हल्द्वानी के ‘शुद्धिकरण’ विवाद से थर्राई सियासत: 2027 के महामुकाबले से पहले दलित वोट बैंक पर आर-पार, उत्तराखंड से लेकर यूपी और पंजाब तक भाजपा-कांग्रेस में छिड़ा घमासान

उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के प्रवेश द्वार कहे जाने वाले हल्द्वानी के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में हुए एक कथित ‘शुद्धिकरण’ अनुष्ठान ने देश की राजनीति में एक संवेदनशील और निर्णायक बहस को हवा दे दी है। कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे की जनसभा के कुछ दिनों बाद मैदान में कथित तौर पर गंगाजल छिड़कने और हवन कराने के मामले को कांग्रेस ने सीधे तौर पर ‘दलित अस्मिता’ और जातिगत अपमान से जोड़ दिया है। संसद के मानसून सत्र से लेकर सोशल मीडिया और सड़कों तक कांग्रेस इस मसले पर बेहद हमलावर मुद्रा में दिखाई दे रही है, वहीं नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी द्वारा इस घटना पर की गई टिप्पणियों के बाद उनके खिलाफ दर्ज कराई गई एफआईआर ने मामले को और अधिक गरमा दिया है।

राजनीतिक जानकारों का मानना है कि यह विवाद केवल एक मैदान की सफाई या धार्मिक अनुष्ठान तक सीमित नहीं है। साल 2027 में होने वाले विधानसभा चुनावों की बिसात अभी से बिछनी शुरू हो चुकी है, जिसमें उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे अहम राज्य शामिल हैं। इन तीनों ही राज्यों में दलित मतदाता चुनावी नतीजों को पूरी तरह पलटने का माद्दा रखते हैं। ऐसे नाजुक दौर में न तो सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और न ही मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस किसी भी कीमत पर दलित समुदाय के आक्रोश या नाराजगी का जोखिम मोल लेने की स्थिति में हैं। यही कारण है कि यह विवाद देहरादून से लेकर लखनऊ और चंडीगढ़ के सत्ता गलियारों में सबसे बड़ा एजेंडा बन चुका है।

उत्तराखंड का चुनावी गणित: 70 विधानसभा सीटें, 19 फीसदी दलित आबादी और सत्ता की 36 की जादुई चाबी

उत्तराखंड राज्य के चुनावी इतिहास का विश्लेषण करें तो यहां की 70 विधानसभा सीटों में से 13 सीटें अनुसूचित जाति (एससी) और 2 सीटें अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए आरक्षित हैं। 36 विधायकों के साधारण बहुमत से सरकार बनाने वाले इस पर्वतीय राज्य में एक-एक सीट की कीमत बेहद महत्वपूर्ण होती है। राज्य में दलित मतदाताओं की तादाद लगभग 17 से 19 प्रतिशत के बीच है।

साल 2012 के परिसीमन के बाद हुए चुनावों में भाजपा और कांग्रेस के बीच आरक्षित सीटों पर कड़ा मुकाबला देखा गया था, जहां बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने भी दो सुरक्षित सीटों पर कब्जा जमाया था। लेकिन 2017 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लहर में सियासी पासा पूरी तरह पलट गया और भाजपा ने 13 में से 11 एससी आरक्षित सीटें जीतकर प्रचंड बहुमत हासिल किया। हालांकि 2022 के विधानसभा चुनाव में भाजपा की आरक्षित सीटों की संख्या घटकर 9 रह गई, जबकि कांग्रेस ने वापसी के संकेत देते हुए कुछ सीटों पर अपनी स्थिति सुधारी।

लड़ाई सिर्फ 13 आरक्षित सीटों तक सीमित नहीं है। मैदानी जिलों जैसे हरिद्वार, उधम सिंह नगर और देहरादून की कई सामान्य सीटों पर भी दलित मतदाताओं का घनत्व काफी अधिक है। हरिद्वार और उधम सिंह नगर में दलित और मुस्लिम मतों का समीकरण करीब दो दर्जन सीटों के नतीजों को सीधे तौर पर प्रभावित करता है। यही वजह है कि कांग्रेस हल्द्वानी के मुद्दे को भुनाकर राज्य में ‘सामाजिक न्याय’ की नई लकीर खींचने की कोशिश कर रही है, ताकि 2027 में सत्ता में वापसी का मार्ग प्रशस्त हो सके।

उत्तर प्रदेश में 22 फीसदी दलितों का रुख तय करेगा भविष्य: क्या ‘संविधान बचाओ’ के बाद चलेगा ‘दलित सम्मान’ का दांव?

