
नई दिल्ली की अति-सुरक्षित तिहाड़ जेल की सलाखों के पीछे आजीवन कारावास की सजा काट रहे प्रतिबंधित संगठन जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट (जेकेएलएफ) के पूर्व कमांडर यासीन मलिक ने एक ऐसा सनसनीखेज कानूनी कदम उठाया है, जिसने जम्मू-कश्मीर से लेकर राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली तक के कानूनी और खुफिया हलकों में हलचल मचा दी है। तीन दशकों से अधिक समय पहले कश्मीर घाटी में आतंकवाद के चरम दौर के दौरान हुई कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट की नृशंस हत्या के मामले में खुद को आरोपी बनाए जाने के बाद यासीन मलिक ने श्रीनगर की अतिरिक्त सत्र अदालत में 25 पन्नों का एक विस्तृत हलफनामा दाखिल किया है। इस हलफनामे में उसने न केवल अदालत से खुद के लिए सीधे फांसी की सजा मुकर्रर करने की मांग की है, बल्कि यह भी ऐलान कर दिया है कि वह इस मौत की सजा के खिलाफ कोई कानूनी अपील तक नहीं करेगा। इसके साथ ही उसने अपनी पाकिस्तानी पत्नी मुशाल हुसैन मलिक को इस रिश्ते से आजाद करने यानी तलाक देने का फैसला भी सार्वजनिक किया है।
34 साल बाद सरला भट हत्याकांड में चार्जशीट: एसआईए के एक्शन से क्यों बौखलाया यासीन मलिक?
इस पूरे नाटकीय मोड़ की जड़ें 19 अप्रैल 1990 की उस खौफनाक वारदात से जुड़ी हैं, जब श्रीनगर के सौरा स्थित शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (SKIMS) में कार्यरत युवा कश्मीरी पंडित नर्स सरला भट का आतंकियों ने अपहरण कर लिया था। आतंकियों ने उन पर सुरक्षा बलों के लिए मुखबिरी करने का झूठा आरोप मढ़ा और कई दिनों तक अमानवीय यातनाएं देने के बाद गोलियों से भूनकर उनका क्षत-विक्षत शव सड़क पर फेंक दिया था। यह वह दौर था जब घाटी से कश्मीरी हिंदुओं का खूनी पलायन अपने चरम पर था।
दशकों तक ठंडे बस्ते में पड़े रहे इस केस की फाइल को जम्मू-कश्मीर की राज्य जांच एजेंसी (SIA) ने नए सिरे से खोला। गहन जांच और पुराने गवाहों व बयानों की कड़ियों को जोड़ने के बाद एसआईए ने 29 जून को श्रीनगर की विशेष अदालत में एक विस्तृत चार्जशीट दाखिल की, जिसमें यासीन मलिक को सरला भट के अपहरण और नृशंस हत्याकांड का मुख्य साजिशकर्ता और आरोपी बनाया गया। तीन दशक से ज्यादा समय बीत जाने के बाद इस जघन्य अपराध में औपचारिक चार्जशीट दाखिल होना यासीन मलिक के लिए सबसे बड़ा कानूनी झटका साबित हुआ। आतंकवाद के उन पुराने काले पन्नों का दोबारा खुलना ही उसकी इस बौखलाहट और तथाकथित ‘फांसी की गुहार’ की मुख्य वजह बना है।
‘मुझे अदालत से नहीं, सिस्टम से शिकायत’: 25 पन्नों के हलफनामे में क्या लिखा?
तिहाड़ जेल से श्रीनगर अदालत को भेजे गए अपने 25 पन्नों के पत्रनुमा हलफनामे में यासीन मलिक ने एक तरफ खुद को बेकसूर साबित करने का पुराना विक्टिम कार्ड खेला, तो दूसरी तरफ पूरी कानूनी प्रक्रिया पर सवाल खड़े किए। उसने लिखा कि घटना के 34 साल बाद उसे इस मामले में आरोपी बनाया जाना अकल्पनीय और हैरान करने वाला है। यासीन ने दावा किया कि 1990 के उस दौर में वह भूमिगत था और उसका इस नर्स की हत्या से कोई लेना-देना नहीं था।
हलफनामे में उसने लिखा, “मुझे न तो अदालत से कोई शिकायत है और न ही जांच एजेंसियों से कोई गिला है, लेकिन यह पूरी कवायद केवल राजनीतिक परिस्थितियों और पूर्व-निर्धारित फैसलों के तहत की जा रही है।” यासीन ने आगे लिखा कि यदि सरकार और जांच एजेंसियां उसे हर पुराने मामले में घसीटना चाहती हैं, तो लंबी अदालती सुनवाई का नाटक करने के बजाय उसे सीधे फांसी के फंदे पर लटका दिया जाए। उसने दो टूक शब्दों में कहा कि यदि अदालत उसे मृत्युदंड देती है, तो वह उसके खिलाफ किसी उच्च अदालत में अपील करने नहीं जाएगा। अलगाववादी नेता का यह बयान कानूनी विशेषज्ञों की नजर में सहानुभूति बटोरने और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय न्यायिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करने की सोची-समझी मनोवैज्ञानिक चाल नजर आता है।
‘पत्नी को विधवा बनाकर नहीं रख सकता’: 20 साल छोटी मुशाल मलिक को तलाक का फैसला
