श्रीमद्भगवद्गीता का ज्ञान केवल दार्शनिक बातें नहीं हैं, बल्कि यह हमारे रोजमर्रा के जीवन और मानसिक तनाव को प्रबंधित करने का सबसे आधुनिक प्रैक्टिकल गाइड है। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता के श्लोकों में प्रकृति और जीवों के छोटे-छोटे उदाहरणों से मनुष्य को मन पर काबू पाना सिखाया है।
अक्सर हम अपनी असीमित इच्छाओं और चंचल मन के कारण अशांत रहते हैं। आज के ‘सुविचार’ (Quote of the Day) में आइए जानते हैं कि श्रीकृष्ण ने एक छोटे से जीव यानी ‘कछुए’ के माध्यम से इच्छाओं और इंद्रियों को नियंत्रित करने का क्या अद्भुत मंत्र दिया है।
कछुए से क्या सीखना चाहिए? (भगवद्गीता श्लोक और अर्थ)
यदा संहरते चायं कूर्मोऽङ्गानीव सर्वशः।
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थेभ्यस्तस्य प्रज्ञा प्रतिष्ठिता॥
अर्थ और जीवन की सीख:
इस श्लोक में कछुए (कूर्म) का बेहद खूबसूरत उदाहरण दिया गया है। जब कछुआ चलता है, तो उसके चारों पैर, पूंछ और सिर बाहर दिखाई देते हैं। लेकिन जैसे ही उसे किसी खतरे का आभास होता है या जब वह विश्राम की अवस्था में बैठता है, तो वह अपने सभी अंगों को तुरंत अपनी कठोर पीठ (कवच) के भीतर समेट लेता है। तब देखने वाले को यह पता भी नहीं चलता कि वह कोई जीव है या महज़ एक शांत पत्थर।
श्रीकृष्ण कहते हैं कि मनुष्य का मन और उसकी इंद्रियां भी कछुए की तरह होनी चाहिए। जब भी सांसारिक भोग, वासनाएं या चंचलता आपको भटकाने की कोशिश करें, तो अपनी इंद्रियों को कछुए की तरह अंदर खींच लें।
क्या आप ‘स्थितप्रज्ञ’ हैं? जानिए इसका असली मतलब
जब तक मनुष्य की पांचों इंद्रियां (आंख, नाक, कान, जीभ, त्वचा) और उसका मन बाहरी विषयों में उलझा रहेगा, वह कभी भी ‘स्थितप्रज्ञ’ नहीं बन सकता।
-
स्थितप्रज्ञ का अर्थ: वह व्यक्ति जो सुख मिलने पर अत्यधिक अहंकारी या हर्षित नहीं होता, और दुख आने पर अवसाद या निराशा में नहीं डूबता। जो हर परिस्थिति में शांत और तटस्थ रहता है, उसकी बुद्धि स्थिर हो जाती है और वह ईश्वर की सच्ची साधना में लीन हो पाता है।
अशांत मन को कभी नहीं मिल सकता सुख
नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना।
न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम्॥
‘अशान्तस्य कुतः सुखम्’ का गूढ़ रहस्य:
श्रीकृष्ण समझाते हैं कि जिस मनुष्य का मन और इंद्रियां उसके अपने वश में नहीं हैं, उसकी बुद्धि कभी भी स्थिर (निश्चयात्मक) नहीं हो सकती। ऐसा असंयमित व्यक्ति हमेशा सांसारिक भोग-विलास, धन-दौलत, मान-सम्मान और संग्रह में ही अटका रहता है।
परिणामस्वरूप, उसका मन हर पल विचलित रहता है। यदि मन के भीतर लगातार इच्छाओं की हलचल मची हुई है, तो आंतरिक शांति का मिलना नामुमकिन है। श्रीकृष्ण अर्जुन से पूछते हैं कि “जो मनुष्य भीतर से अशांत है, उसे सुख कैसे मिल सकता है?”
बाहर से आपको दुनिया की तमाम सुख-सुविधाएं, ऐशो-आराम और अनुकूल साधन मिल जाएं, लेकिन अगर आपका अंतर्मन अशांत है, तो सब कुछ व्यर्थ है। बुद्धि स्थिर होगी तो ध्यान लगेगा, ध्यान लगेगा तो शांति मिलेगी, और जब शांति होगी, तभी जीवन में वास्तविक सुख का उदय होगा।
Shashwat Lokwarta – State News,Up News देश-दुनिया