: राखी बांधते समय भाई का मुख हमेशा पूर्व या उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) की दिशा में होना चाहिए। बहन को पश्चिम दिशा की ओर मुख करके बैठना चाहिए।
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सिर पर वस्त्र: भाई को कभी भी खाली सिर राखी नहीं बंधवानी चाहिए। सिर पर रुमाल, टोपी या कोई स्वच्छ वस्त्र अवश्य होना चाहिए।
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पूजा की थाली की तैयारी: थाली में कुमकुम, अक्षत (अखंडित चावल), चंदन, दीपक, मिठाई, नारियल (श्रीफल) और शुद्ध रेशम का रक्षासूत्र रखें।
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तिलक और आरती: सबसे पहले भाई के माथे पर कुमकुम और चंदन का तिलक लगाएं, फिर अक्षत लगाएं। इसके बाद दाहिने हाथ की कलाई पर तीन गांठें लगाते हुए रक्षासूत्र बांधें। यह तीन गांठें ब्रह्मा, विष्णु और महेश के आशीर्वाद का प्रतीक होती हैं।
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आरती और मिष्ठान: रक्षासूत्र बांधने के बाद भाई की आरती उतारें, नजर उतारें और उसे मिष्ठान खिलाकर दीर्घायु व उन्नति की मंगलकामना करें। इसके बाद भाई को बहन के चरण स्पर्श कर या आशीर्वाद देकर उपहार भेंट करना चाहिए।
ग्रहण और सूतक की स्थिति में क्या करें और क्या न करें
यदि किसी परिस्थिति में ग्रहण का प्रभाव क्षेत्र में बनता है, तो शास्त्रों में बताए गए इन नियमों का पालन करना अनिवार्य हो जाता है:
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ग्रहण शुरू होने से पहले ही भोजन, पीने के पानी, दूध और पके हुए खाद्य पदार्थों में तुलसी के पत्ते या कुशा घास डाल देनी चाहिए, जिससे उन पर नकारात्मक तरंगों का असर न हो।
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सूतक और ग्रहण के समय मूर्तियों को स्पर्श करने से बचें। केवल मानसिक जाप जैसे गायत्री मंत्र या महामृत्युंजय मंत्र का उच्चारण करें।
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गर्भवती महिलाओं को ग्रहण के दौरान विशेष सावधानी बरतनी चाहिए; उन्हें नुकीली वस्तुओं जैसे कैंची, चाकू या सुई के प्रयोग से बचना चाहिए और घर के अंदर ही रहना चाहिए।
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ग्रहण समाप्त (मोक्ष) होने के बाद पूरे घर में गंगाजल का छिड़काव करें, स्वयं स्नान करें और सामर्थ्य अनुसार जरूरतमंदों को अनाज, वस्त्र व तिल का दान करें।
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यदि सूतक काल समाप्त हो जाता है, तो शुद्धि स्नान के तुरंत बाद विधि-विधान से रक्षाबंधन का पर्व मनाया जा सकता है।
ज्योतिषाचार्यों का परामर्श और सकारात्मक दृष्टिकोण
देश के प्रमुख विद्वानों और ज्योतिषाचार्यों का मत है कि पर्व-त्योहारों को लेकर अनावश्यक भ्रम या भय में पड़ने के बजाय शास्त्रीय पंचांगों के प्रामाणिक मत को स्वीकार करना चाहिए। हिंदू धर्म में हर समस्या और काल-दोष का निवारण उपलब्ध है।
रक्षाबंधन का मूल तत्व निस्वार्थ प्रेम, समर्पण और रक्षा का संकल्प है। जब शुभ मुहूर्त, शुद्ध मन और पवित्र संकल्प के साथ रक्षासूत्र बांधा जाता है, तो वह समस्त नकारात्मक शक्तियों और विघ्न-बाधाओं से रक्षा करने वाला अभेद्य कवच बन जाता है। इसलिए ग्रहण और भद्रा के समय की सटीक जानकारी लेकर निर्धारित शुभ वेला में ही उत्सव मनाना शास्त्रसम्मत और कल्याणकारी है।
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