यासीन मलिक के इस हलफनामे का सबसे भावुक और चौंकाने वाला हिस्सा उसकी निजी जिंदगी से जुड़ा है। हलफनामे में उसने अपनी पाकिस्तानी मूल की पत्नी मुशाल हुसैन मलिक के साथ अपने वैवाहिक रिश्ते को औपचारिक रूप से समाप्त करने यानी तलाक देने का ऐलान किया है। यासीन मलिक ने साल 2009 में पाकिस्तान के एक रसूखदार परिवार से ताल्लुक रखने वाली मुशाल से निकाह किया था, जो उम्र में उससे करीब 20 साल छोटी हैं। मुशाल पाकिस्तान में पूर्व प्रधानमंत्री अनवारुल हक काकड़ की कार्यवाहक सरकार में मानवाधिकार मामलों पर विशेष सलाहकार भी रह चुकी हैं।
अपनी 12 वर्षीय बेटी रजिया सुल्ताना और पत्नी का जिक्र करते हुए यासीन ने लिखा कि वह तिहाड़ जेल में अनिश्चित भविष्य का सामना कर रहा है, जहां उसके सामने या तो ताउम्र जेल में सड़ने की मजबूरी है या फिर फांसी का फंदा। उसने लिखा, “मेरी पत्नी मुझसे 20 साल छोटी है। मैं नहीं चाहता कि वह मेरी बदकिस्मती और परिस्थितियों का बोझ अपनी पूरी जिंदगी ढोती रहे। मैं उसे एक जिंदा विधवा के रूप में तड़पते हुए नहीं देख सकता। इसलिए फांसी के तख्ते पर चढ़ने से पहले मैंने उसे निकाह के इस बंधन से हमेशा के लिए आजाद करने का फैसला किया है, ताकि वह सम्मान और उम्मीद के साथ अपनी जिंदगी का नया सफर शुरू कर सके।”
टेरर फंडिंग से लेकर एयरफोर्स जवानों की हत्या तक: यासीन के कानूनी शिकंजे का पूरा सच
यासीन मलिक की यह हताशा केवल सरला भट केस तक सीमित नहीं है, बल्कि उसके चारों तरफ कस चुका कानूनी शिकंजा ही उसकी असली बेचैनी का सबब है।
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टेरर फंडिंग केस में उम्रकैद: मई 2022 में दिल्ली की विशेष एनआईए अदालत ने कश्मीर में आतंकी गतिविधियों और पत्थरबाजी के लिए सीमा पार से फंडिंग जुटाने (यूएपीए) के मामले में यासीन मलिक को उम्रकैद की सजा सुनाई थी। राष्ट्रीय जांच एजेंसी (NIA) ने इस सजा को नाकाफी बताते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर कर रखी है, जिसमें यासीन को उम्रकैद के बदले फांसी की सजा देने की मांग की गई है। दिल्ली हाईकोर्ट में इस मामले की नियमित सुनवाई चल रही है।
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1990 एयरफोर्स जवानों का नरसंहार: 25 जनवरी 1990 को श्रीनगर के रावलपोरा में वायुसेना के निहत्थे जवानों पर अंधाधुंध फायरिंग कर स्क्वाड्रन लीडर रवि खन्ना समेत चार जवानों की हत्या करने का केस जम्मू की टाडा (TADA) कोर्ट में अंतिम चरण में है।
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रुबैया सईद अपहरण कांड: 1989 में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की बेटी रुबैया सईद का अपहरण कर आतंकियों को छुड़ाने के मामले में भी यासीन मलिक मुख्य आरोपी है और इस मामले में रुबैया सईद खुद अदालत में पेश होकर यासीन की शिनाख्त कर चुकी हैं।
कानूनी पैंतरा या मनोवैज्ञानिक दबाव? फांसी की मांग के पीछे का असली खेल
कानूनी और सुरक्षा मामलों के जानकारों का स्पष्ट मानना है कि यासीन मलिक का ‘मुझे फांसी दे दो’ का राग कोई आत्मसमर्पण नहीं, बल्कि एक बेहद शातिर कानूनी और राजनीतिक पैंतरा है। भारत के कानून में किसी भी आरोपी की अपनी इच्छा से फांसी दिए जाने का कोई प्रावधान नहीं है। भारतीय दंड संहिता और न्याय संहिता के तहत हर आरोपी का निष्पक्ष ट्रायल होता है, सबूतों और गवाहों की गवाही होती है और अपराध सिद्ध होने पर ही अदालत सजा तय करती है।
यासीन मलिक अच्छी तरह जानता है कि एनआईए की डेथ पेनल्टी याचिका और जम्मू में चल रहे टाडा के मामलों में उसके बचने की गुंजाइश बेहद कम है। ऐसे में अदालत से ‘मौत मांगने’ का नाटक रचकर वह कश्मीर घाटी के अलगाववादी समर्थकों और पाकिस्तान में बैठे अपने आकाओं के बीच खुद को एक ‘महान बलिदानी’ या ‘शहीद’ की छवि में ढालना चाहता है। वह दुनिया को यह दिखाना चाहता है कि भारत में उसके साथ इंसाफ नहीं हो रहा, ताकि अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मंचों पर भारत सरकार पर राजनयिक दबाव बनाया जा सके।
तिहाड़ जेल की तन्हाई बैरक में बंद यासीन मलिक के इस 25 पन्नों के हलफनामे ने एक बार फिर 90 के दशक में कश्मीर घाटी में बहे निर्दोषों के खून, कश्मीरी पंडितों के दर्दनाक पलायन और आतंकवाद की काली हकीकत को देश के सामने ला खड़ा किया है। अदालत अब कानून की तय सीमाओं में रहकर ही एसआईए की चार्जशीट और यासीन के बयानों पर आगे की कार्रवाई तय करेगी, लेकिन यह साफ है कि भारतीय न्याय व्यवस्था किसी भी मुजरिम को उसकी शर्तों पर नहीं, बल्कि संविधान और सबूतों की बुनियाद पर ही सजा मुकर्रर करेगी।
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