
उत्तर प्रदेश की सियासी बिसात पर अगला विधानसभा चुनाव जीतने के लिए समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव इस बार कोई भी कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहते। लखनऊ में विक्रमादित्य मार्ग स्थित पार्टी मुख्यालय से लेकर जिलों के जमीनी कार्यकर्ताओं तक बैठकों का दौर जारी है। पार्टी थिंक-टैंक ऐसे ‘वचन पत्र’ या घोषणा पत्र को आकार देने में जुटा है, जो केवल वादों का दस्तावेज न लगे, बल्कि हर वर्ग के मतदाताओं की सीधी उम्मीदों से जुड़ा हो। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, इस बार का घोषणा पत्र पारंपरिक वादों से हटकर सीधे तौर पर ठोस डिलीवरी और गारंटी मॉडल पर आधारित होगा, ताकि सत्ताधारी भाजपा के मजबूत संगठनात्मक तंत्र को कड़े नीतिगत एजेंडे से घेरा जा सके।
पीडीए का सामाजिक फॉर्मूला: जाति जनगणना और आरक्षण का ठोस खाका
सपा की राजनीति की मौजूदा धुरी ‘पीडीए’ यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक है। अखिलेश यादव इस सामाजिक समीकरण को केवल चुनावी रैलियों के नारों तक सीमित नहीं रखना चाहते, बल्कि इसे नीतिगत स्तर पर घोषणा पत्र का केंद्रीय स्तंभ बना रहे हैं।
घोषणा पत्र में सबसे बड़ा संकल्प राज्य स्तर पर सामाजिक-आर्थिक जातिगत गणना (Caste Census) कराने का होगा। सपा का तर्क है कि जब तक आबादी का सही आंकड़ा सामने नहीं आएगा, तब तक बजट और कल्याणकारी योजनाओं का सटीक वितरण मुमकिन नहीं है। इसके साथ ही, सरकारी ठेकों, आउटसोर्सिंग नौकरियों और उच्च शिक्षा में पिछड़ों, दलितों और अति-पिछड़ी जातियों की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए विशेष वैधानिक गारंटी का मसौदा तैयार किया जा रहा है। मुस्लिम समाज के सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन को दूर करने के लिए सच्चर कमेटी और रंगनाथ मिश्र आयोग की सिफारिशों के अनुरूप विशेष शिक्षा पैकेज और वक्फ संपत्तियों के पारदर्शी डिजिटलीकरण का वादा भी इसमें शामिल हो सकता है।
नौजवानों और बेरोजगारों के लिए ‘कैलेंडर भर्ती’ और पेपर लीक मुक्ति
उत्तर प्रदेश में युवाओं की एक बहुत बड़ी आबादी प्रतियोगी परीक्षाओं और रोजगार की अनिश्चितता से जूझ रही है। अखिलेश यादव इस नब्ज को बखूबी पहचान रहे हैं। सपा के घोषणा पत्र में युवाओं के लिए एक विस्तृत ‘रोजगार कैलेंडर’ पेश करने की तैयारी है।
इसके तहत यूपीएससी, यूपीएसएससी और पुलिस भर्ती जैसी तमाम राज्य स्तरीय परीक्षाओं के लिए नोटिफिकेशन जारी होने से लेकर जॉइनिंग लेटर मिलने तक की समयसीमा 9 महीने तय करने की विधिक गारंटी दी जाएगी। इसके अलावा, बीते वर्षों में युवाओं के आक्रोश का कारण बने ‘पेपर लीक’ मामलों को गैर-जमानती और संगठित अपराध की श्रेणी में डालते हुए इसके लिए विशेष फास्ट-ट्रैक कोर्ट और सख्त कानून का प्रावधान शामिल किया जाएगा। निजी क्षेत्र और एमएसएमई उद्योगों में स्थानीय युवाओं के लिए निश्चित रोजगार हिस्सेदारी, नए स्टार्टअप्स के लिए ब्याज-मुक्त लोन और पूर्ववर्ती सपा सरकार की तर्ज पर आधुनिक कौशल प्रशिक्षण व डिजिटल गैजेट्स (लैपटॉप/टैबलेट) के विस्तार का वादा युवाओं को लुभाने के लिए रखा जा रहा है।
अन्नदाता की जेब में नकदी: एमएसपी गारंटी, कर्जमाफी और मुफ्त सिंचाई
पश्चिमी उत्तर प्रदेश से लेकर पूर्वांचल और बुंदेलखंड तक के ग्रामीण मतदाताओं को साधने के लिए कृषि नीति सपा घोषणा पत्र का तीसरा प्रमुख पाया होगी। किसान आंदोलन के अनुभवों को ध्यान में रखते हुए समाजवादी पार्टी राज्य स्तर पर प्रमुख फसलों के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) की कानूनी खरीद गारंटी का मॉडल पेश कर सकती है।
इसके अलावा छोटे और सीमांत किसानों के बकाया फसली ऋणों की एकमुश्त राहत योजना, ट्यूबवेल और सिंचाई के लिए 300 यूनिट मुफ्त बिजली का पुराना संकल्प फिर दोहराया जाएगा। आवारा पशुओं की विकट समस्या से किसानों की बर्बाद होती फसलों को बचाने के लिए ग्राम पंचायत स्तर पर आधुनिक गौशालाओं और बाउंड्रीवॉल निर्माण का विशेष बजट प्रावधान तैयार किया जा रहा है। पश्चिमी यूपी के किसानों की लाइफलाइन माने जाने वाले गन्ना मूल्य का भुगतान 14 दिनों के भीतर अनिवार्य रूप से करने और देरी पर ब्याज समेत भुगतान करने की वैधानिक व्यवस्था घोषणा पत्र का अहम आकर्षण बनेगी।
