तमिलनाडु के मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय (थलापति विजय) की हालिया करूर यात्रा के बाद राज्य की राजनीतिक गलियारों में भारी उबाल आ गया है। पिछले साल सितंबर में विजय की रैली के दौरान मची भीषण भगदड़ में मारे गए लोगों के परिवारों से मिलने पहुंचे मुख्यमंत्री ने तत्कालीन डीएमके सरकार पर गंभीर साजिश रचने के आरोप लगाए थे। अब इन आरोपों पर सत्तारूढ़ डीएमके (DMK) ने बेहद आक्रामक रुख अपनाते हुए प्रेस कॉन्फ्रेंस की है और थलपति विजय पर झूठा प्रचार करने व जनता को मूर्ख समझने का सीधा आरोप मढ़ दिया है।
10 महीने बाद करूर पहुंचे मुख्यमंत्री विजय ने किए बड़े एलान
गौरतलब है कि 27 सितंबर 2025 को थलपति विजय की राजनीतिक रैली के दौरान करूर में एक दर्दनाक भगदड़ मच गई थी, जिसमें 41 मासूम लोगों की जान चली गई थी। इस हादसे के करीब 10 महीने बाद मुख्यमंत्री के तौर पर करूर पहुंचे विजय ने पीड़ित परिवारों के लिए सरकारी नौकरियों और मृतकों की याद में एक भव्य मेमोरियल (स्मारक) बनाने समेत कई लोकलुभावन एलान किए। इसके साथ ही उन्होंने तत्कालीन डीएमके प्रशासन को इस हादसे के लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया।
‘भीड़ बढ़ाने के चक्कर में खुद देरी से आए विजय’- डीएमके का पलटवार
डीएमके के वरिष्ठ नेता टी. के. एस. इलंगोवन ने मुख्यमंत्री विजय के ‘साजिश वाले दावों’ को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि इस हादसे के असली गुनहगार खुद विजय और उनकी पार्टी के लोग हैं।
डीएमके का तीखा आरोप: “करूर में कोई साजिश नहीं रची गई थी। रैली दोपहर की थी, लेकिन थलपति विजय जानबूझकर भीड़ को और ज्यादा इकट्ठा करने के चक्कर में शाम 7:30 बजे पहुंचे। भीषण गर्मी और तेज धूप में बिना खाना-पानी के घंटों बैठे रहने से लोग पहले ही बेहोश होने लगे थे। एक सामान्य समझ रखने वाला व्यक्ति भी जानता है कि ऐसी स्थिति में क्या परिणाम होंगे।”
‘बेहोश लोगों की मदद करने के बजाय उनके ऊपर से गुजरे कार्यकर्ता’
डीएमके नेता ने रैली के खौफनाक मंजर का जिक्र करते हुए कहा कि विजय को अच्छी तरह पता था कि मैदान में लोग बेहोश हो रहे हैं, लेकिन फिर भी उन्होंने अपना कार्यक्रम नहीं रोका। जैसे ही विजय की एंट्री हुई, उनके प्रशंसक और टीवीके (TVK) कार्यकर्ता अपने नेता की एक झलक पाने के लिए बेकाबू हो गए। वे जमीन पर गिरे और बेहोश पड़े लोगों की मदद करने के बजाय उनके ऊपर पैर रखकर आगे बढ़ने लगे। इलंगोवन ने कहा कि तत्कालीन सरकार ने तुरंत डॉक्टरों की आपातकालीन टीमें भेजकर 100 से अधिक लोगों की जान बचाई, लेकिन बेहद दुखद रूप से 41 लोगों को नहीं बचाया जा सका।
दोनों पक्षों के बीच क्या है असली विवाद?
आरोपों की जंग: करूर भगदड़ को लेकर दोनों ही पार्टियों के अपने-अपने दावे हैं:
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डीएमके का पक्ष: विजय और उनकी पार्टी ने अपनी सियासी ताकत दिखाने और भारी भीड़ की तस्वीरें खिंचवाने के लिए जानबूझकर कार्यक्रम में घंटों की देरी की, जिसके चलते यह भयावह हादसा हुआ। इतनी बड़ी अनियंत्रित भीड़ के लिए तुरंत भारी पुलिस बल तैनात करना मुमकिन नहीं था।
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मुख्यमंत्री विजय का पक्ष: तत्कालीन डीएमके सरकार ने राजनीतिक द्वेष के चलते जानबूझकर रैली स्थल पर सुरक्षा व्यवस्था बेहद लचर रखी और पर्याप्त पुलिस बल नहीं भेजा। अगर सरकार सुरक्षा की गारंटी नहीं दे सकती थी, तो उन्हें रैली की अनुमति (परमिशन) ही नहीं देनी चाहिए थी। इजाजत देकर सुरक्षा न देना विपक्ष की सोची-समझी साजिश थी।
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