नई दिल्ली: सोशल मीडिया के डिजिटल स्क्रीन से शुरू होकर देश की सड़कों पर तहलका मचाने वाला ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ (CJP) आंदोलन अब देश की सबसे बड़ी सियासी बिसात पर भी छा गया है। देश की मुख्यधारा की राजनीति में इस नए आंदोलन ने ऐसी हलचल मचाई है कि विपक्षी खेमा भी इसे नजरअंदाज नहीं कर पा रहा है। सोमवार को देश की राजधानी दिल्ली में हुई विपक्षी ‘इंडिया’ (INDIA) गठबंधन की एक बेहद अहम और हाई-प्रोफाइल बैठक में पेपर लीक जैसे गंभीर मुद्दों के साथ-साथ CJP पर भी जमकर माथापच्ची हुई। हैरान करने वाली बात यह रही कि CJP का मुद्दा इस बैठक के आधिकारिक एजेंडे में दूर-दूर तक शामिल नहीं था, इसके बावजूद ढाई घंटे की इस मीटिंग में यह नवोदित संगठन ही चर्चा के केंद्र बिंदु में बना रहा।
ढाई घंटे की बैठक और CJP पर महामंथन
सूत्रों से मिली पुख्ता जानकारी के मुताबिक, दिल्ली में जुटे 23 विपक्षी दलों के दिग्गजों के बीच करीब ढाई घंटे तक देश के ताजा हालातों पर रणनीतियां बनती रहीं। इस दौरान कई वरिष्ठ नेताओं ने युवाओं में बढ़ती नाराजगी, प्रतियोगी परीक्षाओं में लगातार हो रही गड़बड़ियों और बेरोजगारी के गंभीर मुद्दों को पुरजोर तरीके से उठाया। इसी चर्चा के बीच बार-बार कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) का जिक्र आया। विपक्षी खेमे के कई बड़े चेहरों ने इस बात को खुले दिल से स्वीकार किया कि बहुत ही कम समय के भीतर इस संगठन ने देश के युवाओं और छात्रों के बीच अपनी एक बहुत मजबूत और गहरी पैठ बना ली है।
CJP के बढ़ते कद से कुछ विपक्षी दलों में क्यों है खलबली?
जहां एक तरफ इस आंदोलन को युवाओं का साथ मिल रहा है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी गठबंधन के ही कुछ नेताओं ने इस नए मंच के उभार को लेकर अपनी गहरी चिंता और आशंकाएं भी जाहिर कीं। बैठक के दौरान कुछ दलों का मानना था कि सोशल मीडिया पर गजब की पकड़ रखने वाला यह आंदोलन कहीं पर्दे के पीछे से किसी छिपे हुए राजनीतिक मकसद या अजेंडे से तो प्रेरित नहीं है? इसके अलावा कुछ नेताओं ने आत्ममंथन वाले लहजे में यह बड़ा सवाल भी दाग दिया कि जिन जनहित के मुद्दों पर पारंपरिक विपक्षी दल बरसों से सड़कों पर संघर्ष कर रहे हैं, आखिर वहां CJP जैसी नई ताकतें इतनी आसानी से युवाओं का ध्यान अपनी तरफ खींचने में कैसे कामयाब हो रही हैं?
उमर अब्दुल्ला और ममता बनर्जी ने खोला CJP के लिए दिल
इन तमाम आशंकाओं और मतभेदों के बीच, विपक्षी गठबंधन के कई सबसे कद्दावर और बड़े नेताओं ने इस युवा आंदोलन को बेहद सकारात्मक और खुले नजरिये से देखने की वकालत की। जम्मू-कश्मीर के कद्दावर नेता उमर अब्दुल्ला ने दो टूक शब्दों में कहा कि CJP निश्चित रूप से जमीनी स्तर पर कुछ सही कर रही है, तभी उसे ऐसा समर्थन मिल रहा है। उन्होंने बाकी विपक्षी दलों को बड़ी सलाह देते हुए कहा कि हमें इस संगठन और इसके नेतृत्व के साथ बातचीत का रास्ता हमेशा खुला रखना चाहिए।
पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने भी उमर अब्दुल्ला की इस सोच का पुरजोर समर्थन किया। ममता बनर्जी ने साफ कहा कि राजनीतिक दल अपनी चुनावी और सियासी लड़ाई अपने स्तर पर लड़ते रहेंगे, लेकिन देश में स्वतंत्र और सीधे जनता से जुड़े आंदोलनों को भी हमेशा बढ़ावा मिलना चाहिए।
उद्धव ठाकरे ने की अभिजीत दिपके की तारीफ
इस हाई-लेवल मीटिंग में वर्चुअली (वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए) जुड़े शिवसेना (यूबीटी) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने भी CJP के पक्ष में अपनी बात रखी। उन्होंने CJP के चीफ अभिजीत दिपके के प्रयासों को सराहते हुए कहा कि एक जीवंत लोकतंत्र में असहमति, नाराजगी और विरोध जताने के लिए हमेशा जगह होनी चाहिए और युवाओं की इस आवाज को सुना जाना जरूरी है।
राजनीतिक एजेंडा नहीं, युवाओं का गुस्सा है CJP
बैठक के आखिरी दौर में इस बात पर भी विस्तार से चर्चा हुई कि आखिर CJP का देश की राजनीति में इतनी तेजी से उदय होने की असली वजह क्या है? वहां मौजूद अधिकांश नेताओं की एक राय थी कि यह किसी सुनियोजित राजनीतिक एजेंडे या किसी बड़ी पार्टी की साजिश का नतीजा नहीं है, बल्कि यह आज के युवाओं और छात्रों के भीतर सिस्टम के खिलाफ बढ़ रही गहरी नाराजगी, लाचारी और निराशा की एक स्वाभाविक अभिव्यक्ति है। सीपीआई लिबरेशन के महासचिव दीपांकर भट्टाचार्य ने भी इस आंदोलन को लेकर भविष्य के लिए एक नई उम्मीद जताई, हालांकि कुछ छोटे क्षेत्रीय दलों ने इस आंदोलन के भविष्य और इसकी दिशा को लेकर अपनी पुरानी आशंकाएं बैठक के अंत तक बनाए रखीं।
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