आलू में निकलने लगे हैं सफेद अंकुर और पड़ने लगे हैं ढीले? इन आसान किचन हैक्स से महीनों तक रखें बिल्कुल फ्रेश

भारतीय खानपान में आलू को सब्जियों का राजा कहा जाता है। चाहे झटपट सूखी भुजिया बनानी हो, समोसे का मसाला तैयार करना हो या दाल के साथ कोई रसेदार सब्जी, आलू हर घर की बुनियादी जरूरत है। यही कारण है कि ज्यादातर लोग हफ्ते या पखवाड़े भर के लिए इकट्ठा 5 से 10 किलो आलू खरीदकर स्टोर कर लेते हैं। लेकिन अक्सर कुछ ही दिनों में आलू की त्वचा सिकुड़ने लगती है, वह अंदर से पिलपिला हो जाता है और उसकी सतह पर छोटी-छोटी सफेद या हरी कलियां यानी अंकुर (Sprouts) फूटने लगते हैं। कई लोग इसे मामूली बात समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, जबकि सच यह है कि अंकुरित आलू न सिर्फ अपना प्राकृतिक स्वाद और पोषक तत्व खो देता है, बल्कि अधिक अंकुर फूटने पर यह सेहत के लिए विषाक्त भी साबित हो सकता है। यदि आपको आलू को सही तापमान, रोशनी और वातावरण में रखने की वैज्ञानिक समझ हो, तो आप आलू को महीनों तक बिना एक भी अंकुर निकले बिल्कुल ताजा और कड़क बनाए रख सकते हैं।

अंकुरित और हरे आलू का खतरा: समझिए ‘सोलेनाइन’ का टॉक्सिक असर

आलू असल में पौधे का भूमिगत तना (Tuber) होता है। जब इसे गर्म, नम और रोशनी वाला वातावरण मिलता है, तो यह कुदरती रूप से नया पौधा उगाने की तैयारी करने लगता है और इसमें अंकुर फूटने लगते हैं। अंकुरण की प्रक्रिया शुरू होते ही आलू का स्टार्च शुगर में बदलने लगता है, जिससे आलू का स्वाद मीठा और बनावट रबड़ जैसी ढीली हो जाती है। इससे भी अधिक गंभीर बात यह है कि अंकुर फूटते समय और रोशनी के सीधे संपर्क में आने पर आलू के छिलके के नीचे ‘सोलेनाइन’ (Solanine) और ‘चैकोनाइन’ नाम के प्राकृतिक ग्लाइकोएल्कलॉइड्स टॉक्सिन बनने लगते हैं, जिसकी वजह से आलू कई बार हरा दिखने लगता है। यह हरापन और अंकुरित हिस्सा पेट में दर्द, उल्टी, दस्त, सिरदर्द और फूड पॉइजनिंग का कारण बन सकता है। हालांकि यदि अंकुर बहुत छोटे हैं और आलू कड़ा है, तो अंकुर और हरे हिस्से को गहराई से काटकर बाकी आलू का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन अत्यधिक अंकुरित और सिकुड़े हुए आलू को फेंक देना ही समझदारी है।

सेब का जादुई हैक: एथिलीन गैस से रुकेगा अंकुरण का प्रोसेस

आलू को अंकुरित होने से बचाने के लिए सबसे लोकप्रिय और आजमाया हुआ वैज्ञानिक तरीका है आलू की टोकरी में एक ताजा सेब (Apple) रख देना। कई फल पकते समय प्राकृतिक रूप से ‘एथिलीन’ (Ethylene) गैस छोड़ते हैं। सामान्य तौर पर एथिलीन गैस अन्य फलों को पकाने का काम करती है, लेकिन आलू के मामले में यह बिल्कुल उल्टा और चमत्कारी प्रभाव दिखाती है। नियंत्रित मात्रा में एथिलीन गैस आलू के कंदों में होने वाले सेल डिविजन और अंकुरण की जैविक प्रक्रिया को पूरी तरह सुस्त कर देती है। यदि आप आलू की डलिया या जूट के बोरे में बीच में एक सेब रख देते हैं, तो आलू की ‘नींद’ यानी डॉर्मेंसी बढ़ जाती है और उनमें हफ्तों तक आंखें या अंकुर नहीं निकलते। ध्यान रखें कि सेब सड़ने न पाए; अगर सेब ज्यादा पक जाए, तो उसे बदलकर दूसरा ताजा सेब रख दें।

