
अगस्त के महीने में देश के ज्यादातर इलाकों में मानसून की बारिश के साथ ही वातावरण में नमी यानी आर्द्रता (Humidity) का स्तर 80 से 90 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। ऐसे में तापमान भले ही बहुत ज्यादा न हो, लेकिन शरीर से निकलने वाला पसीना आसानी से नहीं सूखता और हर समय चिपचिपाहट महसूस होती है। इस चिपचिपी गर्मी से राहत पाने के लिए बहुत से लोग अपने बेडरूम में रातभर तेज रफ्तार में एयर कूलर चलाकर सो जाते हैं। उन्हें लगता है कि कूलर की ठंडी हवा से रात को अच्छी नींद आएगी, लेकिन हकीकत इसके बिल्कुल उलट होती है। इस मौसम में कूलर चलाने की यह जिद सेहत के लिए एक धीमी बीमारी की तरह काम करती है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखें तो एयर कूलर वाष्पीकरण की प्रक्रिया (Evaporative Cooling) पर काम करता है। कूलर की मोटर जब पानी की घास या पैड्स पर पानी फेंकती है, तो बाहर की गर्म हवा उस पानी को सोखकर कमरे में ठंडी और नम हवा भेजती है। लेकिन अगस्त और मानसून के मौसम में जब हवा में पहले से ही पानी का वाष्प भरपूर मात्रा में मौजूद होता है, तब कूलर की हवा हवा में नमी सोखने के बजाय कमरे में और अधिक पानी का वाष्प भर देती है। इसका परिणाम यह होता है कि कमरा ठंडा होने के बजाय एक सीलन भरे नम कमरे (Damp Room) में तब्दील हो जाता है, जो सेहत पर बेहद प्रतिकूल प्रभाव डालता है।
जोड़ों का दर्द, मांसपेशियों में अकड़न और अर्थराइटिस की समस्या
यदि आप बारिश या उमस के मौसम में रातभर कूलर की सीधी हवा में सोते हैं, तो इसका सबसे पहला और गंभीर असर आपके जोड़ों और मांसपेशियों पर पड़ता है। स्वास्थ्य विशेषज्ञों के अनुसार, वातावरण में अत्यधिक नमी और कूलर से आने वाली ठंडी-नम हवा शरीर के तापमान को असंतुलित कर देती है। रात के समय जब शरीर का मेटाबॉलिज्म धीमा होता है, उस दौरान कूलर की सीधी हवा हड्डियों और जोड़ों के भीतर की मांसपेशियों में खिंचाव पैदा करती है।
यही कारण है कि सुबह उठने पर अक्सर लोगों को गर्दन में अकड़न, पीठ दर्द, कमर में जकड़न और घुटनों में तेज दर्द की शिकायत होती है। जिन लोगों को पहले से ही साइटिका, ऑस्टियोआर्थराइटिस या रूमेटाइड अर्थराइटिस की समस्या है, उनके लिए यह आदत बेहद खतरनाक साबित हो सकती है। लंबे समय तक नम हवा के संपर्क में रहने से नसों में सूजन आ सकती है, जिससे दर्द की तीव्रता कई गुना बढ़ जाती है।
सांस की बीमारी, अस्थमा, साइनस और सीने में कफ का जमाव
कूलर से निकलने वाली अतिरिक्त नमी सांस के जरिए फेफड़ों तक पहुंचती है, जो श्वसन तंत्र (Respiratory System) से जुड़ी बीमारियों के लिए सबसे बड़ा उत्प्रेरक बनती है। हवा में नमी का स्तर ज्यादा होने पर सांस की नलिकाएं सिकुड़ने लगती हैं। जिन लोगों को धूल, एलर्जी, साइनस या अस्थमा (दमा) की शिकायत है, उनके लिए रातभर कूलर चलाकर सोना किसी आफत से कम नहीं है।
अत्यधिक नमी के कारण रात के समय फेफड़ों में बलगम (कफ) जमा होने लगता है, जिससे सुबह उठते ही लगातार छींकें आना, नाक बंद होना, गले में खराश और सीने में भारीपन महसूस होता है। बच्चों और बुजुर्गों में यह स्थिति जल्द ही निमोनिया और ब्रोंकाइटिस जैसी गंभीर बीमारियों का रूप ले लेती है। डॉक्टरों का मानना है कि मानसून के दौरान सांस से जुड़ी बीमारियों के मरीजों में से 40 प्रतिशत से अधिक मामले गलत तरीके से एयर कूलर का इस्तेमाल करने की वजह से सामने आते हैं।