उत्तराखंड से सटे देश के सबसे बड़े सूबे उत्तर प्रदेश में दलित राजनीति का प्रभाव सबसे व्यापक और गहरा है। 403 विधानसभा सीटों वाले इस राज्य में लगभग 20 से 22 प्रतिशत दलित आबादी निवास करती है, और यहां 86 सीटें एससी/एसटी वर्ग के लिए आरक्षित हैं। पिछले तीन दशकों तक यूपी में दलित राजनीति की धुरी बहुजन समाज पार्टी और मायावती के इर्द-गिर्द घूमती रही है, लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव ने नए सियासी संकेत दिए हैं।

वर्ष 2022 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस यूपी में महज दो सीटों पर सिमट गई थी और उसके खाते में एक भी आरक्षित सीट नहीं आई थी। लेकिन 2024 के आम चुनाव में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस के ‘इंडिया गठबंधन’ ने ‘संविधान बचाओ’ और सामाजिक न्याय का ऐसा नैरेटिव गढ़ा, जिसने भाजपा के अभेद्य माने जाने वाले गैर-जाटव दलित वोट बैंक में भी सेंध लगा दी। कांग्रेस ने बाराबंकी जैसी सुरक्षित लोकसभा सीट पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की।

अब कांग्रेस हल्द्वानी प्रकरण को उत्तर प्रदेश के दलित मोहल्लों और बस्तियों तक ले जाकर यह संदेश देने की रणनीति पर काम कर रही है कि भाजपा की मानसिकता में दलितों के प्रति भेदभाव भरा हुआ है। दूसरी तरफ, मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार अपने मजबूत लाभार्थी तंत्र, मुफ्त राशन, पक्के आवास और डॉ. भीमराव आंबेडकर के पंचतीर्थों के विकास के जरिए इस वर्ग को अपने पाले में जोड़े रखने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। भाजपा जानती है कि यदि 22 फीसदी दलित वोट छिटका, तो 2027 की राह बेहद कठिन हो जाएगी।

पंजाब का महादंगल: देश में सबसे ज्यादा 32 फीसदी दलित आबादी, 50 सीटों पर सीधा प्रभाव

उत्तर भारत में दलित राजनीति की जब भी चर्चा होती है, पंजाब का नाम सबसे पहले आता है क्योंकि देश के किसी भी अन्य राज्य की तुलना में पंजाब में अनुसूचित जाति की आबादी का अनुपात सबसे अधिक यानी लगभग 32 प्रतिशत है। पंजाब विधानसभा की 117 सीटों में से 34 सीटें एससी वर्ग के लिए आरक्षित हैं, लेकिन राज्य की 50 से अधिक सीटों पर दलित मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं।

खासकर पंजाब का दोआबा क्षेत्र—जिसमें जालंधर, होशियारपुर, कपूरथला और नवांशहर जैसे जिले शामिल हैं—दलित राजनीति का वैश्विक गढ़ माना जाता है। यहां डेरा सचखंड बल्लां जैसे प्रभावशाली डेरों का खासा प्रभाव है। वर्ष 2017 के चुनाव में कांग्रेस ने दलितों के समर्थन के दम पर 34 में से रिकॉर्ड 21 आरक्षित सीटें जीतकर सत्ता हासिल की थी। हालांकि 2022 के चुनाव में चरणजीत सिंह चन्नी को पहला दलित मुख्यमंत्री बनाने के बावजूद कांग्रेस आम आदमी पार्टी की आंधी में उड़ गई और महज 3 सुरक्षित सीटें ही जीत सकी।