प्याज और लहसुन से दूर रखना है सबसे बड़ा नियम

ज्यादातर भारतीय घरों की रसोई में यह आम गलती देखने को मिलती है कि लोग एक ही बड़ी टोकरी या रैक में नीचे आलू और ऊपर प्याज-लहसुन एक साथ भरकर रख देते हैं। यह आदत आलू को सबसे तेजी से सड़ाने और अंकुरित करने का काम करती है। प्याज में नमी की मात्रा काफी अधिक होती है और यह हवा में नमी के साथ-साथ ऐसी गैसें छोड़ता है जो आलू के अंकुरण को तेज गति से ट्रिगर करती हैं। इसके अलावा प्याज से निकलने वाली नमी आलू के छिलके को गीला कर देती है, जिससे आलू में फफूंद लगने और सड़न पैदा होने का खतरा कई गुना बढ़ जाता है। इसलिए हमेशा आलू और प्याज को रसोई के अलग-अलग कोनों में रखें। दोनों के बीच कम से कम कुछ फीट की दूरी बनाए रखना आलू की उम्र दोगुनी कर देता है।

अंधेरी, ठंडी और हवादार जगह: प्लास्टिक की पन्नियों से तुरंत करें तौबा

आलू को जिंदा और ताजा रखने के लिए सही वातावरण का चयन सबसे बुनियादी जरूरत है। आलू को कभी भी सीधी धूप या तेज ट्यूबलाइट की रोशनी में न रखें, क्योंकि प्रकाश मिलते ही क्लोरोफिल और सोलेनाइन का निर्माण शुरू हो जाता है और आलू हरा पड़ने लगता है। आलू के भंडारण के लिए आदर्श तापमान 7 से 10 डिग्री सेल्सियस माना जाता है, जो किसी अंधेरे, सूखे और ठंडे कमरे या कैबिनेट में आसानी से मिल जाता है। दूसरी महत्वपूर्ण बात यह है कि बाजार से जिस प्लास्टिक की पॉलिथीन में आलू आते हैं, उसे घर लाते ही तुरंत फाड़कर फेंक दें। प्लास्टिक के अंदर हवा का संचार रुक जाता है और पसीना (कंडेनसेशन) जमा होने लगता है जिससे आलू सड़ने लगते हैं। आलू को हमेशा खुली जालीदार डलिया, बांस की टोकरी, कागज के थैलों या जूट की बोरियों में ही फैलाकर रखें ताकि हवा आर-पार होती रहे।

फ्रिज में रखने की कभी न करें भूल: सेहत पर पड़ सकता है भारी

कई लोग आलू को अंकुरण से बचाने के चक्कर में सीधे फ्रिज के अंदर रख देते हैं, जो बहुत बड़ी और खतरनाक गलती है। सामान्य घरेलू फ्रिज का तापमान 2 से 4 डिग्री सेल्सियस के बीच होता है, जो आलू के लिए बहुत ज्यादा ठंडा है। अत्यधिक कम तापमान में आलू का सारा कॉम्प्लेक्स स्टार्च बहुत तेजी से रिड्यूसिंग शुगर में तब्दील हो जाता है, जिसे ‘कोल्ड-इंड्यूस्ड स्वीटनिंग’ कहा जाता है। जब इस तरह के ठंडे मीठे आलू को उच्च तापमान पर तला या पकाया जाता है (जैसे चिप्स, फ्रेंच फ्राइज या रोस्टिंग), तो शुगर और अमीनो एसिड मिलकर ‘एक्रिलामाइड’ (Acrylamide) नामक हानिकारक रासायनिक यौगिक बनाते हैं, जो स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक माना जाता है। इसके अलावा फ्रिज की नमी से आलू गीला होकर जल्दी पिलपिला भी हो जाता है।

भंडारण से पहले धोने की गलती न करें और खराब आलू को तुरंत छांटें

एक और जरूरी बात यह है कि जब आप बाजार से आलू लाएं, तो उस पर लगी सूखी मिट्टी को देखकर उसे पानी से धोने की गलती कभी न करें। गीले आलू को सुखाकर रखना बेहद मुश्किल होता है और छिलके पर रह गई हल्की सी नमी फंगस और बैक्टीरिया को बुलावा देती है। आलू को हमेशा बिना धोए ही स्टोर करें; मिट्टी को केवल सूखे कपड़े या हाथ से झाड़ लें और धोने का काम तभी करें जब आपको उसे पकाना हो। इसके साथ ही, हफ्ते में एक बार अपनी आलू की टोकरी का मुआयना जरूर करें। यदि कोई एक भी आलू बीच में से नरम पड़ गया हो, उसमें बदबू आ रही हो या वह सड़ने लगा हो, तो उसे तुरंत बाकी आलुओं से अलग कर दें। सड़ा हुआ आलू तेजी से बैक्टीरिया फैलाकर पूरी टोकरी को खराब कर सकता है। इन छोटे-छोटे और वैज्ञानिक तरीकों को अपनाकर आप आलू को 2 से 3 महीने तक बिल्कुल नया, क्रिस्पी और अंकुर-मुक्त बनाए रख सकते हैं।

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