देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) में शुक्रवार को उस समय एक बेहद हैरान करने वाला और तनावपूर्ण वाकया सामने आया, जब एक याचिकाकर्ता ने मर्यादा की सारी हदें पार कर दीं। सुनवाई के दौरान शख्स ने न सिर्फ जजों की बेंच के सामने कोर्ट के कागजात हवा में उछाल दिए, बल्कि देश के मुख्य न्यायाधीश (CJI) के खिलाफ बेहद आपत्तिजनक और अभद्र भाषा का इस्तेमाल भी किया। इस हंगामे के बाद भी सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने अद्भुत संयम का परिचय देते हुए आरोपी के खिलाफ कोई भी दंडात्मक कार्रवाई (ऐक्शन) करने से इनकार कर दिया और उसे माफ कर दिया।
‘न्यायिक सेवक महोदय, मैं आपको आदेश देता हूँ…’
यह पूरा घटनाक्रम जस्टिस के वी विश्वनाथन और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ के समक्ष हुआ। याचिकाकर्ता प्रबल प्रताप इलाहाबाद हाई कोर्ट से अपनी रिट याचिका खारिज होने के बाद ‘पिटीशनर-इन-पर्सन’ (खुद पैरवी करने वाले) के तौर पर सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। मामला भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा $173(4)$ से जुड़ा था।
जैसे ही मामले की सुनवाई शुरू हुई, याचिकाकर्ता ने मर्यादा लांघते हुए जजों से कहा, “न्यायिक सेवक महोदय, मैं आपको आदेश देता हूं कि आप लखनऊ के विकास नगर के सहायक पुलिस आयुक्त (ACP) के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने का निर्देश जारी करें।” इस पर अचरज जताते हुए जस्टिस विश्वनाथन ने पूछा, “क्या आप हमें आदेश दे रहे हैं?”
कागजात फाड़कर हवा में उछाले, सुरक्षाकर्मियों ने किया काबू
अदालत कक्ष में बवाल: न्यायाधीश के इतना पूछते ही याचिकाकर्ता अचानक अपना आपा खो बैठा। उसने बिना किसी उकसावे के अपने हाथ में पकड़े मुकदमे के सारे दस्तावेज फाड़कर जजों की पीठ की तरफ हवा में उछाल दिए और सीजेआई के खिलाफ बेहद असंसदीय और गाली-गलौज वाली भाषा का इस्तेमाल शुरू कर दिया। कोर्ट रूम में अफरा-तफरी मचते ही वहां मुस्तैद सुरक्षाकर्मियों (Security Personnel) ने तुरंत मोर्चा संभाला और हंगामा कर रहे शख्स को अपने नियंत्रण में लेकर अदालत कक्ष से बाहर कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने क्यों नहीं लिया कोई ऐक्शन?
अदालत कक्ष से याचिकाकर्ता को बाहर निकाले जाने के बाद पीठ ने इस पूरे आक्रोश पर बेहद शांत रुख अपनाया। कोर्ट ने मामले की गंभीरता और आरोपी की मानसिक व शारीरिक स्थिति को भांपते हुए अपने लिखित आदेश में कहा:
“जब यह मामला विचार के लिए आया, तो दोनों याचिकाकर्ताओं की ओर से खुद पेश हुए मिस्टर प्रबल प्रताप ने केस पर कानूनी बहस करने के बजाय पूरी तरह से बेतुकी और असंसदीय बातें कहीं। हालांकि, याचिकाकर्ता की वर्तमान मानसिक व व्यावहारिक हालत को देखते हुए, हम उनके खिलाफ कोई दंडात्मक ऐक्शन (मानहानि की कार्रवाई) लेने का प्रस्ताव नहीं रखते हैं।”
इसके साथ ही, अदालत ने मामले के मेरिट (गुण-दोष) पर विचार करते हुए कहा कि उन्हें इलाहाबाद हाई कोर्ट के फैसले में दखल देने का कोई कानूनी आधार नजर नहीं आता। लिहाजा, सुप्रीम कोर्ट ने शख्स की स्पेशल लीव पिटीशन (SLP) को पूरी तरह खारिज कर दिया और पेंडिंग आवेदनों का भी निपटारा कर दिया। इस हंगामे के शांत होने के बाद कोर्ट ने अपनी नियमित कार्यसूची के तहत बाकी मुकदमों की सुनवाई दोबारा शुरू की।
Shashwat Lokwarta – State News,Up News देश-दुनिया