आज पंजाब में कांग्रेस खुद को फिर से पुनर्जीवित करने के लिए ‘दलित सुरक्षा और अस्मिता’ को अपना सबसे बड़ा हथियार मान रही है। पार्टी को लगता है कि उत्तराखंड के कथित शुद्धीकरण के मुद्दे को पंजाब के दोआबा और मालवा के दलित विमर्श से जोड़कर वह आम आदमी पार्टी और भाजपा-अकाली दल के संभावित गठजोड़ को मात दे सकती है। कांग्रेस के लिए पंजाब में सत्ता की वापसी की आखिरी उम्मीद यही 32 फीसदी वोट बैंक है।

दोनों दलों का सीधा टकराव: कांग्रेस ने बताया ‘संकीर्ण मानसिकता’, भाजपा ने लगाया ‘तुष्टीकरण’ का आरोप

हल्द्वानी मामले पर दोनों ही राष्ट्रीय दल रक्षात्मक होने के बजाय आक्रामक अंदाज में एक-दूसरे के खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं। कांग्रेस अनुसूचित जाति विभाग के उत्तराखंड प्रदेश अध्यक्ष मदन लाल ने दो-टूक कहा है कि खरगे जी की रैली के बाद किया गया शुद्धिकरण भाजपा की सामंतवादी और संकीर्ण मानसिकता का खुला प्रमाण है। मदन लाल के अनुसार, जब तक इस अपमानजनक कृत्य में शामिल लोगों पर सख्त कानूनी कार्रवाई नहीं होती, कांग्रेस पूरे प्रदेश में चरणबद्ध आंदोलन करेगी और इस मुद्दे को गांव-गांव तक ले जाएगी। कांग्रेस विधायक और नेता प्रतिपक्ष यशपाल आर्य भी इस मुद्दे पर कार्यकर्ताओं के साथ पुलिस थानों में प्रदर्शन कर रहे हैं।

इसके विपरीत, भाजपा अनुसूचित जाति मोर्चा के प्रदेश अध्यक्ष बलबीर घुनियाल और पार्टी के वरिष्ठ प्रवक्ताओं का कहना है कि कांग्रेस असल मुद्दों से जनता का ध्यान भटकाने के लिए सुनियोजित तरीके से तुष्टीकरण और नफरत की राजनीति कर रही है। भाजपा नेताओं का तर्क है कि 8 अगस्त को हुई रैली के दौरान मैदान में भारी गंदगी फैली थी और कुछ उपद्रवी तत्वों द्वारा आपत्तिजनक नारे लगाए गए थे, जिसके चलते स्थानीय नागरिकों और धार्मिक संगठनों ने स्वच्छता अभियान और शांति यज्ञ का आयोजन किया था, जिसका किसी नेता की जाति या वर्ग से कोई लेना-देना नहीं था। भाजपा का आरोप है कि कांग्रेस अपनी डूबती राजनीतिक नैया को बचाने के लिए सामाजिक सौहार्द को दांव पर लगा रही है।

2027 की सियासी बिसात पर अस्तित्व की जंग

हल्द्वानी के एक मैदान से शुरू हुआ यह धार्मिक और सामाजिक विवाद अब तीन बड़े राज्यों के शक्ति संतुलन की परीक्षा बन चुका है। लोकनीति-सीएसडीएस के हालिया चुनावी अध्ययनों से यह बात उजागर हो चुकी है कि पारंपरिक वोट बैंकों में बिखराव आ चुका है और दलित मतदाता अब किसी एक दल के बंधुआ नहीं हैं। वे विकास, सम्मान और भागीदारी के आधार पर अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर रहे हैं।

उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के लिए यह चुनौती है कि वे राज्य के पहाड़ी और मैदानी समीकरणों के बीच दलित समाज में यह विश्वास बनाए रखें कि भाजपा उनके हितों की संरक्षक है। वहीं, कांग्रेस के लिए मल्लिकार्जुन खरगे के चेहरे के सहारे दलितों को एकजुट करना सत्ता में वापसी की सबसे बड़ी गारंटी बन सकता है। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या ‘शुद्धिकरण’ पर छिड़ी यह रार विधानसभा चुनावों तक अपनी तपिश बरकरार रख पाएगी, या फिर रोजगार, महंगाई और विकास के जमीनी मुद्दे इस जातीय ध्रुवीकरण पर भारी पड़ेंगे।

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