आधी आबादी को सीधा वित्तीय संबल: समाजवादी पेंशन 2.0 और सुरक्षा
महिला मतदाताओं का बढ़ता वोटिंग प्रतिशत किसी भी दल की जीत-हार का निर्णायक कारक बन चुका है। अखिलेश यादव इस मोर्चे पर अपनी पूर्ववर्ती ‘समाजवादी पेंशन योजना’ को अधिक वित्तीय ताकत के साथ नए कलेवर में पेश करने की तैयारी में हैं।
सपा के प्रस्तावित घोषणा पत्र में आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की महिला मुखिया को हर महीने निश्चित डायरेक्ट बेनिफिट ट्रांसफर (डीबीटी) के जरिए आर्थिक सहायता देने की घोषणा हो सकती है। इसके साथ ही महिलाओं को सरकारी रोडवेज बसों में मुफ्त यात्रा की सुविधा, स्वयं सहायता समूहों (SHGs) के लिए रिवॉल्विंग फंड को दोगुना करने और आंगनवाड़ी व आशा बहुओं के मानदेय में सम्मानजनक वृद्धि का वादा शामिल किया जा रहा है। महिला सुरक्षा के मोर्चे पर पुलिस थानों में जवाबदेही बढ़ाने के साथ ही सपा सरकार के समय चर्चित रहे ‘1090’ वूमेन पावर लाइन और डायल 112 के बुनियादी ढांचे को एआई तकनीक से अपग्रेड करने की बात कही जाएगी।
कर्मचारी और मध्यम वर्ग: पुरानी पेंशन स्कीम (ओपीएस) बहाली की सबसे बड़ी ढाल
सरकारी कर्मचारियों और शिक्षकों का वर्ग उत्तर प्रदेश में एक बहुत बड़ा और प्रभावी ओपिनियन मेकर है। सपा ने पिछले चुनावों में भी पुरानी पेंशन योजना (OPS) की बहाली का मुद्दा उठाया था, और आगामी चुनाव के लिए भी यह पार्टी का सबसे बड़ा ट्रम्प कार्ड बना रहेगा।
घोषणा पत्र में स्पष्ट रूप से यह घोषणा की जाएगी कि सरकार बनते ही कैबिनेट की पहली बैठक में नेशनल पेंशन सिस्टम (NPS) के स्थान पर पुरानी पेंशन योजना (OPS) को राज्य के कर्मचारियों, शिक्षकों और पुलिसकर्मियों के लिए पुनः लागू करने का प्रस्ताव पारित किया जाएगा। इसके अतिरिक्त, संविदा और आउटसोर्सिंग कर्मियों के शोषण को खत्म करने के लिए न्यूनतम वेतन की गारंटी, नियमितीकरण की चरणबद्ध नीति और राज्य कर्मचारियों के लिए कैशलेस स्वास्थ्य बीमा योजना का दायरा बढ़ाने का वादा तैयार किया जा रहा है।
पूर्वांचल, बुंदेलखंड और पश्चिम: क्षेत्रीय असंतुलन खत्म करने का रोडमैप
उत्तर प्रदेश की भौगोलिक विविधता को देखते हुए सपा का घोषणा पत्र पूरे प्रदेश पर एक जैसा नियम थोपने के बजाय क्षेत्रीय प्राथमिकताओं को भी साधेगा।
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पूर्वांचल: बाढ़ नियंत्रण की स्थायी योजना, चीनी मिलों का आधुनिकीकरण, गोरखपुर-वाराणसी-आजमगढ़ कॉरिडोर में एग्रो-प्रोसेसिंग क्लस्टर।
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बुंदेलखंड: केन-बेतवा और स्थानीय जल स्रोतों के संरक्षण के जरिए हर खेत तक पानी, डिफेंस कॉरिडोर की वास्तविक जमीन पर स्थापना, खनन उद्योग में स्थानीय युवाओं को हिस्सेदारी।
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पश्चिम यूपी और ब्रज: आलू और गन्ने के लिए आधुनिक कोल्ड स्टोरेज नेटवर्क, स्पोर्ट्स इंडस्ट्री (मेरठ) और चमड़ा उद्योग (आगरा) के लिए विशेष निर्यात इंसेंटिव जोन।
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मध्य यूपी: लखनऊ, कानपुर और उन्नाव बेल्ट में टेक्सटाइल और लेदर क्लस्टर के पुनरुद्धार के लिए औद्योगिक नीति।
सपा थिंक टैंक इस बात पर जोर दे रहा है कि घोषणा पत्र केवल लोकलुभावन वादों का पुलिंदा न बने, बल्कि उसके वित्तीय संसाधन जुटाने का रोडमैप भी जनता के सामने रखा जाए, ताकि विपक्षी दलों के ‘रेवड़ी’ वाले आरोपों को तथ्यपरक तरीके से खारिज किया जा सके। अखिलेश यादव की रणनीति साफ है कि जब जमीन पर बुनियादी सवालों—महंगाई, बेरोजगारी, स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक हिस्सेदारी—पर बहस केंद्रित होगी, तभी चुनावी मुकाबला सीधे तौर पर जनहित बनाम सत्ता की सियासत में तब्दील हो सकेगा।
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