कूलर के पानी और घास में पनपने वाले बैक्टीरिया और फंगस का खतरा
मानसून का मौसम बैक्टीरिया, वायरस और फंगस (फफूंदी) के पनपने के लिए सबसे मुफीद माहौल माना जाता है। कूलर के भीतर हफ्तों तक जमा रहने वाला पानी और लगातार गीली रहने वाली घास या हनीकॉम्ब पैड्स फंगल बीजाणुओं (Fungal Spores) का घर बन जाते हैं। जब कूलर पंखा चलाता है, तो पानी की सूक्ष्म बूंदों के साथ ये सूक्ष्म फंगस और बैक्टीरिया पूरे कमरे की हवा में तैरने लगते हैं।
जब आप सो रहे होते हैं, तब ये हानिकारक बीजाणु आपकी सांस के साथ फेफड़ों और त्वचा तक पहुंच जाते हैं। इससे त्वचा पर खुजली, रैशेज, एथलीट फुट और फंगल इंफेक्शन का खतरा बढ़ जाता है। इसके अलावा, ठहरे हुए पानी में ‘लेजियोनेला’ (Legionella) नाम का खतरनाक बैक्टीरिया पनप सकता है, जो सांस से जुड़ी एक गंभीर बीमारी ‘लेजियोनेयर्स डिजीज’ का कारण बनता है। साथ ही, कूलर की टंकी में रुका हुआ पानी डेंगू और मलेरिया के मच्छरों के प्रजनन के लिए सबसे मुफीद जगह बन जाता है।
बेडरूम में सीलन, नींद की खराबी और त्वचा का रूखापन
अत्यधिक नमी में कूलर चलाने से आपके शरीर को तो नुकसान पहुंचता ही है, साथ ही बेडरूम का माहौल भी पूरी तरह खराब हो जाता है। कमरे के गद्दे, चादर, तकिए और दीवारों में नमी समा जाती है, जिससे कमरे से एक अजीब सी दुर्गंध (सीलन की बदबू) आने लगती है। इस माहौल में शरीर से निकलने वाला पसीना वाष्पित नहीं हो पाता, जिससे शरीर का आंतरिक तापमान गिर नहीं पाता और व्यक्ति बार-बार करवटें बदलता रहता है। परिणामस्वरूप नींद पूरी नहीं होती और दिनभर चिड़चिड़ापन, सिरदर्द और थकान बनी रहती है।
इसके साथ ही, कई लोग सोचते हैं कि कूलर की हवा त्वचा को नमी देती है, लेकिन असल में नम हवा के बाद जब शरीर पर सीधा पंखा पड़ता है, तो त्वचा का प्राकृतिक प्राकृतिक मॉइस्चर छिन जाता है, जिससे त्वचा रूखी और बेजान होने लगती है।
अगर इस मौसम में कूलर चलाना ही पड़े तो किन बातों का रखें ध्यान?
यदि आपके घर में एसी नहीं है और अत्यधिक उमस के कारण कूलर चलाए बिना सोना संभव नहीं है, तो स्वास्थ्य विशेषज्ञों द्वारा बताए गए इन सुरक्षा उपायों को अपनाकर आप बीमारियों से बच सकते हैं। सबसे पहला और महत्वपूर्ण नियम यह है कि मानसून या अगस्त के महीने में कूलर का ‘वाटर पंप’ (Water Pump) बंद रखें। कूलर को केवल फैन यानी पंखे के मोड पर चलाएं ताकि हवा में अतिरिक्त पानी की बूंदें न मिलें।
इसके अलावा, कमरे में क्रॉस वेंटिलेशन (Cross Ventilation) का होना बेहद जरूरी है। जिस कमरे में कूलर चल रहा हो, उसकी कम से कम एक खिड़की या दरवाजा हमेशा खुला रखें ताकि बाहर की हवा का दबाव बना रहे और अंदर नमी जमा न हो। कूलर का पानी हर दो से तीन दिन में पूरी तरह खाली करके टंकी की सफाई करें और उसमें नीम की पत्तियां या थोड़ा सा कीटाणुनाशक (जैसे डेटॉल या फिनाइल) डालें। कूलर की हवा कभी भी अपने मुंह या शरीर पर सीधे न पड़ने दें; हवा का रुख हमेशा छत या दीवार की तरफ रखें ताकि कमरा अप्रत्यक्ष रूप से ठंडा हो। इन सावधानियों को अपनाकर आप इस मौसम में खुद को और अपने परिवार को गंभीर बीमारियों से सुरक्षित रख सकते हैं।
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