
गंभीर आर्थिक कंगाली, राजनीतिक अस्थिरता और सीमांत इलाकों में भड़की बगावत की आग से जूझ रहे पाकिस्तान में अब एक नया और अभूतपूर्व संवैधानिक संकट खड़ा हो गया है। पाकिस्तान के आंतरिक प्रशासनिक ढांचे और सदियों पुराने प्रांतीय भूगोल को पूरी तरह बदलने की एक महत्वाकांक्षी योजना ने मुल्क के हुक्मरानों की नींद उड़ा दी है। रावलपिंडी स्थित सेना मुख्यालय (GHQ) की सरपरस्ती में पाकिस्तान के मौजूदा चार सूबों को तोड़कर कई नए प्रांत या नई प्रशासनिक इकाइयां बनाने की सुगबुगाहट अचानक तेज हो गई है। देश के नक्शे को नए सिरे से खींचने की इस सैन्य मुहिम के बीच पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी के अचानक लंदन चले जाने और वहां उनकी पाकिस्तान के शक्तिशाली सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर के करीबी दूत के साथ हुई गोपनीय वार्ता ने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हलचल मचा दी है। चर्चा गर्म है कि सेना देश को छोटी-छोटी प्रशासनिक इकाइयों में बांटना चाहती है, किंतु राष्ट्रपति जरदारी ने बलूचिस्तान और सिंध जैसे बारूद के ढेर पर बैठे प्रांतों को छूने से साफ इनकार कर दिया है। सत्ता के गलियारों में छिड़ी इस खींचतान के बाद यह सवाल हर तरफ गूंज रहा है कि क्या पाकिस्तान का नक्शा बदलने जा रहा है या फिर यह विवाद शहबाज शरीफ सरकार के पतन और मुल्क में नए गृहयुद्ध का कारण बनेगा।
लंदन में 90 मिनट की सीक्रेट बैठक: मोहसिन नकवी लेकर पहुंचे जनरल असीम मुनीर का फरमान
पाकिस्तान की सियासत में जब भी कोई बड़ा फैसला पर्दे के पीछे पकता है, तो उसका केंद्र अक्सर इस्लामाबाद के बजाय लंदन बन जाता है। इस समय पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ब्रिटेन की राजधानी लंदन में डेरा डाले हुए हैं। जरदारी के इस अचानक हुए विदेशी दौरे के पीछे सरकार और सेना के बीच उपजा भारी तनाव बताया जा रहा था। इसी तनाव को थामने और सैन्य हुकूमत का रुख स्पष्ट करने के लिए पाकिस्तान के केंद्रीय गृह मंत्री मोहसिन नकवी विशेष विमान से लंदन पहुंचे। मोहसिन नकवी को पाकिस्तान के फील्ड मार्शल व आर्मी चीफ जनरल असीम मुनीर का सबसे भरोसेमंद रणनीतिकार और असैन्य चेहरा माना जाता है।
लंदन के एक सुरक्षित ठिकाने पर राष्ट्रपति जरदारी और गृह मंत्री नकवी के बीच लगभग 90 मिनट तक बंद कमरे में अत्यंत तनावपूर्ण और गहन बैठक हुई। उच्च पदस्थ सूत्रों के अनुसार, नकवी कोई सामान्य कूटनीतिक संदेश लेकर नहीं आए थे, बल्कि उनके हाथ में आर्मी चीफ जनरल असीम मुनीर का सीधा और सख्त संदेश था। सेना का जोर इस बात पर है कि देश में बेहतर प्रशासन, वित्तीय अनुशासन और आतंकवाद पर नियंत्रण के नाम पर तुरंत नए प्रांतों के गठन की औपचारिक प्रक्रिया शुरू की जाए। सेना चाहती है कि राष्ट्रपति अपनी संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए इस प्रक्रिया को आगे बढ़ाएं। किंतु 90 मिनट की इस मैराथन बैठक में जरदारी ने सेना के इस प्रस्ताव पर तुरंत हामी भरने के बजाय गंभीर आपत्तियां दर्ज करा दीं, जिससे मामला सुलझने के बजाय और उलझ गया है।
बलूचिस्तान और सिंध को छूने से क्यों कांप रहे हैं जरदारी?
राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी पाकिस्तान की सियासत के सबसे चतुर और जमीनी खिलाड़ी माने जाते हैं। वे भली-भांति जानते हैं कि नक्शे पर पेंसिल से लकीर खींचना और जमीन पर उसे लागू करना दो बिल्कुल अलग बातें हैं। जरदारी ने जनरल मुनीर के संदेशवाहक के सामने दो-टूक शब्दों में स्पष्ट कर दिया है कि वे सिंध और बलूचिस्तान में किसी भी प्रकार के नए प्रांत बनाने या उनके विभाजन के सख्त खिलाफ हैं। इसके पीछे दो ठोस रणनीतिक और राजनीतिक कारण हैं।
पहला कारण बलूचिस्तान का दहकता हुआ माहौल है। बलूचिस्तान पाकिस्तान का क्षेत्रफल के लिहाज से सबसे बड़ा किंतु सबसे अशांत और पिछड़ा प्रांत है। वहां बलोच लिबरेशन आर्मी (BLA) और अन्य अलगाववादी संगठन पाकिस्तानी सेना के खिलाफ पहले से ही आर-पार का खूनी युद्ध लड़ रहे हैं। बलूचिस्तान में आए दिन पाकिस्तानी सैनिकों की चौकियां उड़ाई जा रही हैं और चीनी नागरिकों व सैन्य काफिलों पर आत्मघाती हमले हो रहे हैं। जरदारी का स्पष्ट तर्क है कि इस समय बलूचिस्तान के भूगोल से छेड़छाड़ करना जलती हुई आग में पेट्रोल छिड़कने जैसा होगा। यदि बलूचिस्तान को विभाजित करने या उसके तटीय इलाकों (जैसे ग्वादर) को अलग प्रशासनिक इकाई बनाने की कोशिश की गई, तो समूचा बलोच समाज सड़कों पर उतर आएगा और सुरक्षा हालात पूरी तरह बेकाबू हो जाएंगे।
दूसरा कारण सिंध प्रांत की आंतरिक राजनीति है। सिंध जरदारी की पार्टी ‘पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी’ (PPP) की राजनीतिक जीवनरेखा और सबसे अभेद्य किला है। सिंध में सिंधी राष्ट्रवाद की जड़ें बहुत गहरी हैं। यदि कराची को अलग प्रांत बनाने या सिंध के किसी भी हिस्से को बांटने का प्रयास हुआ, तो पीपीपी का जनाधार एक झटके में ध्वस्त हो जाएगा और सिंध के राष्ट्रवादी दल पूरे प्रांत में पहिया जाम कर गृहयुद्ध जैसी स्थिति पैदा कर देंगे। अपनी राजनीतिक सल्तनत को बचाने के लिए जरदारी किसी भी सूरत में सिंध के बंटवारे पर दस्तखत करने को तैयार नहीं हैं।
पंजाब और खैबर पख्तूनख्वा से करो शुरुआत: जरदारी का जवाबी दांव
आर्मी चीफ के भारी दबाव को सीधे खारिज करने के बजाय आसिफ अली जरदारी ने एक चतुर राजनीतिक पैंतरा चला है। उन्होंने संकट के दुष्परिणामों से बचने के लिए एक वैकल्पिक फॉर्मूला पेश किया है। जरदारी ने संदेश दिया है कि यदि सेना सचमुच नए प्रांत बनाने को लेकर गंभीर है, तो इसकी शुरुआत पंजाब और खैबर पख्तूनख्वा (KPK) से की जानी चाहिए।
जरदारी की इस दलील के पीछे एक मजबूत कानूनी आधार भी है। पंजाब विधानसभा और खैबर पख्तूनख्वा की विधानसभाएं पूर्व में दक्षिण पंजाब (सरायकी प्रांत) और हजारा प्रांत बनाने को लेकर आधिकारिक प्रस्ताव पहले ही पारित कर चुकी हैं। जरदारी का कहना है कि जहां जनता और जनप्रतिनिधियों की मांग पहले से मौजूद है, पहले वहां काम किया जाए, न कि सिंध और बलूचिस्तान जैसे संवेदनशील इलाकों को जबरन इस आग में झोंका जाए। इसके साथ ही जरदारी ने एक चरणबद्ध कार्ययोजना का सुझाव दिया है। इसके तहत पहले चरण में पाकिस्तान के नक्शे को तुरंत बदलने के बजाय स्थानीय निकायों (Local Governments) को वित्तीय और प्रशासनिक रूप से सशक्त किया जाए। इसके बाद संविधान के अनुच्छेद 140 (स्थानीय सरकारें) और अनुच्छेद 160 (राष्ट्रीय वित्त आयोग यानी NFC अवॉर्ड) में संशोधन पर विचार हो, ताकि संसाधनों के बंटवारे पर आम सहमति बन सके।
क्या पीपीपी और पीएमएल-एन का वर्चस्व तोड़ना चाहती है पाकिस्तानी सेना?
रक्षा और राजनीतिक विश्लेषक सेना के इस अचानक जागे ‘प्रशासनिक पुनर्गठन’ के प्रेम के पीछे एक गहरा और खतरनाक खेल देख रहे हैं। असल में, पाकिस्तानी सेना का जनरैल वर्ग हमेशा से यह मानता रहा है कि पाकिस्तान की दो पारंपरिक पारिवारिक पार्टियां—पंजाब में नवाज शरीफ की पीएमएल-एन और सिंध में भुट्टो-जरदारी की पीपीपी—संसद में अपने विशाल प्रांतीय संख्याबल के दम पर सेना के सामने सौदेबाजी करने की स्थिति में रहती हैं।
सेना की दीर्घकालिक योजना यह है कि यदि पंजाब और सिंध जैसे विशाल सूबों को चार-पांच छोटे-छोटे प्रशासनिक टुकड़ों में बांट दिया जाए, तो इन स्थापित राजनीतिक घरानों की एकाधिकारवादी पकड़ हमेशा के लिए टूट जाएगी। छोटे प्रांत बनने से स्थानीय स्तर पर नए और कमजोर राजनीतिक नेतृत्व उभरेंगे, जिन्हें नियंत्रित करना और अपनी उंगलियों पर नचाना रावलपिंडी के जनरलों के लिए बेहद आसान हो जाएगा। सेना इसे पाकिस्तान की ‘आंतरिक सुरक्षा और शासन सुधार’ का नाम दे रही है, जबकि हकीकत में यह पाकिस्तान के लोकतंत्र के बचे-खुचे संघीय ढांचे को तोड़कर एक अघोषित ‘यूनिटरी या प्रेसिडेंशियल’ तानाशाही थोपने की सुनियोजित साजिश मानी जा रही है।
नवाज शरीफ और जरदारी का गुप्त तालमेल: अगले 8 से 10 दिन क्यों हैं पाक सियासत के लिए निर्णायक?
सेना के इस बढ़ते दबाव को भांपते हुए राष्ट्रपति जरदारी ने तुरंत पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) के सर्वोच्च नेता नवाज शरीफ से बैकचैनल संपर्क साधा है। दोनों पुराने दिग्गज नेता जानते हैं कि यदि वे अलग-अलग रहे, तो सेना दोनों को एक-एक करके ठिकाने लगा देगी। हाल ही में लाहौर के जाती उमरा में नवाज शरीफ की अध्यक्षता में एक अति-महत्वपूर्ण बैठक हुई, जिसमें प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और पंजाब की मुख्यमंत्री मरियम नवाज शरीफ मौजूद थीं।
उस बैठक में शरीफ परिवार ने बहुत सतर्क रणनीति अपनाई। पीएमएल-एन ने तय किया कि नए प्रांतों के मुद्दे पर पहला सार्वजनिक रुख पीपीपी को तय करने दिया जाए, ताकि सेना के सीधे गुस्से का पहला शिकार जरदारी बनें, जिसके बाद पीएमएल-एन अपना नफा-नुकसान देखकर पत्ता खोलेगी। शहबाज शरीफ की मौजूदा केंद्र सरकार पूरी तरह जरदारी की पार्टी के बैसाखियों पर टिकी है। यदि जरदारी ने सेना के दबाव में आकर सरकार से समर्थन वापस खींचने का संकेत दिया, तो शहबाज सरकार ताश के पत्तों की तरह बिखर जाएगी। यही कारण है कि पाकिस्तानी मीडिया और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अगले 8 से 10 दिन पाकिस्तान के राजनीतिक भविष्य और उसकी सीमाओं के लिए अत्यंत विस्फोटक साबित होने वाले हैं।
भारत, सुरक्षा एजेंसियां और उत्तर प्रदेश तक इस हलचल की सीधी निगरानी
पाकिस्तान के इस अंदरूनी घमासान पर भारतीय सुरक्षा तंत्र, विदेश मंत्रालय और खुफिया एजेंसियां पैनी नजर बनाए हुए हैं। जब-जब पाकिस्तान के भीतर आंतरिक बगावत या राजनीतिक विस्फोट की स्थिति बनती है, तो वहां की सेना जनता का ध्यान भटकाने के लिए नियंत्रण रेखा (LoC) और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर आतंकवाद और संघर्ष विराम उल्लंघन को तेज कर देती है।
इस घटनाक्रम की संवेदनशीलता का असर राष्ट्रीय सुरक्षा के गलियारों से लेकर उत्तर प्रदेश के रणनीतिक केंद्रों तक महसूस किया जा रहा है। उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में स्थित भारतीय सेना की मध्य कमान (Central Command) और औद्योगिक नगरी कानपुर व निकटवर्ती उन्नाव परिक्षेत्र के रक्षा संस्थान व आयुध निर्माण इकाइयां (Ordnance Factories) किसी भी सीमा पार आकस्मिक हलचल को लेकर रणनीतिक रूप से सतर्क रहते हैं। उन्नाव और कानपुर के सैन्य विशेषज्ञ मानते हैं कि बलूचिस्तान में यदि सेना जबरन कोई पुनर्गठन थोपती है, तो वहां आजादी की लड़ाई और तेज होगी, जिससे पाकिस्तान की पश्चिमी सीमा (डूरंड लाइन और बलूचिस्तान तट) पूरी तरह अस्थिर हो जाएगी। अपने ही घर में दोतरफा आग से घिरी पाकिस्तानी सेना किसी भी समय अपनी हताशा में भारत विरोधी षड्यंत्र रच सकती है, जिसके चलते भारतीय सीमाओं पर सतर्कता को उच्चतम स्तर पर बनाए रखना अनिवार्य हो गया है।
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